मौत

प्रभुनाथ शुक्ल (अंक: 272, मार्च प्रथम, 2025 में प्रकाशित)

 

लोकतंत्र में मौत! 
अलोकतांत्रिक है 
वह समतावादी नहीं है 
वह पूँजीवादी है 
वह व्यवस्थावादी है
 
लोकतंत्र में मौत! 
अमीरों से डरती है 
राजेताओं से बचती है 
मठाधीशों के पाँव चूमती है 
विशिष्ट से कितनी शिष्ट है 
 
लोकतंत्र में मौत! 
सत्तावादी है 
विपक्ष की साथी है 
निर्बलों की घाती है 
श्रद्धा के लिए श्राद्ध है 
 
लोकतंत्र में मौत! 
तंत्र को मूक बनाती है 
वह भीड़ पर टूटती है 
वह आस्था को निगलती है 
वह विश्वास को तोड़ती है

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