टेढ़ा जूता 

01-08-2021

कोहरे से ढकी वह सुबह ठंड से ठिठुर रही थी। कोहरा इतना कि दस-बारह क़दम आगे चल रहा आदमी भी गुम हो जा रहा था। मैं ढेर सारे ऊनी कपड़े पहने, टोपी के ऊपर मफ़लर कसे हुए था। केवल आँखें दिख रही थीं, जिस पर चश्मा लगा रखा था। लेकिन घर से निकलने के कुछ देर बाद ही मुझे चश्मा वापस जेब में रखना पड़ा। क्योंकि कोहरा इस तरह ग्लास को ढक ले रहा था कि वह ओपेक हो जाता, कुछ भी दिखाई नहीं देता। 

मैं पंचर बाइक लिए पैदल ही चल रहा था। उसे स्टार्ट कर पहले गियर में हल्का एक्सीलेटर ले रहा था। इससे उसे खींचने में ताक़त नहीं लगानी पड़ रही थी। पेट्रोल पंप क़रीब एक किलोमीटर दूर था।

हवा भरवाने के बाद मुझे क़रीब पंद्रह किलोमीटर दूर दस बजे तक अपने ऑफ़िस पहुँचना था। इस घने कोहरे के चलते मैं किसी से या कोई मुझसे भिड़ न जाए, इसलिए मैंने हेड-लाइट ऑन कर रखी थी।

सड़क पर बहुत कम ट्रैफ़िक था। बहुत ही कम लोग और गाड़ियाँ दिख रही थीं। मैं जब पम्प पर पहुँचा तो हवा मशीन पर हमेशा जो लड़का मिलता था, वह नहीं मिला। पम्प के ऑफ़िस की तरफ़ देखा तो वह दरवाज़ा खोलकर आता हुआ दिखाई दिया। 

उसने पूरा कंबल इस तरह लपेट रखा था कि उसकी भी केवल आँखें ही दिखाई दे रही थीं। पहिया देखते ही उसने कहा, "साहब अब इसका टायर-ट्यूब बदलवा ही दीजिए। बहुत पुराना हो गया है।"

मैं पेट्रोल, हवा के लिए हमेशा वहीं जाता हूँ, इसलिए वह बातूनी लड़का बात कर लेता है। उसकी बात सही भी थी कि, टायर-ट्यूब बदलवाने वाले हो गए हैं। मगर गृहस्थी के प्रेशर और कोरोना वायरस के तले दबी अर्थ-व्यवस्था ने नौकरी भी दबोच रखी थी। वेतन आधा मिल रहा था। किसी तरह घर, जीवन खींच रहा था। उस बातूनी से मैं क्या कहता कि, इस छह साल पुरानी बाइक से भी ज़्यादा ख़राब चल रही है गृहस्थी की हालत।

वह हवा भरने का अपना ताम-झाम सही कर रहा था और मैं तमाम कपड़ों के बावजूद कँपकँपी महसूस कर रहा था। हेलमेट बाइक की हेड-लाइट पर था, मैंने उसे भी पहन लिया। उसकी भी हालत बाइक जैसी ही थी।

मैं सड़क की ओर मुँह किए था। तभी मुझे आठ-दस क़दम की दूरी पर वह टेढ़ा जूता फिर दिखाई दिया, जो पिछले कई महीनों से, मैं जब भी समय से ऑफ़िस आता-जाता तो उसी सड़क पर दिखता था।

जिस व्यक्ति के पैरों में वह टेढ़ा जूता इतने दिनों से देख रहा था, उसके बारे में तब इतनी ही कन्फ़र्म जानकारी थी कि वह उसी कंपनी में है, जिसमें मैं हूँ। यह बात भी उस दिन जान पाया, जिस दिन कंपनी के सभी कर्मचारियों को कंपनी की युनिफ़ॉर्म पहनकर ऑफ़िस पहुँचना होता है। लेकिन वो किस विभाग में हैं, यह नहीं मालूम हुआ।

मैं जिस विभाग में हूँ उसका ऑफ़िस शहर के दूसरे छोर पर है। शहर भर में कंपनी के दर्जनों ऑफ़िस में हज़ारों कर्मचारी हैं। उनमें किसी के बारे में जानना तब-तक बहुत मुश्किल है जब-तक कि विभाग आदि की सही जानकारी ना हो।

मैं जब भी उन सज्जन को देखता तो बहुत परेशान हो जाता। उनका टेढ़ा जूता, जिसके तलवे इतने घिस गए थे कि, उन्होंने उसके नीचे टायर की पतली पट्टी जड़वा ली थी। काम बहुत रफ़ ढंग से किए जाने के कारण जूता टेढ़ा हो, आगे की ओर उठा हुआ था।

वह इतना डिस्शेप हो गया था कि, उससे उनके चलने का तरीक़ा ही बदल गया था। तरीक़े से साफ़ पता चलता था कि, वह उन्हें काफ़ी तकलीफ़ दे रहा है। उस समय मेरा ध्यान उनकी बाक़ी तकलीफ़ों की तरफ़ गया और उन तकलीफ़ों का एहसास कर मैं सिहर उठा। 

जनवरी के पहले हफ़्ते की उस हाड़ कंपा देने वाली ठंड में उन्होंने ऊनी कपड़ों के नाम पर यूनिफ़ॉर्म वाले कलर का प्लेन स्वेटर पहन रखा था। जो काफ़ी पुराना होने के कारण कॉटन कपड़े की तरह उन पर झूल रहा था। सिर की टोपी का भी यही हाल था। 

एक तो तकलीफ़देह टेढ़ा जूता, ऊपर से मात्र पाँच-छह डिग्री टेम्प्रेचर में ठिठुरती सुबह में उन सत्तावन-अठावन वर्षीय सज्जन का पैर भी ठीक से उठ नहीं रहा था।

साफ़-साफ़ दिख रहा था कि वह बहुत ही कठिनाई में हैं। हमेशा की तरह उनके चेहरे पर एक गहन उदासी छाई हुई थी, जिसे पूरे शहर को ढकने वाला कोहरा भी छिपा नहीं पा रहा था। 

वह सिर झुकाए अपने क़दमों से कुछ आगे देखते हुए छोटे-छोटे क़दमों से बढ़ते जा रहे थे। जूते के कारण वह बड़ा क़दम नहीं उठा पा रहे थे। जिस तरफ़ वह जा रहे थे, उस तरफ़ कम्पनी का सबसे नज़दीकी ऑफ़िस भी क़रीब तीन किलोमीटर आगे था। मैंने सोचा इस तरह इन्हें ऑफ़िस पहुँचने में लगभग पौन घंटा लग जाएगा। इस ठंड में इतनी देर तक इनका बाहर बने रहना, प्राण-घातक है।

मैं इनसे क़रीब आधी उम्र का हूँ, युवा हूँ, फिर भी ठंड बर्दाश्त नहीं हो रही है। अचानक ही मैंने सोचा कि, अपने ऑफ़िस जाने के बजाय पहले इन्हें इनके ऑफ़िस छोड़ दूँ। मुझे होती है देर तो हो जाए। एक घंटे की शार्ट लीव ले लूँगा। मैं यह सोच ही रहा था कि, वह मेरे सामने से आगे निकल गए। इस बीच लड़का अपना ताम-झाम फ़िट कर हवा भरने लगा। मैंने कहा, "बेटा, ज़रा जल्दी कर दे, देर हो रही है।"

"बाबूजी जब-तक आप बोहनी के लिए पैसे निकालेंगे, तब-तक हवा भर जाएगी। जिस दिन आपसे बोहनी करता हूँ, उस दिन बहुत बढ़िया काम चलता है।"

उसकी बातों पर ध्यान दिए बिना मैंने उसे पैसे दिए और गाड़ी स्टार्ट करके अपोज़िट साइड से ही उनकी तरफ़ चल दिया। वह मुझे हमेशा अपोज़िट साइड ही चलते मिलते थे। इसकी वज़ह मैं नहीं जानता। 

मैंने उनके पास बाइक रोकते हुए कहा, "आइए सर चलते हैं।" यह कहने से पहले मैंने उनका कम्पनी में अभिवादन के लिए प्रयोग होने वाले शब्दों में अभिवादन किया। इससे उन्हें यह समझने में देर नहीं लगी कि, हम एक ही कंपनी में हैं। उन्होंने ज़रा रुक कर कहा, "अरे आप परेशान न होइए, अभी काफ़ी टाइम है, मैं पहुँच जाऊँगा।"

ऐसी हालत में भी उनका या संकोच द्रवित कर गया। मैंने बड़ी विनम्रता से कहा, "सर मैं भी ऑफ़िस ही चल रहा हूँ, परेशानी वाली कोई बात नहीं है। आइए बैठिये। देखिये ना कितना कोहरा हो रहा है।"

वह बैठ गए तो मैंने बाइक आगे बढ़ाई। मैं अपनी आदत के अनुसार तेज़ नहीं चल रहा था। धीरे-धीरे चल रहा था जिससे उन्हें हवा से और ज़्यादा तकलीफ़ ना हो।

ऑफ़िस के गेट पर जब उन्हें उतारा, तब-तक मैंने उनका नाम, सेक्शन जान लिया था। उनका पद भी। वह डिप्टी मैनेजर थे। मेरा ब्योरा सुन कर बोले, "अरे! आप तो उल्टा आ गए। आपका ऑफ़िस तो पीछे है।"

मैंने तुरंत झूठ बोला कि, "जी हाँ, लेकिन कुछ काम से मुझे आगे जाना है। ऑफ़िस देर से जाऊँगा।"

इसी के साथ उन्हें नमस्कार किया तो वह बड़ी विनम्रता से जवाब देकर लड़खड़ाते क़दमों से अंदर चले गए। बाइक पर लगी हवा ने उनके पैरों को और जकड़ दिया था।

मैंने उन्हें दिखाने के लिए गाड़ी थोड़ा आगे बढ़ाई, जब वह ओझल हो गए तो वापस मुड़कर ऑफ़िस चल दिया। आदत से भी तेज़ स्पीड में, जिससे ऑफ़िस में कम से कम लेट पर तो साइन करने को मिल जाए।

अस्सी-नब्बे की स्पीड में हवा इतनी तीखी, ठंडी लग रही थी, ऐसी सूई सी चुभ रही थी मानो बदन को भेद कर निकल जाएगी। जैसे तन पर कोई कपड़ा ही नहीं है। मगर इस ठंडी सूई से ज़्यादा उनकी यह बात चुभ रही थी कि, वह सज्जन डिप्टी मैनेजर हैं। जिनकी सैलरी प्रति माह एक लाख रुपये से कम हो ही नहीं सकती।

मन में बार-बार यही प्रश्न उठ रहा था कि, ठीक-ठाक जीवन जीने भर के लिए पर्याप्त वेतन के बावजूद ऐसी कौन सी बात है कि, यह इतनी दयनीय हालत में हैं। कुछ ना कुछ असाधारण बात ज़रूर होगी, वरना कोई अपने को इतनी विपत्ति में क्यों डालेगा। इतना भीषण कष्ट क्यों सहेगा। अपने प्राण संकट में क्यों डालेगा। कारण जो भी हो वह निश्चित ही बहुत गंभीर होगा। इसे पता ज़रूर करूँगा। मुझसे से कुछ मदद हो सकी तो ज़रूर करूँगा।

जब ऑफ़िस पहुँच कर लेट रजिस्टर पर, ग्लब्स उतार कर साइन कर रहा था तो मेरी उँगलियाँ ठण्ड से अकड़ रही थीं। सीट पर पहुँच कर चाय मँगवा कर पी तो थोड़ी राहत महसूस हुई। दिन-भर उनके बारे में और जानने की सोच-सोच कर रुक जाता कि, कहीं बात उन तक पहुँच गई तो उन्हें दुख होगा।

दिन पूरा बीतने वाला था लेकिन कहने को भी धूप की कहीं कोई चमक भी शहर ने नहीं देखी। मैं स्पष्ट देख रहा था कि, शाम सुबह से भी ज़्यादा ठंडी होने जा रही है। मुझे उनकी बड़ी चिंता हो रही थी। मुझे अब-तक यह मालूम हो गया था कि, ऑफ़िस से उनका घर क़रीब पाँच किलोमीटर दूर है। मैं छुट्टी होने से पहले ही उनके ऑफ़िस के गेट तक पहुँच जाना चाहता था। जिससे उन्हें गेट पर ही पिक कर लूँ।

यह सोच कर अपने सीनियर से ज़रूरी काम है, बोलकर मैं बीस मिनट पहले ही निकल लिया। मेरे पहुँचने के दस मिनट बाद ही वह गेट से बाहर निकलते दिख गए। वह फिर उसी गहन उदासी के साथ छोटे-छोटे क़दमों से घर की ओर बढ़ चले थे।

जब वह दस-बारह क़दम आगे बढ़ गए तो मैंने उनके पास पहुँच कर कहा, "आइए सर चलते हैं।"

वह मुझे फिर से देख कर सकपका से गए। मैंने फिर कहा, "बैठिये सर मैं भी उधर ही चल रहा हूँ।"

वह बैठ गए। मैं कुछ ही आगे बढ़ा था कि उन्होंने पूछा, "आज दिन-भर इधर ही किसी ऑफ़िस में रहे क्या?"

मैं अचानक कुछ समझ नहीं पाया कि, सच बोलूँ कि झूठ। उनके बारे में यह जान चुका था कि, बड़े स्वाभिमानी हैं और किसी से मदद स्वीकार नहीं करते। इसलिए मैंने तुरंत झूठ बोला, "हाँ सर, आज कुछ ऐसी स्थिति बनी कि, कई बार इधर-उधर जाना पड़ा। यह कम से कम डेढ़ महीने ऐसे ही चलेगा।"

"ओह, इस ठंड में तो इतनी दूर से आप परेशान हो जाएँगे।"

"नहीं सर, ऐसी कोई बात नहीं है। जब घर से बाहर निकलो तो थोड़ी देर ठंड परेशान करती है। उसके बाद तो सब नॉर्मल हो जाता है।"

मैं उनसे बराबर झूठ बोल रहा था। सच यह है कि, मैं ठंड से कुछ ज़्यादा ही परेशान होता हूँ। डेढ़-दो महीने ऐसे ही चलने वाली बात भी बिलकुल झूठी थी। उन्हें इतने दिनों तक घर, ऑफ़िस छोड़ने के लिए झूठ बोल रहा था। डेढ़ महीने बाद वसंत आते-आते मौसम सही हो जाता है।

दिन-भर मैं उनकी परेशानी जानकर उन्हें दूर करने के बारे में सोचता रहा था, लेकिन जब मैं उनके घर पहुँचा तो घर देखकर और भी ज़्यादा सशंकित हुआ। अच्छा ख़ासा बड़ा सा मकान था। वह बाइक से उतरे और बहुत ही जल्दी से ऑफ़िस वाला अभिवादन कर, मेन गेट से ना जाकर, साइड में लगे एक छोटे से गेट से अंदर चले गए।

यह भी नहीं देखा कि, मैंने उनके अभिवादन का जवाब दिया कि नहीं। फ़ॉर्मेलिटी के लिए भी यह नहीं कहा कि, बहुत ठंड है, आइए एक कप चाय पीकर जाइए। उनके इस व्यवहार से मेरी इस आशंका को और बल मिला कि, इनके साथ कोई ना कोई विकट समस्या ज़रूर है। वरना जैसा मालूम हुआ है, उस हिसाब से यह सज्जन, मिलनसार आदमी हैं।

जब मैं वापस घर की तरफ़ चला तब-तक शाम स्लेटी से काली हो चुकी थी। अँधेरा हो चुका था। कोहरे ने अपनी चादर का तंबू हर तरफ़ तान दिया था। उनके बारे में तमाम तरह की आशंकाओं को लिए घर पहुँचा।

मिसेज़ ने अंदर आने देने से पहले मुझ पर सिर से पाँव तक सेनिटाइज़र स्प्रे किया। फिर बाथरूम में जाकर साबुन से ख़ूब हाथ-पैर धोकर मैं सीधे रूम हीटर के सामने बैठ गया। नल के बर्फ़ीले ठंडे पानी से हाथ-पैर बिलकुल सुन्न हो रहे थे। 

मैंने ग़ुस्से में चीन को जानबूझ कर निहित स्वार्थों के लिए कोविड-१९ महामारी दुनिया-भर में फैलाने के लिए कई अपशब्द कहे। जिसे सुन कर मिसेज़ ने कहा, "लो पहले गरम-गरम चाय पियो। उसके बाद उस कीड़े-मकोड़े खाने वाले शी पी ची को जो मन आये ,जितना आये कहना। वैसे है वो बड़ी मोटी खाल का, किसी की सुनने वाला नहीं।"

वह चीनियों को ऐसे ही ऊल-जलूल शब्दों से सम्बोधित करती है। नाश्ता देकर वह किचेन में चली गई। मैं गरम चाय के साथ गरम पकौड़ियाँ खा रहा था, लेकिन सर मेरी आँखों के सामने बने हुए थे। कल उन्हें ऑफ़िस छोड़ने के बाद, अपने ऑफ़िस टाइम से कैसे पहुँचूँ यही सोच रहा था।

बाइक के पहिये ने घर पहुँचते-पहुँचते एक बार फिर धोखा दे दिया था। हवा आधी रह गई थी। अगले दिन के लिए मैं जो-जो योजनाएँ बना रहा था, उस हिसाब से मुझे बाइक बिल्कुल फ़िट चाहिए थी। 

महीने की शुरुआत ही थी लेकिन बच्चों की फ़ीस वग़ैरह देने के बाद ज़्यादा पैसा नहीं है या पत्नी से पहले ही सुन चुका था। ऑनलाइन होने के बावजूद स्कूल फ़ीस वसूली में कोई रियायत नहीं दे रहे थे। मिसेज़ का मूड इससे बराबर ख़राब बना हुआ था।

ऐसे में मैंने काम-भर के पैसे माँगे तो वह कुछ प्रश्न-भरी दृष्टि से देखती हुई बोली, "इस समय इतने पैसे क्या करेंगे?"

उसके बिगड़े रूप से मैं समझ गया कि, यह आसानी से पैसे देने वाली नहीं है। असल में घर का प्रबंधन वह अपनी ख़ूबसूरती से भी ज़्यादा ख़ूबसूरती से करती है। इसके लिए वह ख़र्च देश की वित्त मंत्री की तरह बड़ी सावधानी और सख़्ती से करती है, लेकिन उनकी तरह कर्ज़ की अर्थ-व्यवस्था बिल्कुल नहीं अपनाती। उसे कर्ज़ शब्द से नफ़रत है।

मैंने सोचा कि, बिना मस्केबाज़ी के माँग पूरी होने वाली नहीं है तो, बहुत ही सीरियस मुँह बनाए हुए स्लो मोशन में उठा। उसके एकदम सामने खड़ा हुआ। फिर एकदम से जौली मूड में आते हुए उसे बाँहों में जकड़ कर कहा, "अरे मेरी चंपाकली, चंपाकली, समझती क्यों नहीं मेरी अनारकली, बाइक के टायर-ट्यूब बदलवाने हैं। अभी। अब चलने लायक़ नहीं बचे हैं। सुबह हवा भरवाई थी, इस समय फिर पंचर है। इस बर्फ़ीली ठंडी में कल पैदल जाऊँगा क्या?"

यह कहते-कहते मैंने उसे होंठ, गाल, माथे पर कसकर चूम लिया। वह हूँ . . . करती हुई छूटने के लिए ज़ोर लगाती रही। मस्केबाज़ी से भरा मेरा किस अभियान बंद होते ही बोली, "छोड़ो, बच्चे आ जाएँगे. . ."

"आ जाएँगे क्या? आ गए हैं मेरे दोनों शेर।"

चार और छह वर्षीय बेटों को देखकर मैंने कहा। तभी मेरे सबसे मसखरे बड़े बेटे ने पूछा , "पापा जी क्या कर रहे हैं?"

मैंने पत्नी को लिए-लिए पूरा एक चक्कर घूम कर कहा, "बेटा तुम्हारी मम्मा को डांस सिखा रहा हूँ। इन्हें आता नहीं ना।"

पत्नी को लिए मैं अभी भी दाएँ-बाएँ हो रहा था। वह अभी भी मेरी गिरफ़्त से छूटने का प्रयास कर रही थी। बेटे ने फिर पूछा, "पापा जी यह कौन सा डांस है?"

आख़िर बेटे ने फँसा ही दिया। कोई डांस होता तब तो बताता। मैंने चंपाकली को छोड़ते हुए कहा, "बेटा सिखाते-सिखाते नाम भूल गया हूँ। याद आते ही बताऊँगा। अभी मार्केट जा रहा हूँ, तुम-दोनों के लिए चॉकलेट ले आऊँगा। तब-तक अपना होम-वर्क करो।"

मैंने यह कह कर दोनों को अंदर भेज दिया। छोटा बेटा बहुत शांत है। इस मस्केबाज़ी से मुझे पैसे मिल गए। मैंने जाते-जाते हँसते हुए कहा, "चंपाकली जी सच में तुम बहुत अच्छी हो। बिलकुल कद्दू के पीले फूल जैसी।"

"अच्छा! लौट कर आइये तो बताती हूँ कद्दू का फूल कैसा होता है।"

यह कहती हुई मिश्री की डली हँसी तो मैं अचानक ही एक बार फिर उसे चूम कर बाइक के पास पहुँच गया। इस बार वह आँखें दिखाती हुई भुनभुनाई, "अब आदत बदल दो समझे। बच्चों के सामने शर्मिंदा करते हो, तुम्हें तो शर्म आती नहीं।"

पत्नी को मैं अलग-अलग समय पर, अलग-अलग नामों से बुलाता हूँ। दुनिया की आँखों को वह कुछ साँवली और थोड़ी हेल्दी भी दिखती है, लेकिन मुझे पहले दिन से ही वह परी दिखी तो आज भी परी ही दिखती है। मेरी घर गृहस्थी, मुझे सँभालने, समझने वाली मेरी परी।

जब मैं घंटे भर बाद लौटा टायर-ट्यूब लगवा कर, तो वह दाल भरा और आलू भरा पराठा, मटर-पनीर की सब्ज़ी बनाकर, खाने पर इंतज़ार कर रही थी। गाजर का हलवा भी बच्चों की फ़रमाइश पर बनाया था।

कोविड-१९ के डर से एक बार फिर उसने पहले ही की तरह ख़ूब हाथ धुलने के लिए कहा। सेनिटाइज़र स्नान तो दरवाज़े पर ही करवा दिया। हर महीने एक हज़ार रुपये का यह ख़र्चा भी सिर-दर्द बना हुआ है। 

बैठते ही उसने गर्म पानी पीने को दिया। इस महामारी के फैलने के बाद उससे बचने के लिए, जो कुछ वह जानती-समझती, सुनती वह सारी सावधानी पूरी सख़्ती से आज भी बरतती आ रही है।

सेनिटाइज़र, मास्क के बिना मैं बाहर क़दम नहीं रख सकता। सर को मैंने मास्क की जगह एक सिंपल सा घर पर ही बना मास्क लगाए देखा था। जिसको लगाने से कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं था। सेनिटाइज़र तो दिखा ही नहीं।

दस बजते-बजते बच्चे खा-पी कर सो गए। मैं अपनी कुमुदकली के साथ रजाई में लेटा था। आधी तनख़्वाह से दुनिया की तरह तंग होती जा रही घर की आर्थिक हालत पर बातें कर रहा था। मोबाइल पर स्थानीय टेंपरेचर चार डिग्री बता रहा था, जो देर रात तीन तक पहुँचने वाला था।

ठंड से बचने के लिए हमने रजाई के ऊपर कंबल भी डाल रखा था। जिस चीज़ की भी तरफ़ मेरा ध्यान जाता, मैं उसी के बारे में सोचता कि, पता नहीं सर के पास है कि नहीं, इतनी ठंड में उनके पास रजाई-गद्दे ना जाने क्या-क्या, किस तरह के हैं।

अगले दिन सुबह मैं उनके घर जल्दी पहुँच गया कि, उन्हें ऑफ़िस छोड़ने के बाद मैं भी समय से ऑफ़िस पहुँच जाऊँ। शाम के लिए उनसे कहा आप पंद्रह मिनट लेट निकलिएगा, मैं आपको गेट पर ही मिलूँगा। वह मेरी बात मान गए।

इस तरह मैंने उन्हें ठंड में रोज़ घंटों पैदल चलने से तो बचा लिया, लेकिन ठंड से बचाने का कोई रास्ता नहीं ढूँढ़ पा रहा था। उन्हें वूलन कपड़े दिलाने के लिए अपनी जूही कली से पैसे भी ले लिए थे। सच बोलकर ही।

वह उनकी सारी स्थिति जानने के बाद कुछ देर तक पता नहीं क्या सोचती रही। फिर बोली, "जब उनकी यह हालत है, तो पत्नी की हालत तो और भी ख़राब होगी। उन तक कैसे पहुँचोगे?"

मैंने कहा, "तुम सही कह रही हो। जब वह ऑफ़िस ऐसी हालत में जा रहे हैं तो मिसेज़ तो घर पर रहती हैं। उनकी हालत तो और भी ज़्यादा ख़राब होना निश्चित है। लेकिन मुश्किल तो यह है कि, उनको ज़रा भी एहसास हो गया कि, उनकी दयनीय हालत को देखकर मैं यह सब कर रहा हूँ तो, उनका जो स्वभाव है, उससे वह निश्चित ही नाराज़ होकर साथ चलना भी बंद कर देंगे।"

मैं यही सब सोचकर बड़ी सावधानी बरत रहा था।

संयोग से मुझे पाँचवें दिन उनकी मिसेज से मिलने का अवसर मिल गया। वह किसी दुविधा में ना पड़ें, इसलिए मैं रोज़ की तरह उन्हें गेट पर ही छोड़ कर वापसी के लिए तुरंत मुड़ा, लेकिन तभी उन्होंने पहले दिन वाली मेरे मन की बात कह दी, "आइये दो मिनट चाय पीकर जाइए, बड़ी सर्दी हो रही है।"

मैं उनके कमरे, उनकी मिसेज की हालत देखकर हतप्रभ रह गया। एक छोटा सा कमरा, जिसका हर सामान सर की तरह ही दयनीय हालत में था। हर चीज़ ऐसी थी जिसे ज़बरदस्ती ही प्रयोग में लाया जा रहा था। बेड पर लेटी उनकी मिसेज को मैंने प्रणाम किया तो वह बड़ी मुश्किल से मुझे जवाब दे सकीं। मेरे प्रश्नानुकूल चेहरे को देखकर सर बोले, "डॉक्टर ने आराम करने को कहा है। आप बैठिए न।"

उन्होंने कमरे में एल शेप में पड़े दूसरे बेड पर मुझे बैठने के लिए कहा। मैं बिना समय गवाएँ ही बैठ गया। मुझे डर था कि, यदि ग़लती से भी इन्होंने यह सोच लिया कि मैं हिचक रहा हूँ तो यह बहुत दुखी होंगे।

मेरे बैठते ही वह कमरे से लगे बाथरूम में हाथ धोकर किचेन में चाय बनाने जाने लगे, उनके थके हुए क़दमों को देखकर मेरी आँखें भर आईं। मैंने कहा, " सर प्लीज़, आप बैठिये। मैं चाय अच्छी बना लेता हूँ। आज आप लोग मेरे हाथ की बनी चाय पीजिये।"

"नहीं-नहीं, यह बिलकुल भी उचित नहीं कि मैं आपसे चाय बनवाऊँ। फिर यह तो रोज़ का काम है। मुझे बनाना तो है ही।" 

तभी लेटे-लेटे ही उनकी मिसेज ने कहा, "हाँ बेटा, आप बैठिये, यह कर लेंगे।"

मैं बेहद संकोच के साथ बैठ गया। बैठते ही उनसे पूछा, "आपको क्या हो गया है?"

"जीवन है बेटा, उम्र भी हो चली है तो कुछ ना कुछ तो लगा ही रहेगा।"

वह चेहरे पर मुस्कान लाने का प्रयास करती हुई बोलीं। उनकी मुस्कान में दर्द का जो अक़्स मुझे दिखा, उसने मुझे बहुत ही ज़्यादा द्रवित कर दिया। मेरी हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि मैं उनसे पूँछूँ कि आपको इतनी क्या तकलीफ़ है कि, आप चाह कर भी उठ नहीं पा रही हैं। मैं सोचने लगा उनकी पीड़ा को कि, आख़िर वह सर के दिन भर ना रहने पर कैसे रहती हैं।

अकेले लेटे-लेटे कैसे इतनी पीड़ा बर्दाश्त कर लेती हैं। सर अंदर चाय बना रहे थे और वह बेटा-बेटा कह कर मुझसे पत्नी-बच्चों का हाल-चाल लेती जा रही थीं।

कुछ ही देर में सर मुझे हाथ में पुरानी सी स्टील ट्रे में चाय-नाश्ता लिए दिखे। मैंने लपक कर उनके हाथों से ट्रे लेकर सामने पड़ी प्लास्टिक की छोटी सी टेबल पर रख दिया। तभी वह मिसेज़ के पास पहुँचे, उन्हें पकड़कर बड़ी सावधानी से उठा कर बैठाया।

इस दौरान दोनों लोगों के चेहरे पर आई दर्द की लहरियों ने मुझे भीतर तक झकझोर कर रख दिया। मैं खड़ा उनकी दारुण पीड़ा को देखता रहा। उन्हें बैठा कर सर बाथरूम से एक बाल्टी में पानी और साबुन ले आये। दूसरी ख़ाली बाल्टी में उनका हाथ धुलवाया। फिर वापस बाथरूम जाकर आते हुए बोले, "आप बैठिए ना, चाय पीते हैं।"

उन्होंने चाय, बिस्कुट, नमकीन ट्रे में रखकर उसे रजाई से ढके मिसेज़ के पैरों पर रख दिया। ख़ुद मेरे साथ टेबल आगे खींच कर बैठ गए।

चाय पीते हुए ही पता चला कि, उनकी मिसेज भी चाहती थीं कि जब मैं घर तक आ ही रहा हूँ, तो चाय पी कर ही जाया करूँ। इतनी तकलीफ़ के बावजूद उन दोनों लोगों की हिम्मत साहस देख कर मैं अभिभूत था।

मन में बार-बार यह प्रश्न उठ रहा था कि, गेट पर नेम-स्टोन भी इन्हीं का लगा हुआ है, कार ,बाइक भी खड़ी है। फिर यह इतने कष्टों को झेलते हुए इस छोटे से सर्वेंट क्वार्टर में, ऐसी हालत में क्यों पड़े हुए हैं।

उनका कष्ट मुझसे देखा नहीं गया तो मैंने बड़ी हिम्मत कर के बच्चों के बारे में पूछ लिया। बच्चों का प्रसंग आते ही उनके चेहरों पर पीड़ा की रेखाएँ कुछ ऐसे गाढ़ी हुईं कि जैसे अनगिनत फाँसें उनके हृदय को बेधती चली जा रही हों।

दोनों लोग कुछ देर तक अपने आस-पास ही इधर-उधर ऐसे देखते रहे मानो अचानक ही दुखों का कोई महाकाय डरावना बवंडर आ गया हो। और उसके गुज़र जाने की वह थरथराते हुए प्रतीक्षा कर रहे हों।

उनकी ऐसी हालत देख कर मैं सहम गया। स्वयं पर बड़ा ग़ुस्सा आने लगा, बड़ा पछतावा होने लगा कि, यह प्रसंग उठाने की मूर्खता मैंने क्यों की? इनके साथ मेरा यह कृत्य किसी क्रूरता-पूर्ण कुकृत्य के अलावा और कुछ नहीं है। मैं तुरंत विषयांतर कर उन्हें कष्ट से दूर ले जाने का रास्ता ढूँढ़ ही रहा था कि, उन्होंने बताना शुरू कर दिया। 

अपनी दयनीय स्थिति की जो करुण बातें उन्होंने बताईं, उससे मैं हतप्रभ रह गया। कि हे भगवान क्या हो रहा है तुम्हारी इस दुनिया में। इन निरीह प्राणियों को किस ग़लती की सज़ा दे रहे हो। कुछ देर मुझसे कुछ बोला ही नहीं गया। मैं क्या कहूँ कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

मुझे दुखी देखकर वह बोलीं," बेटा हमने तुम्हें भी परेशान कर दिया।"

"नहीं-नहीं, ऐसी बात नहीं है। मैं सोच रहा था कि आप लोग कैसे इतना दुख-दर्द सह लेते हैं। मैं सुनकर ही परेशान हो गया हूँ।"

"ईश्वर की इच्छा है बेटा। जीवन तो जीना ही है। जब-तक साँसें हैं, तब-तक जो भी है वह करते रहना है।"

इसके बाद मैं ज़्यादा देर नहीं रुक सका। मेरा मन अपने बेटों के पास तुरंत पहुँचने के लिए व्याकुल हो उठा। मैं उन्हें प्रणाम कर सुबह मिलने की बात कह कर चल दिया।

अब-तक कोहरे ने विकराल रूप धारण कर लिया था। दृश्यता मुश्किल से आठ-नौ फ़ीट ही रह गई थी। मैं दोनों इंडिकेटर, हेड-लाइट ऑन किए हुए धीरे-धीरे चल रहा था। मौसम बड़ा ही डरावना हो रहा था। स्ट्रीट और हेड-लाइट की रोशनी में ऐसा लग रहा था जैसे कि बादामी धुएँ के बादलों के मध्य से होकर गुज़र रहा हूँ। 

मैं यह भी सोच रहा था कि, क्या मैं कुछ ऐसा नहीं कर सकता जिससे इनके दुख-दर्द को ख़त्म ना सही, कम से कम इतना तो कम कर ही दूँ कि ये खिलखिला कर हँस भले न सकें, कम-से-कम मुस्कुरा तो सकें।

घर पहुँचने पर मेरी कमल-कली ने मुझ पर फ़ायर झोंकते हुए गेट खोला, "कहाँ रह गए थे इतनी देर? कॉल क्यों नहीं रिसीव कर रहे थे। सर्दी, कोहरा इतना ज़्यादा हो रहा है, हाथ को हाथ नहीं दिख रहा है, लेकिन आप ऑफ़िस के बाद जब-तक पूरा शहर नाप नहीं लेते, तब-तक घर का रास्ता आपको याद नहीं आता।"

मैं समझ गया कि सर के पास बात करते समय इसकी आने वाली कॉल मैंने बार-बार रिजेक्ट की थी। अब पूरे उबाल पर है। इसका उबाल कम नहीं, ख़त्म ही करना पड़ेगा, नहीं तो रात-भर रजाई में भी ठंडी ही ठंडी झेलनी पड़ेगी। बाहर भीतर दोनों जगह ठण्ड में ही रहना शरीर, दिमाग़ दोनों ही के लिए अच्छा नहीं है।

उसके हमले को नाकाम करने के लिए मैंने तुरंत अपना ब्रह्मास्त्र मस्काबाज़ी प्रयोग करते हुए कहा, "अरे मेरी बालूशाही, बैंक गारंटी, मेरी समोसा चटनी अंदर तो आने दे पहले, जान तो ले पहले कि तेरा यह हीरो क्या-क्या करता रहता है दिन भर।"

"मालूम है, मालूम है। ये तो जानते ही हो कि जो भी तूफ़ान बताओगे उसे मैं मानूँगी ही। और कोई रास्ता तो मेरे पास है नहीं। कौन सा मैं किसी से पूछने जा रही हूँ?"

उसका टोन काफ़ी नरम हो गया तो मैंने राहत महसूस की। ख़ुश भी हुआ कि मेरा ब्रह्मास्त्र हमेशा पिन-प्वाइंट लक्ष्य भेदता है। बाइक अंदर करते हुए मैंने फ़ाइनल निशाना साध कर कहा, "तुम भी कैसी बात करती हो यार, तुम मेरी ज़िंदगी का ब्रेथलेस म्यूज़िक हो। तुमसे झूठ बोलकर अपना जीवन संगीत बेसुरा करने की मूर्खता थोड़ी न करूँगा।"

हमारी उसकी यह जुगलबंदी सोने के लिए बेड पर पहुँचने तक चलती रही। लेकिन हँसी-मज़ाक के समानांतर मेरे दिमाग़ में यह भी चल रहा था कि सर के दुख-दर्द का समाधान क्या निकालूँ।

मेरी केला कली भी बहुत दुखी हुई जब मैंने उसे बताया कि सर ने बड़ा मकान बनवाने और दो बेटों को ऊँची शिक्षा दिलाने के लिए अपनी लिमिट से बहुत ज़्यादा लोन ऑफ़िस और बैंक से लम्बे समय के लिए ले लिया। बच्चे ब्रिलिएंट थे तो सोचा कि बड़े होकर कम से कम पढ़ाई का लोन तो चुका ही देंगे।

उनके विश्वास पर बच्चे आधे खरे उतरे। पढ़-लिख कर अच्छी नौकरी पा गए। लेकिन इसके साथ ही सर का दुर्भाग्य शुरू हो गया। बेटों ने माँ-बाप से बिलकुल किनारा कर लिया। दूसरे शहरों में बस गए। लोन का एक रुपया भी चुकाने से साफ़ मना कर दिया। ताना अलग मारा कि आपको लिमिट में काम करना चाहिए था। आपकी बेवकूफ़ी का पेमेंट हम क्यों करें।

बेटों के अकस्मात् बदले इस रूप, तानों से दोनों लोग हतप्रभ हो टूट गए, इतना कि आत्महत्या करने का निर्णय ले लिया। उनकी पत्नी ने तो सुसाइड लेटर तक लिख डाला। वह रात दोनों लोगों ने रोते, जागते सुबह की प्रतीक्षा में बिताई कि मार्केट खुले तो कोई तेज़ ज़हर ले आएँ, जिससे ज़्यादा तड़पना न पड़े। 

लेकिन भोर की किरणें जैसे सर के लिए शुभ-सन्देश लेकर आईं। सर कह रहे थे कि, "सूर्य की पहली केसरिया किरणें देख कर मुझे ऐसा लगा जैसे कि भगवान कह रहे हों कि, जीवन कर्म करते रहने के लिए दिया है। पलायन के लिए नहीं। अपना यह अनुभव इन्हें बताने से पहले मैं चाय बना कर ले आया। इन्हें देख कर ऐसा लग रहा था जैसे चेतना-शून्य हो गई हों। जैसे फाँसी के तख्ते पर चढ़ा दी गईं हों। चाय पीते हुए जब मैंने अपना अनुभव बताया तो भी यह अपना निर्णय बदलने को तैयार नहीं हो रही थीं। मुझसे भी कहतीं रहीं कि, 'जीने के लिए अब कोई कारण बचा नहीं है। सारी बातें छोड़ो मार्केट खुले तो ज़हर ले आओ बस’।

"लेकिन मार्केट खुलने का समय होते-होते इन्हें समझाने में सफल हो गया। और आज आपसे बात कर रहा हूँ।"

इतना सुनते ही मेरी महुवा कली बोली, "धन्यवाद भगवान का कि उन्होंने एकदम सही समय पर उन्हें सद्‌बुद्धि दी, और मिसेज़ भी मान गईं। नहीं तो दोनों ही लोग कठिनाइयों से हार कर जीवन से पलायन करने की मूर्खता कर बैठते।" 

मैं अपनी मोगरा कली की इसी हिम्मत, दृढ़ता, सकारात्मकता पर पहले दिन से ही मुग्ध हूँ। मैंने उससे आगे कहा, "हाँ, ईश्वर की इतनी कृपा तो रही, लेकिन अभी सर की परीक्षा और कठिन होनी थी। संघर्ष और लम्बा होना था तो लगे हाथ कंपनी पर नौकरशाही की तानाशाही के चलते मुसीबतों का पहाड़ खड़ा हो गया। आर्थिक नाकाबंदी ऐसी कि हम कर्मचारियों को छह-सात वर्षों से पूरी तनख़्वाह ही नहीं मिल पा रही है। भला हो कंपनी का कि उसने तमाम विपत्तियों के बावजूद छटनी नहीं की। अभी भी खींच रही है। 

"लेकिन सर के लिए यह विपत्ति बाक़ी से कहीं बहुत ज़्यादा है। मिलने वाली आधी तनख़्वाह से पूरी किश्त का पेमेंट करना ही मुश्किल हो गया। जब कई-कई महीने तनख़्वाह नहीं मिली तो एक-एक कर काफ़ी सामान बेच दिया।  बेटों की हरकतों से वैसे भी उन दोनों लोगों का मन हर चीज़ से बहुत टूट चुका है। 

"मगर मुश्किलें उनकी और भयावह हो गईं, जब घर में लगी आग में सब कुछ भस्म हो गया। मिसेज़ आग से बचने के प्रयास में कमर में गंभीर चोट लगा बैठीं। बैठना भी मुश्किल हो गया है। बहुत ट्रीटमेंट कराने के बाद अब थोड़ा सुधार हुआ है। इन तमाम विकट समस्याओं से पार पाने के लिए उन्होंने पूरा मकान किराए पर दे दिया है। ख़ुद सर्वेंट क्वार्टर में शिफ़्ट हो गए हैं।

"आर्थिक तंगी इतनी है कि अपना टेढ़ा जूता नहीं बदल पा रहे, अपने दोनों लोगों के लिए गर्म कपड़े, रजाई गद्दा भी ठीक से अरेंज नहीं कर पा रहे हैं।

"मकान बैंक के द्वारा नॉन पेमेंट में ज़ब्त होने से बचाने के लिए जो भी पैसा आता है, सबसे पहले किस्त जमा कर देते हैं। जो थोड़ा बहुत बचता है, उसी से जीवन खींच रहे हैं। पैसों की तंगी के चलते मिसेज़ का ठीक से इलाज नहीं करा पा रहे हैं, नहीं तो अब-तक वह ठीक हो गई होतीं। इसके बावजूद मकान बेच कर समस्यायों से मुक्ति नहीं चाहते।"

मेरे कहने पर मिसेज़ ने कहा ,"नहीं बेटा, ऐसा करना उचित नहीं। हैं तो आख़िर अपने ही बेटे। हमने संस्कार ही ग़लत दिए होंगे, तभी तो वो ऐसे निकले। हम अपने ही बच्चों से प्रतिशोध तो नहीं ले सकते न। उनके लिए कुछ तो छोड़े ही जाऊँ।"

यह सुन कर मेरी समोसा चटनी च्च्च करती, करुणामयी आवाज़ में बोली, "हे भगवान ऐसे संत हृदय लोगों को किस बात की सज़ा दे रहे हो।"

अपनी पानी-पूरी को इतना भाव-विह्वल देखकर मैंने सच बता दिया कि हम-दोनों का ऑफ़िस शहर के दो छोरों पर है, लेकिन उनकी तकलीफ़ कम करने के लिए मैं समय से पहले उनके लिए ही निकलता हूँ, तो वह कुछ देर शांत रहने के बाद बोली, "बढ़िया करते हो, जो हो सके उनके लिए करते रहो। लेकिन साथ ही अपना भी ध्यान रखो।"

जब मुझे लगा कि, मेरी बालूशाही ने रजाई के भीतर की सारी ठंडक दूर कर दी है, मौसम बड़ा वासंती-वासंती हो रहा है, तो उससे मन की वह बात भी कह दी, जो सर के यहाँ उनके हाथ का चाय-नाश्ता करते हुए आई थी। कहते हुए मन में मेरे उतना ही, वैसा ही संकोच था जैसा पहली बार किसी लड़की के सामने अपना प्यार प्रकट करते समय होता है। 

लेकिन मेरी तीखी समोसा चटनी ने आज की कन्याओं की तरह बिना संकोच, संशय के अपना उत्तर दे दिया। बोली, "सारा पुण्य अकेले कमा रहे हो, चलो यह कर करके मैं भी थोड़ा सा पुण्य कमा लूँगी।"

यह सुनते ही मैंने रजाई एक ओर झटक दी। उस सात बाई छह के बेड पर मौसम और भी ज़्यादा वासंती हो गया, हर तरफ़ से फूल ही फूल बरस रहे थे। पूरा कमरा मह-मह मोगरे सा महक रहा था।

अगले दिन मैं सर के यहाँ रोज़ से भी ज़्यादा पहले पहुँच गया। वह सुबह की चाय-नाश्ता की तैयारी करने ही जा रहे थे। मुझे इतनी जल्दी देख कर थोड़ा चकित हुए। मेरे अभिवादन पर मुस्कुराए और प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हुए जवाब दिया।

मेरे हाथों में दो बड़े-बड़े टिफ़िन कैरियर, चाय का थरमस था। अंदर पहुँच कर मैंने सब उसी टेबल पर रख दिया, जिस पर पिछले दिन नाश्ता किया था। उनकी मिसेज़ बैठी थीं। मेरे कुछ बोलने से पहले ही सर ने पूछ लिया, "यह सब क्या है धरेश?"

मैंने उन्हें बताया कि, "इसमें चाय-नाश्ता, खाना-पीना है। अब जब-तक आँटी की तबीयत ठीक नहीं हो जाती है, तब-तक आप को किचेन में जाने की आवश्यकता नहीं है। मैं दोनों टाइम खाना, चाय-नाश्ता लेकर आऊँगा। मेरी मिसेज़ ने कहा है कि, अंकल आँटी को मेरा प्रणाम कर कहिएगा कि मना नहीं करेंगे।"

यह सुनते ही दोनों लोग आश्चर्य से कभी मुझे, तो कभी एक दूसरे को देखने लगे। मैंने देखा दोनों लोगों की आँखों में आँसू चमक रहे हैं। वह कुछ बोल नहीं पा रहे थे। तभी मैंने सर को बैठाते हुए कहा, "आइए सर नाश्ता करते हैं। गरम-गरम प्याज़ की पकौड़ी और फ्राई आलू मटर है।"

मैं उनसे पूछ कर किचेन से बर्तन ले आया। आँटी जी को वैसे ही नाश्ता दिया जैसे अंकल उन्हें दिया करते थे। मैं पूरे नाश्ते के दौरान हँसी-ख़ुशी का माहौल बनाना चाहता था। वह दोनों लोग बीच-बीच में हँस भी रहे थे। लेकिन मैं दोनों लोगों की आँखों में बराबर आँसू चमकता हुआ देख रहा था।

ऑफ़िस के लिए निकलने से पहले अंकल ने आँटी के हिसाब से खाना-पीना रख दिया। उन्होंने बताया कि किराएदार की नौकरानी दिन में तीन-चार बार आकर मदद कर देती है। 

जब चलने को हुए तो वह बड़े संकोच के साथ बोले, "बेटा हम-दोनों की तरफ़ से बहू, बच्चों को आशीर्वाद कहना। एक और बात कहना चाह रहा हूँ। यह जानता हूँ कि उससे तुम दोनों को कष्ट होगा। लेकिन बेटा जब हमारी स्थिति, मनोदशा को ध्यान में रखकर सोचोगे तो मेरी बात तुम दोनों को बहुत अच्छी लगेगी।

"मैं, मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि, बहू को कहना कि चाय-नाश्ता, खाना बहुत ही स्वादिष्ट और अच्छा बना है। इनकी तबियत को ख़राब हुए क़रीब दो साल हो रहे हैं। इतने समय बाद आज हमने अच्छे से खाना खाया।

"सदैव सुखी समृद्ध रहो तुम दोनों। बहू को मेरी तरफ़ से समझाना कि जब कोई रास्ता नहीं बचेगा तो मैं ज़रूर तुम दोनों से कहूँगा। मगर जब-तक कर ले रहा हूँ, तब-तक मुझे करने दो। अब खाना-पीना नहीं लाना बेटा। मेरा स्वाभिमान, मेरी अंतरात्मा इसके लिए मुझे अनुमति नहीं दे रही है। स्वयं की नज़रों में अपना झुका हुआ सिर हम नहीं देख पाएँगे बेटा।"

"हाँ बेटा, यह सही कह रहे हैं। हम बहुत भाग्यशाली हैं कि तुम बेटों से भी बढ़कर हमारे जीवन में आए। ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ क, हमेशा हमारे जीवन में बने रहो।"

यह सब सुनकर मैं अचम्भित सा कुछ देर उन लोगों को देखने के बाद बोला, "मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगा, जिससे कि आप लोगों की अंतरात्मा, स्वाभिमान, आत्म-सम्मान को ठेस पहुँचे।"

ऑफ़िस का टाइम हो रहा था। सर ने अपना लंच बॉक्स उठाया और बाथरूम के क़रीब रखे अपने जूते में पैर डालकर पहनने लगे। वह तब भी टेढ़ा ही था। मैं उसी दिन नया लेकर सर को उससे मुक्ति दिलाना चाहता था। लेकिन उन्होंने ऐसी सारी संभावनाओं को समाप्त कर दिया था।

बाहर उस समय भी हर तरफ़ कोहरा ही कोहरा हो रहा था। बाइक पर पीछे बैठे सर को मैं काँपता हुआ स्पष्ट महसूस कर रहा था। 

1 टिप्पणियाँ

  • 3 Aug, 2021 03:33 PM

    मर्मस्पर्शी सुगठित

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