होली: कभी रंग की-कभी ख़ून की . . . 

01-03-2026

होली: कभी रंग की-कभी ख़ून की . . . 

तेजपाल सिंह ’तेज’  (अंक: 293, मार्च प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

होली आती है
तो केवल गुलाल नहीं लाती, 
वह यादें भी लाती है—
हँसी की, शरारत की, 
भीगे आँगनों की, 
और उन चेहरों की
जो रंगों में एक जैसे लगने लगते थे। 
 
पर हर रंग
सिर्फ़ रंग नहीं होता, 
कुछ रंग इतिहास के होते हैं, 
जो हथेलियों से नहीं, 
समय से चिपक जाते हैं। 
 
मैंने देखा है
एक होली खेतों में, 
जहाँ सरसों हँसती थी
और बच्चों की आवाज़ें
हवा के संग उड़ती थीं। 
वहाँ लाल केवल अबीर था, 
हरा केवल नई कोंपल, 
और नीला
खुले आकाश का भरोसा। 
 
मगर मैंने एक और होली भी देखी है—
जहाँ गलियों में रंग कम
और शोर ज़्यादा था, 
जहाँ चेहरों पर मुस्कान नहीं, 
सवाल ज़्यादा थे। 
 
किसी ने कहा—
यह उत्सव है। 
किसी ने कहा—
यह प्रदर्शन है। 
और किसी ने धीरे से फुसफुसाया—
यह डर का दिन भी हो सकता है। 
 
रंग उड़ते रहे, 
पर हवा में बारूद की गंध थी। 
किसी की आँखों में
पिचकारी नहीं, 
नफ़रत भरी थी। 
 
तब समझ में आया—
होली कभी-कभी
सिर्फ़ रंगों की नहीं होती, 
वह विचारों की भी हो जाती है, 
जहाँ लोग रंग नहीं, 
पहचानें फेंकते हैं
एक-दूसरे पर। 
 
और फिर
लाल रंग बदल जाता है—
अबीर से
ख़ून में। 
 
इतिहास के पन्ने
भीगे हुए मिलते हैं, 
कहीं दंगों के धब्बे, 
कहीं चीखों की परछाइयाँ, 
कहीं चौराहों पर
जलती हुई शामें। 
 
फिर भी
हर साल होली आती है—
जैसे कोई ज़िद्दी आशा, 
जो कहती है
कि इंसान अभी पूरा नहीं टूटा। 
 
एक बूढ़ी माँ
आज भी दरवाज़े पर
थाली में रंग रखती है, 
इस उम्मीद में
कि बेटा लौटेगा, 
और पहला रंग
उसके माथे पर लगाएगा। 
 
एक बच्चा
अब भी पूछता है—
“ख़ून भी लाल क्यों होता है?” 
और कोई जवाब
सही शब्द नहीं खोज पाता। 
 
शहरों की भीड़ में
कुछ लोग अभी भी
धीरे से गाल पर रंग लगाते हैं, 
जैसे कह रहे हों—
“मैं तुम्हें चोट नहीं पहुँचाऊँगा।” 
 
कभी-कभी
एक छोटा सा स्पर्श
इतिहास के बड़े घावों को
धीरे-धीरे भरने लगता है। 
 
शायद यही होली का असली रंग है—
जब हम पहचानते हैं
कि रंगों का अर्थ
दूसरे को अपने जैसा बनाना नहीं, 
बल्कि अलग होते हुए भी
साथ रहना है। 
 
होली तब पूरी होती है
जब कोई हाथ
पत्थर छोड़कर
रंग उठा लेता है, 
जब कोई आँख
घृणा की जगह
हँसी चुन लेती है। 
 
मैं चाहता हूँ
कि आने वाली होलियाँ
सिर्फ़ पानी से भीगें, 
आँसुओं से नहीं। 
कि लाल रंग
सिर्फ़ गुलाल रहे, 
और इतिहास
ख़ून से नहीं लिखा जाए। 
 
बहुत होली हो चुकी—
रंग की भी, 
ख़ून की भी। 
 
अब एक नई होली चाहिए, 
जहाँ इंसान
इंसान को रँगे, 
ज़ख़्म नहीं। 
 
जहाँ उत्सव
जश्न हो, 
जंग नहीं। 
 
और जब अगली बार
कोई बच्चा पूछे—
“होली क्या होती है?” 
तो हम मुस्कराकर कह सकें—
“बेटा, 
यह वह दिन है
जब दुनिया थोड़ी देर के लिए
सिर्फ़ रंग बन जाती है।” 

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