उसे अच्छा समझती रही

15-05-2020

उसे अच्छा समझती रही

प्रदीप श्रीवास्तव

मैं मकान का तीसरा फ़्लोर बनवा रहा था। उद्देश्य सिर्फ़ इतना था कि किराएदार रखकर मंथली इनकम और बढ़ाऊँ, क्योंकि दोनों बच्चे जूनियर हाईस्कूल पास कर चुके थे। आगे उनकी पढ़ाई के लिए और ज़्यादा पैसों की ज़रूरत पड़ेगी। मुझे यह बताने में भी कोई संकोच नहीं है कि आजकल के पति पत्नियों की अपेक्षा हम दोनों कुछ नहीं बहुत ही ज़्यादा रोमांटिक मूड के हैं। इस एज में भी बिल्कुल अल्ट्रामॉडर्न न्यूली मैरिड कपल की तरह, और बोल्ड भी। मेरे जो मित्र, रिश्तेदार हमें, हमारी जीवनशैली को जानते हैं, वह कहते हैं कि, "क्या यार तुम्हारे बच्चे बड़े हो गए हैं, अब इतना रोमांटिक होना अच्छा नहीं है। बच्चों पर ध्यान दो, उनको ज़्यादा समय दो। बच्चे अब समझदार हो गए हैं।"

मैं ऐसे सभी लोगों को आज भी हर बार एक ही जवाब देता हूँ कि, "मैं बच्चों को पूरा समय भी देता हूँ और दुनिया की हर ज़रूरी जानकारियाँ भी। शर्म, संकोच नहीं, उचित ढंग से उन्हें बताता हूँ कि क्या सही है, क्या ग़लत है, कब क्या करना चाहिए और क्यों करना चाहिए। उन्हें भी मैं फ़्री टाइम देता हूँ। हमेशा उनके सिर पर सवार नहीं रहता। आख़िर उन्हें भी तो थोड़ा ऐसा समय चाहिए ना जिसमें वह आज़ादी महसूस कर सकें।"

ऑफ़िस में मेरी एक साथी के अलावा, एक भी व्यक्ति मुझे मेरी सोच वाला अभी तक नहीं मिला। मैं बच्चों को सेक्स एजुकेशन देने का प्रबल पक्षधर आज भी हूँ। यह बात केवल कहता ही नहीं हूँ बल्कि अपने बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से देता भी आ रहा हूँ। मेरी वह साथी भी अपने दोनों बेटों और एक बेटी को मेरी ही तरह शिक्षित कर रही है। इस विषय पर सभी हमारी कटु आलोचना के सिवा और कुछ भी नहीं करते। मेरे यह सभी उग्र आलोचक कहते हैं कि मैं अपने बच्चों को भ्रष्ट बना रहा हूँ। मेरी इस बात को यह सभी अनर्गल प्रलाप मानते हैं कि, "यदि बच्चों को शुरू से ही सेक्स एजुकेशन दी जाए तो आगे चलकर वह तमाम हेल्थ रिलेटेड बीमारियों से बचे रहेंगे। बच्चों को इस तरह एजुकेट करके हम समाज से सेक्सुअल क्राइम्स बहुत कम कर सकते हैं।" यह आलोचक तीखे व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि, "आप और आपकी पत्नी बहुत ही ज़्यादा खुले स्वभाव के हैं, इसलिए अपने आसपास का माहौल ऐसा बनाना चाहते हैं, जो आपके अनुकूल हो।"

यह बात मुझे बड़ी मूर्खतापूर्ण, सतही लगती है, जब कई स्वयंभू विद्वान मुझे रजनीश के सिद्धांतों से प्रभावित बताने लगते हैं। मेरी इस बात पर बिल्कुल विश्वास नहीं करते कि, "मैंने ना रजनीश को कभी पढ़ा है, ना सुना है, तो उनकी किसी बात का मुझ पर प्रभाव कैसे पड़ सकता है।" मगर स्वयंभू विद्वानों की यह मंडली यक़ीन ही नहीं करती। एक विद्वान जी तो एक बार बड़ी गर्मागर्म बहस पर उतर आए। रजनीश की एक पुस्तक, "संभोग से समाधि की ओर" का ज़िक्र करते हुए कहा, "आपने यह किताब पूरी पढ़ी ही नहीं है, बल्कि घोंटकर पी डाली है और उसमें लिखी बातों का ही पूरी तरह पालन कर रहे हैं।"

मैंने कहा, "आप बड़ी बेतुकी बातें कर रहें हैं। मैं इस किताब के बारे में सुन भी आपके मुँह से रहा हूँ कि इस तरह की उन्होंने कोई किताब लिखी भी है। हाँ, आप जिस तरह से उस किताब की डिटेल्स बता रहे हैं, उससे यह बात बिल्कुल साफ़ है कि मैंने नहीं, आपने उस किताब को घोंटकर पी लिया है। आपके बताने के अंदाज़ से लग रहा है कि आपने एक बार नहीं उसे बार-बार पढ़ा है।"

मकान बनवाने के लिए जब लोन की अप्लीकेशन दी तो इन्हीं विद्वान से जल्दी करने के लिए कहा। तब इन्होंने पूछा, "कुल चार लोग हो, दो फ़्लोर बने हुए हैं, फिर तीसरा क्या करोगे?" मैंने कहा, "एक फ़्लोर में हम दोनों पति पत्नी रहेंगे। दूसरे में दोनों बच्चे और तीसरा फ़्लोर किराए पर दूँगा।" उन्होंने कहा, "जब किराए पर ही देना है तो दो फ़्लोर दो। तुम्हारा बड़ा मकान है। एक ही फ़्लोर में तुम्हारा पूरा परिवार रह सकता है।" मैंने उन्हें चिढ़ाने के लिए कहा, "रह सकता है। लेकिन मेरे परिवार जैसा परिवार नहीं। देखिए, मैं उन लोगों में नहीं हूँ जो बच्चे ज़रा सा बड़े हो गए तो ख़ुद को बुज़ुर्ग मानकर बस जैसे-तैसे ज़िंदगी काटने लगते हैं। हम ना अपनी आज़ादी में बाधा चाहते हैं, ना उनकी में बनना चाहते हैं। इसलिए अलग-अलग ही सही है।"

मेरी इस बात पर उन्होंने कुछ ऐसी बात कही जो मुझे अपनी पर्सनल लाइफ़ में उनका अनाधिकृत हस्तक्षेप लगा, अपमान की हद तक। तो मैंने भी उन्हें कुएँ का मेंढक सहित कई और तीखी बातें कहते हुए हिसाब बराबर कर लिया। हालाँकि बाद में यह पछतावा हुआ कि जो भी हो, वह उम्र में मुझसे बड़े हैं, मुझे उनको अपमानित नहीं करना चाहिए था। यह समझ कर चुप रहना चाहिए था कि यह उनके विचार हैं। यह ज़रूरी नहीं कि सभी मेरे सुर में सुर मिलाएँ।

जैसे-जैसे तीसरा फ़्लोर बनता जा रहा था मुझे वैसे-वैसे इन सब की बातें यादें आतीं। लगता कि जैसे कानों में गूँज रही हैं। लोन अप्रूव करने वाले विद्वान अकाउंट ऑफ़िसर की यह बात ज़्यादा कि, "तुम अपने घर को वेस्टर्न कंट्रीज़ के लोगों की तरह अनैतिक कर्मों का घर बना चुके हो। दैहिक भोग ही तुम्हारा आचार-विचार, लक्ष्य है।" उनकी इस बात पर मैं उनके विशाल माथे पर लगे चंदन रोली के बड़े से तिलक को बड़ी देर तक घूरता रहा तो उन्होंने कहा, "आप अभी इस पवित्र तिलक को पाखंड आडंबर कहेंगे। लेकिन इसके वैज्ञानिक महत्व को जानकर भोगवादी संस्कृति या परम भोग से ऊबे, खिन्न पगलाए लोग जीवन की शांति, शीतलता ढूँढ़ रहे हैं इसी चंदन तिलक वाली सनातन संस्कृति में।

पिछले कुंभ में देखा नहीं कि कितनी कंपनियों के उच्च पदस्थ अधिकारियों ने करोड़ों रुपए मंथली सैलरी वाली नौकरी, बहुत हाई-फ़ाई जीवनशैली को छद्म, भुलावा, भटकाव माना, समझा और उसे छोड़कर वास्तविक सुख, शांति पाने के लिए इसी तिलक की शीतलता की छाया में आ गए। और आप उल्टा जा रहे हैं। एक छल-कपट छद्मावरण वाली दुनिया में। जहाँ की भोगाग्नि आख़िर में जलाती ही है, बस।" यह कह कर उन्होंने तिलक की महत्ता को बताने वाला यह श्लोक भी बताया, "स्नाने दाने जपे होमो देवता पितृ कर्म चः। त्त्सर्वं निष्फलं यान्ति ललाटे तिलकं बिना।।"

मिस्त्री की कन्नी-बसुली की कट-कट की आवाज़ की तरह उनकी बातें मेरे दिमाग में दिन पर दिन ज़्यादा चोट करती जा रही थीं। मैं अजीब सा चिड़चिड़ा होता चला जा रहा था। बेवज़ह पत्नी-बच्चों, मज़दूरों पर उखड़ने लगा। मकान बनवाने के लिए मैंने एक महीने की मेडिकल लीव ले रखी थी। मगर एक बड़ी अजीब बात भी हो रही थी कि जहाँ हर किसी को देख कर मुझे ग़ुस्सा आता था। वहीं घर में काम कर रहे एक क़रीब चालीस वर्षीय मज़बूत कद-काठी वाले मज़दूर पर मुझे ना जाने क्यों बड़ी दया आती। वह मुझे बहुत प्रभावित करता। काम बंद होने पर जब वह चला जाता तो मैं सोचता आख़िर यह मुझे इतना क्यों प्रभावित कर रहा है? मुझे इस पर दया क्यों आती है? इसमें कोई शक नहीं कि तिलक वाले अकाउंटेंट की बातों के कारण मैं अजीब से वहम में पड़ गया हूँ। मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि उनकी बातों और मज़दूर में कुछ सम्बन्ध है। यह क्यों मुझे एकदम अलग दिख रहा है? मैं देखता कि वह एकदम गूँगे की तरह मुँह सिले दो-तीन मज़दूरों के बराबर अकेले ही जी-तोड़ काम करता रहता है। एक मिनट भी रुकता नहीं।

लंच टाइम में सारे मिस्त्री, मज़दूर खाना खाने चले जाते हैं। आधे घंटे को कह कर निकलते हैं, लेकिन लौटते हैं एक घंटे में। हँसते-बोलते, बीड़ी-तंबाकू, पान-मसाला खाते-पीते। लेकिन यह ऊपर छत पर एक कोने में बैठकर पाँच मिनट में न जाने क्या खा-पीकर तुरंत मुँह में सुरती दबाता है और काम में जुट जाता है। जब-तक सब आते हैं तब-तक यह बहुत सारा काम पूरा कर डालता है।

मैं बड़ी सोच में पड़ गया कि वह आख़िर ऐसा क्या लाता है अंगौछे में जो पलक झपकते खाकर पानी पी लेता है। अगले दिन मैं उसके पास पहुँच गया कि देखूँ क्या लाता है? मुझे देखकर वह अचकचा गया। बहुत संकोच के साथ दिखाया। अंगौछे में छः-सात मोटी-मोटी रोटियाँ थीं। सब्ज़ी-दाल, चटनी-वटनी, प्याज-मिर्चा वग़ैरह कुछ भी नहीं था। मेरा मन बड़ा द्रवित हो गया। मैंने पूछा, "कैसे खाओगे भाई?" उसने तुरंत एक पुड़िया खोल कर दिखाई। बिल्कुल सादा सा नमक था। कहा, "ये है ना बाबू जी। इसी से खा लूँगा।"

मैंने आश्चर्य से देखते हुए कहा, "ये रूखा-सूखा कैसे खाओगे? तुम दो मिनट रुको, सब्ज़ी-दाल कुछ मँगवाता हूँ।" मैं मिसेज को आवाज़ देने ही जा रहा था कि उसने हाथ जोड़कर मना कर दिया। मैंने फिर दोहराया कि रूखा है तो उसने पानी की बोतल दिखाते हुए कहा, "नहीं साहब ये पानी है ना।" मैं आश्चर्य से उसे कुछ देर देखता रह गया। फिर वहाँ से हट गया कि वह निसंकोच होकर खाना खाए। यह सोचते हुए मैं नीचे चला आया कि बड़ा स्वाभिमानी और संकोची है। हो सकता है कि सवेरे-सवेरे कुछ बना ना पाया हो।

अगले दिन मैं अपने को फिर नहीं रोक पाया। देखा तो फिर वही नमक रोटी। मुझे बड़ी दया आई। मैंने फिर सब्ज़ी-दाल की बात उठाई तो उसने हाथ जोड़ लिया। मगर तीसरे दिन मुझसे नहीं रहा गया। जब वह खा-पी चुका, तो मैं उसी के पास ईंटों के ढेर पर बैठकर उससे बात करने लगा। बड़ी मुश्किल से वह सहज हुआ और खुल कर बोलना शुरू किया। मैंने उसे सिगरेट भी पिलाई जिससे कोई हिचक ही ना रहे। वह ले नहीं रहा था, बहुत कहने पर पीने लगा।

जिस अंदाज़ में उसने सिगरेट पी उससे मुझे विश्वास हो गया कि वह इन चीज़ों का शौक़ीन है। जब मुझे लगा कि वह बातचीत में अब पूरी तरह ट्रैक पर आ चुका है तो उससे पूछा कि, "तुम डेली साढ़े चार सौ रुपये कमाते हो, रोटी के साथ दाल या सब्ज़ी वग़ैरह भी तो ला ही सकते हो। गेहूँ के आटे की रोटी के अलावा और कुछ ना खाने से तो तुम्हारा स्वास्थ्य जल्दी ख़राब हो जाएगा। गेहूँ के आटे में ग्लूटन नामक पदार्थ बहुत होता है, जो आँतों के लिए किसी भी सूरत में अच्छा नहीं है। ऐसा क्यों कर रहे हो? क्या बात है?" मेरी इस बात को वह टालने लगा। मगर उसके चेहरे पर जिस तरह के भाव आए-गए। दुख-पीड़ा की जो गहरी लकीरें चेहरे पर उभरीं, उससे मैं समझ गया कि कुछ ना कुछ तो बहुत बड़ी बात है, जो इसे बहुत कष्ट दे रही है।

मैं उससे और ज़्यादा अपनत्व के साथ बात करने लगा। कहा, "देखो कोई आपत्ति न हो तो जो भी समस्या है बताओ। मैं तुम्हारी मदद करूँगा।" मेरी बड़ी कोशिश के बाद उसने जो बताया उन बातों ने मुझे हिला कर रख दिया। मैं हतप्रभ होकर बार-बार उसे देखता। मेरे मन में तुरंत जो बात आई वह यह कि इसे तुरंत घर से बाहर कर देना चाहिए। इसे घर के अंदर रखना मूर्खता है। ऐसे आदमी का क्या ठिकाना कि वही सारे काम ना दोहराए जो यह कर चुका है। लेकिन उसकी बेबसी, विनम्रता ने मुझे बहुत प्रभावित किया। मुझे यह विश्वास करने में समय नहीं लगा कि वह अपने सारे ग़लत कामों के लिए सच में अपने को पश्चाताप की अग्नि में तपा रहा है। ख़ुद को शुद्ध कर रहा है। औरों की तरह उसे भी ख़ुद को शुद्ध करने का अधिकार है।

यह भी हम सभी की तरह इंसान है। हर इंसान से ग़लतियाँ होती हैं। जो ग़लतियों को स्वीकार ले, पश्चाताप कर ले, वह फिर से भला इंसान हो सकता है, और यह भला इंसान बनने में ही लगा हुआ है। इसे अगर मैंने धिक्कारा, ग़ुस्सा हुआ, भगाया तो कोई आश्चर्य नहीं कि यह फिर पुराने रास्ते पर लौट जाए। उसने जब बताना शुरू किया तो ना हिचकिचाया, ना रुका।

बड़े भावुक स्वर में उसने बताया कि, "जब मैं इंटर के एग्ज़ाम का आख़िरी पेपर देकर लौटा तो देखा कि मेरे घर के सामने भीड़ लगी है। पुलिस वाले भी हैं। मैं घबराया, दौड़कर पहुँचा तो मालूम हुआ कि बाबूजी ने पंखे से लटक कर जान दे दी है। उनके कपड़े से मिली एक पर्ची में लिखा था कि वह अपनी ज़िंदगी से ऊब कर जान दे रहे हैं। किसी को परेशान ना किया जाए। ना ही पोस्टमार्टम किया जाए।

“उनके मरने के कुछ महीने बाद बहनों से मुझे पता चला कि उस दिन रात में अम्मा बाबूजी के बीच पहले ही की तरह झगड़ा हुआ था। बाबू ट्रक ड्राइवर थे। उनकी आधी कमाई शराब और औरतबाज़ी में ख़र्च हो जाती थी। इससे घर चलाने के लिए अम्मा को भी काम करना पड़ता था। वह मना करती थीं कि, ’ऐसे पैसा बर्बाद करना, शरीर बर्बाद करना ठीक नहीं है। ना जाने किन-किन औरतों के पास जाते हो। कौन-कौन सी बीमारी इकट्ठा किए मेरे पास आते हो।’ दोनों के बीच झगड़े की हर बार यही वज़ह होती थी। अम्मा कहतीं, ’बच्चों के सामने यह सब बोलते हो, कितना ख़राब लगता है। कितना बुरा असर पड़ रहा है उन सब पर। सब मोबाइल ज़माने के हैं। हम सबसे ज़्यादा जानते, समझते हैं।’ अम्मा लड़कियों का वास्ता देतीं लेकिन बाबूजी पर कोई असर नहीं होता। इस मनबढ़ई के कारण आख़िर नशे की हालत में ही परिवार को अकेला भरे जंगल में छोड़कर चले गए।

“अकेले घर चलाना अम्मा के लिए बहुत मुश्किल हो गया, इतना कि हम भाई-बहनों की पढ़ाई अंततः बंद हो गई। घर किसी तरह चल सके इसके लिए मैं नौकरी ढूँढ़ने लगा। लेकिन बहुत ढूँढ़ने पर भी मुझे नौकरी नहीं मिली। घर का ख़र्च चलना छोड़िए, उसका हिलना-डुलना भी मुश्किल होने लगा। तो मैं मज़दूरी करने लगा। एक बड़े अधिकारी का मकान बन रहा था। जैसे आप ऊपर बनवा रहे हैं, उसी तरह वह भी बनवा रहे थे। सवेरे-सवेरे ही काम शुरू करवा कर चले जाते थे। दिनभर मैडम सब कुछ देखती थीं। उनकी जैसी हँसमुख, मिलनसार, दयालु औरत मैंने आज तक दूसरी नहीं देखी। उनके जैसे ही प्यारे-प्यारे उनके दो बच्चे थे। जो सवेरे ही स्कूल चले जाते थे। मैं वहीं मज़दूरी कर रहा था। मेरे काम से वह बहुत ख़ुश थीं। एक दिन लंच के समय मेरा खाना देखकर बोलीं, ’तुम कल से खाना लेकर नहीं आना। यहीं खा लिया करना।’ शुरू में मेरा मन बिल्कुल नहीं था। लेकिन जब उन्होंने ज़्यादा कहा तो मैं मान गया।

मुझे चाय-नाश्ता, खाना-पीना सब वही मिलता था, जो वह अपने लिए बनाती थीं। मैं भी बड़ा ख़ुश रहता, अहसान मानता और जी-तोड़कर खूब काम करता। काम धीमी रफ़्तार से, बड़े आराम से हो रहा था क्योंकि साहब ने एक मिस्त्री और एक ही लेबर काम पर लगाया था। मैडम ऐसे काम देख रही थीं, करवा रहीं थीं जैसे कि वह कोई मनोरंजन का काम है। एक दिन मैं दोपहर में हाथ-मुँह धोकर खाने के लिए सीमेंट वाली एक बोरी बिछा कर बैठ गया। मैडम मुझे खाना देने लगीं, बड़े प्यार से। ऐसा लग रहा था जैसे घर के किसी सदस्य को ही खिला रही हैं। बस उसी समय मुझ पर न जाने कौन सा साढ़ेसाती सनीचर सवार हो गया कि मैं उन्हें..., अब क्या बताएँ साहब, मुझे ऐसे कुछ नहीं देखना चाहिए था। मगर जब साढ़ेसाती सनीचर सवार हो तो कुछ नहीं हो सकता। मैं उसी समय उन पर हमला करने वाला था, लेकिन आख़िरी क्षण में ठहर गया। तब मैं समझ नहीं पाया था कि मैडम ने मेरी हरकत पकड़ ली है कि नहीं। वह कुल तीन बार खाने की चीज़ें परोसने आईं। मैं तीनों बार अपने को बड़ी मुश्किल से सँभाल पाया।

“उन्हें बरमुडा, टी-शर्ट में देखते ही ना जाने क्यों सनीचर मेरे सिर पर तांडव करने लगता था। ऐसा नहीं है कि वह कोई पहली बार उन कपड़ों में सामने आई थीं। मुझे महीना भर हो रहा था वहाँ काम करते-करते। दर्जनों बार वह छोटे कपड़ों में आईं। पूरा घर साहब, बेटी, बेटा सभी बड़े छोटे-छोटे कपड़ों में रहते थे। लेकिन तब सनीचर मेरे सिर पर तांडव नहीं करता था। कहने को भी नहीं। मगर उस दिन पता नहीं क्यों? उसी समय उन पर हमला करने से इसलिए भी ख़ुद को रोक पाया क्योंकि मिस्त्री के आने का डर था। खाना खाने के बाद मैं काम तो करता रहा, लेकिन मन में मैडम ही चलती रहीं। बराबर वह आँखों के सामने ही बनी रहीं। मन करता कि सारा काम-धाम छोड़कर उनके पास पहुँच जाऊँ।

“साहब मेरा पागलपन देखिए कि क़रीब तीन बजे मैं नीचे चला ही गया। हमला करने की तय करके। मुझ पर जैसे भूत सवार हो गया था। यह भी भूल गया कि घर में मिस्त्री भी है। मैं निश्चिंत पहले कमरे में पहुँचा। वह नहीं मिलीं, तो मैं लॉबी, फिर एक कमरा और पार करके बेडरूम तक चला गया। मगर मैडम वहाँ भी नहीं दिखीं। तभी मेरी नज़र सामने अलमारी पर पड़ी, जिसका दरवाज़ा बंद था। लेकिन चाबी उसी में लटकी हुई थी। मैंने एक चौकन्नी नज़र हर तरफ़ डाली। मुझे बेड पर तकिए के पास दो हज़ार और पाँच सौ की कई गड्डियाँ पड़ी हुई दिखीं। मैं ख़ुद को रोक नहीं पाया। गड्डियों को झपट कर पैंट की जेब में रख लिया। तभी कुछ आहट सुनकर वापस चल दिया। लॉबी में पहुँचा ही था कि मैडम दिख गईं। कोरियर से कोई सामान आया था। वह उसी के दो डिब्बे लिए चली आ रही थीं।

“मुझे वहाँ देखते ही हैरान होते हुए पूछा, ’तुम यहाँ क्या कर रहे हो?’ उनको देखते ही मैं हकबका गया। एकदम सफ़ेद झूठ बोलते हुए जल्दी से कहा, ’जी, वह पानी माँगने आया था। ऊपर धूप बहुत तेज़ है।’ वह कुछ देर मुझे देखने के बाद बोलीं, ’ठीक है, तुम बाहर रुको। ला रही हूँ पानी।’ मैंने देखा कि मैडम का मूड उखड़ चुका है। कहाँ तो मैं हमला करने गया था, लेकिन उन्हें देखते ही घबरा गया। शायद नोट चोरी कर लिए थे इसलिए मैं उन पर हमला करने की हिम्मत नहीं कर सका। मैडम ने कोल्ड ड्रिंक की बोतल में पानी पकड़ा दिया। मुझे साफ़-साफ़ ग़ुस्से में दिख रही थीं। पानी लेकर मैं ऊपर चल दिया। मेरे पैर काँप रहे थे। सही दिशा में नहीं पड़ रहे थे। अगर मैंने रुपए ना चुराए होते तो मैं निश्चित ही हमला कर चुका होता। चोरी करते हुए पकड़े जाने में बस कुछ ही सेकेंड का फ़र्क रह गया था। शायद इस बात ने मुझे अचानक ही बड़ा कमज़ोर बना दिया था। मैं सारा ज़ोर लगाकर भी अपने पैरों को थरथराने से रोक नहीं पा रहा था।"

उसकी यह बात सुनकर मैंने कहा, "बड़ी अजीब बात बता रहे हो तुम। जो आदमी रेप जैसा भयानक अपराध करने जा रहा हो चोरी तो उसके सामने कुछ है नहीं। फिर वह तुम्हें अकेली मिल भी गईं थीं।" मेरी इस बात पर वह बड़ी खिन्नता के साथ बोला, "साहब यही तो आज तक मैं भी नहीं समझ पाया कि उस समय मैं घबरा क्यों गया? मेरे पैरों की थरथराहट तब बंद हुई जब मिस्त्री की नज़र बचाकर मैंने नोट छत पर ही पड़ी मौरंग, बालू के ढेर में छिपा दिया। उसी पर कई ईंटें रख दीं। तब जाकर मैं निश्चिंत हो पाया कि अब मैं चोरी में नहीं पकड़ा जाऊँगा। शक के आधार पर पुलिस पकड़ेगी तो मिस्त्री भी धरा जाएगा। मगर रुपए कोई नहीं ढूँढ़ पाएगा।

“मुझे यक़ीन था कि मैडम बस रुपए की चोरी पकड़ने ही वाली हैं। अब कुछ ही देर में आफ़त आने वाली है। लेकिन कुछ समय बीत जाने के बाद भी जब आफ़त नहीं आई तो मेरे सिर पर फिर सनीचर तांडव करने लगा। मेरे क़दम नीचे की ओर बढ़ने लगे। मगर तभी नीचे से बच्चों की आवाज़ आने लगी। मतलब कि बच्चे स्कूल से वापस आ गए थे। मगर मेरे मन में धधक रही आग शांत नहीं हुई। तुरंत ही अगला प्लान बना लिया कि मिस्त्री पाँच बजे चला जाएगा और उसी समय बच्चे भी कोचिंग चले जाएँगे। साहब सात बजे से पहले आते ही नहीं। इससे अच्छा समय और कोई नहीं होगा। मैं भीतर ही भीतर ख़ुश हो रहा था कि बस कुछ ही समय बाद मैं अपने मन का कर लूँगा। कोई मुझे पकड़ भी नहीं पाएगा।

“मिस्त्री और बच्चों के जाने के बाद मैंने अपनी योजनानुसार सब कुछ किया। रोज़ मिस्त्री के जाने के बाद मैं घंटे भर और रुक कर काम समेटता था। उस दिन सब के जाने के बाद मैं आधे घंटे भी ख़ुद को रोक नहीं पाया। नीचे पहुँच कर लॉबी में ही मैडम को पकड़ लिया। मेरे हाथ में मिस्त्री की बसुली थी। अचानक मेरे इस भयानक रूप को देखकर मैडम सकते में आ गईं। उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। लगा जैसे कि बेहोश हो जाएँगी। मेरे सिर पर सनीचर भयानक रूप से नाच रहा था। मैं बड़ी फ़ुर्ती के साथ उन्हें खींचते हुए सबसे पीछे कमरे में ले गया।

“पीछे कमरे में पहुँचते ही वह बेहोश हो गईं। अच्छी-ख़ासी मज़बूत जिस्म की थीं, लेकिन इतनी कमज़ोर! मैंने इत्मिनान से पूरी क्रूरता के साथ अपने मन का काम किया। मैडम के कपड़े उन्हीं पर फेंके। अपने कपड़े पहने, आराम से ऊपर जाकर पैसे लिए और भाग निकला। मुझे पूरा यक़ीन था कि मैडम होश में तभी आएँगी जब बच्चे, साहब आकर पानी-वानी छिड़क कर लाएँगे। मैं वहाँ से जितनी तेज़ साइकिल से भाग सकता था, उतनी तेज़ भागा। लेकिन कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि जाऊँ कहाँ? मुझे अब डर लगने लगा कि पुलिस पकड़ते ही हाथ-पैर तोड़ देगी। मैं हाँफता-भागता बस स्टेशन पहुँचा। जो बस जाती दिखी उसी में टिकट लेकर बैठ गया। वह रुद्रपुर जा रही थी। डर के मारे साइकिल स्टेशन के गेट पर ही छोड़ दी, जैसे कि मेरी है ही नहीं। अब मेरे पैर फिर काँप रहे थे। देर रात बस किच्छा पहुँची। लेकिन वहाँ ख़राब हो गई। फिर दूसरी बस यात्रियों को रुद्रपुर ले गई।"

उसकी बातें सुन-सुन कर मैं हतप्रभ हो रहा था। मन में कई बार आया कि कहीं यह मनगढ़ंत क़िस्सा तो नहीं सुना रहा है। उसे बीच में ही रोकते हुए पूछा, "यह बताओ तुम डकैती, रेप जैसा इतना गंदा, भयानक कांड करके भागे और आज तक पकड़े नहीं गए।" असल में उसकी दरिंदगी सुनकर मैं ग़ुस्से में आ गया था। मैंने तय किया कि इस भगोड़े को पुलिस को देकर इसे इसके कुकर्मों की सख़्त सज़ा ज़रूर दिलवाऊँगा। ये है तो ज़रूर ताक़तवर लेकिन इतना भी नहीं कि मैं रोक ना पाऊँ। अव्वल तो जब पुलिस इसकी खोपड़ी पर सवार हो जाएगी तब इसे पता चलेगा। इसे बातों में उलझा कर चुपचाप एक सौ बारह डायल करता हूँ। लेकिन आगे उसने जो बताया उससे मेरी योजना धरी की धरी रह गई।

उसने कहा, "पकड़ा गया। असल में साहब ने आते ही पुलिस बुला ली। आप तो जानते ही हैं कि आज कल हर जगह कैमरे लगे हैं। कैमरे से उन्हें सब पता चल गया। मोबाइल ने लोकेशन बता दी। रूद्रपुर पहुँचने से पहले ही पुलिए ने बस रुकवा कर उतार लिया। वापस ले आई और फिर गाली, लाठी, बेल्ट, जूता से ख़ूब मारा-तोड़ा। जो रुपये थे रास्ते में ही पुलिस की जेबों में ग़ायब हो गए। बताया गया कि मेरे पास रुपये बरामद ही नहीं हुए। मुझसे यही कहलवाया। दस साल की सज़ा काटी। घर पहुँचा तो एक और बड़ी अजीब कठोर सज़ा मुझे मिली। सच कहूँ तो अदालत और घर से भी बड़ी सज़ा मुझे मैडम और साहब ने दी। ऐसी सज़ा दी है कि मैं अंतिम साँस तक भुगतता रहूँगा। लेकिन तब भी सज़ा ख़त्म नहीं होगी।" उसकी इन बातों से मैं बड़ा कंफ्यूज़ हो गया कि यह क्या कह रहा है। मेरे मन में उसके लिए घृणा बढ़ती जा रही थी। उससे बात करने का मेरा टोन बदलता चला जा रहा था। मैंने नफ़रत से कहा, "साफ़-साफ़ बताओ ना सारी बात।" 

"साहब बात यह है कि मैं जेल पहुँच गया तो शुरू-शुरू में कुछ महीने मैं बहुत ही ज़्यादा परेशान रहा।

“मैं देखता कि बड़े-बड़े अपराधियों के घर के लोग भी उनसे मिलने आते हैं। कई-कई हत्याओं के हत्यारों से भी। लेकिन मुझसे मिलने कोई नहीं आता। शुरू में मैंने सोचा कि अभी सब कुछ नया-नया है, इसलिए सब ग़ुस्सा होंगे। इसीलिए नहीं आ रहे हैं। समय के साथ जब ग़ुस्सा ख़त्म हो जाएगा, तो सब आएँगे। अम्मा भी आएँगी, बहनें भी आएँगी। लेकिन दिन, महीना, साल देखते-देखते दस साल बीत गए। अम्मा कैसी हैं? बहनें कैसी हैं? घर कैसे चल रहा है? मुझे इन दस सालों में कुछ भी नहीं पता था। एक तरह से दोहरी सज़ा काट रहा था। कोई नहीं आया मेरे पास, किसी तरह की कोई सूचना नहीं थी। मैं पूरी-पूरी रात सो नहीं पाता था। छोटी सी तंग कोठरी में पड़ा तड़फड़ाता रहता था। रात दिन पछताता कि मैंने ये क्या पागलपन कर डाला। एक पागलपन की अब मुझे ना जाने क्या-क्या सज़ा मिलेगी।

“मैंने वह दस साल कैसे काटे, उन दस सालों में कैसी-कैसी पीड़ा से गुज़रा इसका अंदाज़ा कोई मेरी जैसी स्थिति से गुज़रने वाला आदमी ही लगा सकता है।" 

"अच्छा!" 

"हाँ साहब। सही कह रहा हूँ। जिस दिन मैं जेल से छूटा तब वास्तव में दस साल छः महीना बीत चुका था।" 

"क्यों, छः महीने और क्यों?" 

"क्योंकि साहब मेरी बात करने वाला घर का तो कोई आदमी था नहीं। और सरकारी काम-काज तो अपनी मर्ज़ी, अपनी रफ़्तार से चलता है। काग़ज़ी कार्रवाई पूरी होने में छः महीने निकल गए। ख़ैर जेल में रहते जहाँ जल्दी से जल्दी घर पहुँचने के लिए परेशान रहता था, वहीं जब जेल से बाहर क़दम रखा तो बड़े असमंजस में पड़ गया कि घर चलूँ कि नहीं। क्योंकि बाहर क़दम रखते ही मेरे मन में यह बात आई कि जब दस साल किसी ने कुछ ख़बर नहीं ली कि ज़िंदा भी हूँ कि नहीं, दसियों चिट्ठियाँ भेंजी, किसी का पलटकर जवाब तक नहीं मिला तो क्या जाना ऐसे घर में।

“अगर घर होता तो ऐसा व्यवहार कहाँ होता। पहुँचने पर कहीं ऐसा ना हो कि सब पहचानने से ही मना कर दें। कहीं लूटेरा कह कर दरवाज़े से ही फटकार कर ना भगा दें। आख़िर मैंने तय किया कि नहीं जाना ऐसे घर में। घर ने हमें छोड़ दिया है तो हमें भी उसे छोड़ देना चाहिए। फिर मिनट भर में मेरे दिमाग़ में जीवन भर की योजना बन गई कि जेल में जितने पैसे कमाए हैं, उसी से कोई छोटा-मोटा काम-धंधा कर लूँगा और किसी अच्छी-भली लड़की से शादी करके बच्चे पैदा करूँगा। अपना जीवन पटरी पर ले आऊँगा। कोई न कोई लड़की तो मिल ही जाएगी। बाहर अब कौन जानता है कि मैं सज़ायाफ़्ता हूँ। यह सोचकर मैं और तमाम लोगों की तरह मुंबई जाने के लिए चल दिया। डासना जेल से निकलकर यह तय करने तक मुझे तीन घंटे लग गए।

“रेलवे स्टेशन पहुँच कर तत्काल में रिज़र्वेशन करवाना चाहा तो नहीं हुआ। मैं जनरल से ही चलने की सोच कर प्लेटफॉर्म पर ही इंतज़ार करने लगा। क़रीब चार घंटे बाद ट्रेन आई। सामान के नाम पर अब तक मैंने एक बैग, कुछ और ज़रूरी कपड़े ले लिए थे। ट्रेन आई तो वही बैग लिए मैं जनरल बोगी में घुस गया। पूरी बोगी क़रीब-क़रीब भरी हुई थी। हर तरफ़ लोगों का शोरगुल था। जल्दी ही ट्रेन छूटने का समय हो गया। तभी अचानक ही मेरे दिमाग़ में आया कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि मेरे जेल जाने के बाद घर पर कोई ऐसी आफ़त-विपत्ति आ गई हो कि कोई मुझ तक पहुँचने की सोच ही ना पाया हो। बाबू जी थे नहीं। अम्मा, बहनें ही थीं। कुछ भी हो सकता है। हमें पहले घर चलकर सारी बातें पता करनी ही चाहिए। सब कैसे हैं? कहाँ हैं? ज़िंदा भी हैं कि नहीं।

“तभी ट्रेन सरकने लगी। साहब इसी के साथ मेरे दिमाग़ में धमाका हुआ कि, चल उतर, जल्दी कर, घर पहुँचना है। और साहब मैं बर्थ से उतर कर ऐसे भागा बाहर की तरफ़ जैसे कोई बेटिकट यात्री चेकिंग स्क्वायड को देखकर भागता है। जब नीचे प्लेटफ़ॉर्म पर मेरे क़दम पड़े तो स्पीड इतनी तेज़ थी कि सारी कोशिशों के बावजूद मैं ख़ुद पर काबू नहीं रख सका और आगे एक खम्भे से ज़ोर से टकरा गया। मेरी नाक, माथे पर ज़ोर की चोट आ गई। ख़ून निकलने लगा। जो बैग लिया था वह भागमभाग में ट्रेन में ही छूट गया। उसे उठाने का मेरे पास समय ही नहीं था। अब मैं जल्द से जल्द घर पहुँचने के लिए एकदम बिलबिला उठा। अगले दिन भूखा, प्यासा अपने घर पहुँचा। घर पहुँचने की तड़प में खाने-पीने की भी नहीं सोच सका। ऐसी तड़प के साथ जब घर के सामने पहुँचा तो वह मुझे एकदम उजाड़ मिला। बिल्कुल गंदा, टूटा-फूटा, कूड़ा-करकट से भरा।

“काँपते क़दमों से मैंने घर के अंदर क़दम रखा तो कमरे में अम्मा तखत पर कराहती मिलीं। वह एकदम टीबी की मरीज़ बन चुकी थीं। हड्डियों का ढाँचा भर रह गईं थीं। बाल उलझे हुए थे। धूल में सने हुए लग रहे थे। उनकी और घर की हालत देखकर मेरा कलेजा फट गया। मन किया कि इतना तेज़ चीखूँ कि मेरी अम्मा और घर का सारा दुख उस भयानक चीख में उड़ जाए। मुझे रोम-रोम में इतनी भयानक पीड़ा महसूस हुई कि उतनी पीड़ा मुझे पुलिस की सैकड़ों लाठियाँ, बेल्ट, जूते की मार से भी महसूस नहीं हुई थी।

“मेरे आँसुओं की धारा बह चली थी। तभी इस बात का जीवन में पहली बार एहसास हुआ कि ख़ून के आँसू यही हैं। मेरे होंठ, ज़ुबान फड़क रहे थे। लेकिन कोई बोल नहीं निकल रहे थे। बहनों की तरफ़ ध्यान गया तो कहीं कोई नहीं दिखी। हर तरफ़ कूड़ा-करकट, धूल, मकड़ी के जाले ही दिखे। पीने का पानी तक नहीं था। मैं फिर अम्मा के पास पहुँचा, उन्हें उठाया, बहुत याद दिलाया तब वह पहचान पाईं और फिर फूट-फूट कर रो पड़ीं। उस तरह, वैसी दर्द भरी रुलाई उनकी तब भी नहीं थी जब बाबू जी ने आत्महत्या कर ली थी। बड़ी देर में चुप करा पाया।

“बार-बार खाँसते-खाँसते उनकी आँखें लाल हो गईं थीं। नल से लाकर उन्हें पानी पिलाया और कहा, ’अम्मा तू आराम कर। मैं जल्दी से कुछ खाना-पीना लेकर आता हूँ।’ लेकिन अम्मा एकदम से फिर रोती हुई मुझे कहीं जाने से रोकने लगीं, जैसे कि मैं हमेशा के लिए चला जाऊँगा। बड़ी देर में समझा-बुझाकर खाना-पीना ला पाया। कुछ खाने के बाद अम्मा की तबीयत जब कुछ सँभली तब उन्होंने रो-रो कर घर की तबाही का पूरा क़िस्सा घंटों में बताया कि कैसे मेरे जेल जाने के बाद हालात तेज़ी से बिगड़ते चले गए। उन्हें दमा हो गया। काम पर जाना मुश्किल हो गया। खाने-पीने के लाले पड़ने लगे।

“दोनों बहनों की बात आने पर अम्मा बड़ी तेज़ बिलख पड़ीं, ऐसा कि देर तक कुछ बोल ही नहीं पाईं। बड़ा दिलासा दिया तब बड़ी ताक़त बटोर कर बताया कि, ’भूख, प्यास सहित मैं हर चीज़ से जूझती रही। इन सबके लिए खटती रही। लेकिन दोनों ने जिस तरह आवारागर्दी की, मेरे मुँह पर कालिख पोत कर चली गईं, उससे मैंने खाट पकड़ ली। पहले बड़ी वाली किसी के साथ भाग गई। महीना भर भी नहीं हुआ कि दूसरी भी किसी के साथ चली गई। कुछ दिन बाद मालूम हुआ कि जिसके साथ छोटी वाली गई थी वह धोखेबाज़ निकला, और उसको वेश्या बाज़ार में बेच दिया।’ अम्मा जितना बतातीं उससे ज़्यादा रोतीं। मैं और दुखी होता। बहनों के बारे में सुनकर मेरे मन में पहली-पहली जो बात आई वह यही थी कि मेरे कुकर्म, मैडम के श्राप के ही कारण यह हुआ है।

“मैं आत्मग्लानि से ऐसा छटपटा उठा कि मन में आया कि बाबू जी की तरह आत्महत्या कर लूँ। मेरे कुकर्मों की सज़ा मौत ही है। मेरे कुकर्म ही के कारण घर ऐसे बर्बाद हुआ। मेरा ही नहीं साहब का भी। मैडम, साहब कहाँ जीवन भर यह चोट भुला पाएँगे। अब वह कहाँ पहले की तरह हँस-बोल पाएँगे, कहाँ जीवन में किसी पर विश्वास कर पाएँगे। लेकिन अम्मा की हालत ने आत्महत्या करने से रोक दिया। मैंने सँभल कर अम्मा के बारे में सोचा कि इनकी सेवा करके प्रायश्चित करूँगा। तबाह बरबाद घर को फिर से बनाऊँ यही सोच कर एक छोटी सी एक दुकान खोली। दाल-रोटी किसी तरह चलने लगी। लेकिन भगवान ने जैसे अम्मा के जीवन में कष्ट ही कष्ट लिखा था। दो महीने बाद ही अम्मा दुनिया छोड़ गईं। मैं हफ़्तों घर के बाहर ही नहीं निकला। पहले से ही किसी तरह खींचतान कर चल रही दुकान बंद रही। सारे ग्राहक टूट गए। जब दुकान फिर से खोली तो वह चल नहीं सकी। सामान थोक में दे जाने वालों का कर्ज़ा था, तो उसे चुकाने में दुकान बिक गई। मैं सड़क पर आ गया।

“मजबूरी में फिर मज़दूरी करने लगा। अब ना कोई आगे है, ना पीछे। मज़दूरी है, मैं हूँ, ज़िंदगी कट रही है। मगर मैडम भुलाए नहीं भूल रही हैं। हर समय एक आँख से मुझे अपना बर्बाद तबाह घर दिखता है तो दूसरी आँख से सीधी-सादी, सरल, भली महिला मैडम। और उन्हें देखकर मैं हमेशा यही समझने की कोशिश करता हूँ कि साहब, मैडम ने क़ानून से कठोर सज़ा क्यों नहीं दिलवाई। उससे भी हज़ार गुना ज़्यादा कठोर सज़ा उन्होंने स्वयं मुझे क्यों दी। यह सज़ा देने की बात उनके दिमाग़ में कैसे आई।"

"यह क्या तुम बार-बार कह रहे हो? मैडम ने तुम्हें कौन सी सज़ा दी। वह भला तुम्हें कौन सी सज़ा दे सकती थीं, जो इतनी कमजोज़ो थीं कि डर कर बेहोश हो गईं।" 

"असल में अपराध तो बाबू जी मैंने रेप का किया था। रुपए की चोरी तो लगे हाथ हो गई थी। लेकिन मैडम, साहब ने रेप की रिपोर्ट लिखवाई ही नहीं थी। डकैती, जानलेवा हमला बस यही रिपोर्ट थी।" 

"क्या?" 

"हाँ साहब। आप भी चौंक गए ना। मैं यही तो सोच-सोच कर, हैरान, परेशान रहता हूँ कि मैडम और साहब ने क्या यही सोच कर मेरी जान बचाई कि मैं सोच-सोच कर जीवन भर तिल-तिल कर मरूँ। अपने तबाह हो चुके घर पर हमेशा आँसू बहाता रहूँ। अपनी बहनों के बर्बाद होने पर रोता रहूँ। अपनी माँ की तिल-तिल कर हुई मौत पर ख़ून के आँसुओं से जीवन भर रक्त स्नान करता रहूँ। अब आप ही बताइए कि यह मौत की सज़ा से भी कठोर सज़ा है कि नहीं।"

उसकी यह बात सुनकर मैं बड़ा खिन्न हो गया। मैंने उससे कहा, "अब पता नहीं कठोर सज़ा है कि नहीं। चलो, अच्छा अब काम करो।" उसकी बातें सुनते-सुनते अब तक मेरा मन बहुत उखड़ चुका था। उसके प्रति घृणा से भर चुका था। मैंने उससे यह नहीं कहा कि रेपिस्ट, गंदे इंसान वह भली औरत, आदमी अपनी इज़्ज़त को लेकर इस सोच के होंगे कि दुनिया इस बात को ना जाने कि उनकी इज़्ज़त लुट गई है। टीआरपी के लिए मीडिया उनके साथ हुई दरिंदगी को हथियार ना बनाए। तुम वह जानवर हो जिसने उसी पर हमला किया जो बड़ा हृदय, मानवता के नाते तुम्हें वही खाना-पीना दे रही थी जो ख़ुद के लिए बनाती थी। तुझे उसने इंसान समझा, लेकिन तू विश्वासघाती, खूँखार जानवर निकला। हाँ उनकी जगह मैं, मेरी पत्नी होती तो हम तुम्हें फाँसी तक पहुँचा कर ही दम लेते। ना मीडिया को हथियार बनाते और ना उनको बनाने देते। तेरी सच्चाई ने मुझे अपने परिवार की जीवन शैली, संस्कार को लेकर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश कर दिया है।

शाम को जब काम ख़त्म कर मिस्त्री-मज़दूर हाथ-मुँह धोने लगे तो मैंने सब का पूरा-पूरा हिसाब करके कह दिया कि कल से काम बंद रहेगा। सब के मोबाइल नंबर मेरे पास हैं। जब ज़रूरत होगी तो मैं बुला लूँगा। उस रेपिस्ट को मैंने बहुत हिकारत, घृणा से पैसा दिया। उसके नमस्ते का भी जवाब नहीं दिया। उसके चेहरे के भाव मुझे बता रहे थे कि उसने मेरे चेहरे के भाव पढ़ लिए हैं, कि उसके प्रति मुझमें कितनी घृणा भर गई है। आगे मैंने तीन दिन तक काम बंद रखा। घर, बाहर कहीं भी मैं अपने स्वभाव के अनुसार खुलकर हँसी-मज़ाक, बातचीत नहीं कर पा रहा था।

मिसेज ने पूछा तो कह दिया कि थकान महसूस कर रहा हूँ। दो-तीन दिन आराम के बाद फिर शुरू करवाऊँगा। मेरे शांत रहने पर उसने जब ज़्यादा ज़ोर देकर पूछा कि आख़िर बात क्या है? तो मैंने उसे सारी बात बताई। उसने कहा, "मैं भी उसे अच्छा आदमी समझ रही थी। मगर जो भी हो दुनिया को इस मानसिकता से बचाने के बारे में सोचना ही चाहिए। ऐसा समाज, ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें रेप के बारे में सोचने का कोई कारण ही ना बचे। लोग निश्चिंत होकर जैसे चाहें वैसे कपड़े पहनें, रहें, खाएँ-पिएँ।"

जल्दी ही मैंने मकान का अधूरा काम पूरा करवाया। इस दौरान मैंने परिवार को मिनट भर के लिए भी अकेला नहीं छोड़ा। हर मज़दूर, कारीगर में मुझे वही गंदा रेपिस्ट नज़र आता। इनको मैं परिवार के सदस्यों के सामने फटकने भी नहीं देता था। बीवी से, अपनी साथी से बहुत बड़ी-बड़ी चर्चा के बाद हमारा निष्कर्ष यह निकला कि जो भी हो हमें अपनी मौलिकता नहीं छोड़नी चाहिए। जो स्वाभाविक है वही सुंदर है। सुरक्षित है। नक़ली कभी सुंदर नहीं हो सकता और ना ही सुरक्षित। इस निष्कर्ष के साथ ही हमने हमारी जीवन शैली में बहुत कुछ परिवर्तन भी किया। और हाँ, तिलक वाले अकाउंटेंट साहब से अब मेरी तीखी बहस नहीं होती।

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कहानी
पुस्तक समीक्षा
पुस्तक चर्चा
बात-चीत
विडियो
ऑडियो