मेरा आख़िरी आशियाना - 4

15-09-2019

मेरा आख़िरी आशियाना - 4

प्रदीप श्रीवास्तव

ऑफ़िस के पास पहुँचते ही मेरी आधी जान ऐसे ही निकल जाती थी। खुरार्ट ने दो-तीन दिन में ही मेरी हालत समझ लीे तो बोला, "आपको परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। मैं सबके लिए बुरा आदमी नहीं हूँ। अगर इतना ताव ना रखूँ तो यह साले जीना हराम कर देंगे। साले नौकरी भी ख़तरे में डाल देंगे। ज़रा भी संकोच नहीं करेंगे।" शुरुआती दो हफ़्ते उसने मुझसे कोई काम लिया ही नहीं। ना ही कोई बात करता था। काम उसके पास ज़्यादा था तो उसका सिर झुका ही रहता था। उसी में जुटा रहता था। मैं बेकार बैठे-बैठे बोर हो जाती थी। मुझे लगा ये तो मुझे वर्क-लेस करके ही मेरी नौकरी ख़तरे में डाल देगा।

एक दिन बड़ा डरते-डरते मैंने उससे काम सिखाने के लिए कहा तो वह बोला, "मैं जानता हूँ खाली बैठे-बैठे आप बोर हो जाती हैं। एक-दो दिन रुक जाइए फिर बताता हूँ आपको।" उसकी बात से मुझे बड़ी राहत मिली। उसने सच में दो दिन बाद मुझे काम बताना शुरू किया। बताने का ढंग अच्छा था तो जल्दी ही काम समझ में आने लगा। दो महीना बीततेे-बीतते उसने मुझे काफ़ी कुछ सिखा दिया था। इस दौरान मुझे समझ में आया कि यह तो वैसा है ही नहीं जैसी इसकी इमेज है। यह तो एक सहृदय आदमी है। बेवज़ह लोग इसे झगड़ालू, खुर्राट न जाने क्या-क्या कहते रहते हैं। मैं भी कितना डर रही थी। जल्दी ही हमारे बीच जो डर का माहौल था वह ख़त्म हो गया। मगर मेरे लिए नई समस्या पैदा हो गई कि जब काम सीख लिया तो मेरा काम बढ़ता ही गया।
रोज़ ऑफ़िस से निकलते-निकलते सात-आठ बज जाते। घर नौ बजे तक पहुँच पाती। अम्मा बहुत परेशान हो जातीं। मैं लाख मना करके जाती, लेकिन वह कुछ ना कुछ खाना बना ही लेतीं थीं। मुझे डर लगता कि अब उनके हाथ-पैर ठीक से चलते नहीं। लेकिन वह मानती नहीं। कहतीं, "तुम दिन-भर की थकी-माँदी आती हो, खाना क्या बनाओगी।" कहती वह सही थीं, घर पहुँच कर एक गिलास पानी भी उठा कर पीने की हिम्मत नहीं रह जाती थी। लेकिन मैं फिर भी नहीं चाहती थी कि अम्मा गैस-चूल्हा ऑन करें। मैं पानी, नाश्ते का सारा सामान उनके पास रख कर जाती थी कि मेरे आने तक वह नाश्ता वग़ैरह कर लिया करें। लेकिन वह ना मानने वाली थीं तो ना मानी। आखि़र एक दिन गिर पड़ीं। घुटने, कोहनी में कई जगह चोट आ गई।

अंततः मैंने खुर्राट सर से कहा कि ऑफ़िस का कुछ काम छुट्टियों में घर ले जाकर कर लिया करूँगी। शाम को मुझे पाँच बजे तक छुट्टी दे दिया करिए। उसने कंप्यूटर के मॉनिटर पर आँखें गड़ाए-गड़ाए ही कहा, "देखिए, मुझे अच्छी तरह याद है कि मैंने कभी आपसे पाँच बजे के बाद रुकने के लिए नहीं कहा। जब रुकने के लिए नहीं कहा तो कभी जाने के लिए भी नहीं कहूँगा कि आप पाँच बजे तक यहाँ से चली जाया करें। जो काम है आपके सामने है। कितना इंपॉर्टेंट है वह आप भी जानती हैं। आप अपने हिसाब से तय कर लीजिए कि करना क्या है। आपको कोई काम घर ले जाने की इजाज़त नहीं है।" उसके इस जवाब से मैं एकदम सकते में आ गई। उससे ऐसे जवाब की मैंने कल्पना तक नहीं की थी।

मैं कुछ देर तक हतप्रभ सी उसे देखती रह गई। मगर वह अपने काम में बिज़ी रहा। उसकी कठोरता और अमानवीय जवाब से मुझे बहुत दुख हुआ। मेरी आँखें भर आईं। लेकिन जानती थी कि आज की तारीख़ में इनका कोई मोल नहीं है, तो जल्दी ही उन्हें पोंछ लिया। उस दिन भी रात दस बजे घर पहुँची। बहुत रोई। मन में आया कि छोड़ दूँ नौकरी। लेकिन फिर सोचा कि कैसे चलेगी ज़िंदगी? हाउस लोन की किश्तें कहाँ से भरूँगी? नहीं भरूँगी तो रहने का ठौर भी चला जाएगा। जो भी हो, जैसे भी हो, अगर ज़िंदगी चलानी है तो नौकरी करनी ही होगी। फिर संडे को मैंने पहला काम किया कि एक बाई ढूंढ़ कर लगाई। जो चौका-बर्तन, खाना-पीना सब कर दिया करे। होम लोन की किश्तें देने के बाद जो पैसा बचता था उसे देखते हुए बाई लगाना बहुत ही मुश्किल था। लेकिन मैंने बाक़ी ख़र्चों में ज़्यादा से ज़्यादा कटौती करके लगाया।

खुर्राट पर ग़ुस्सा तो बहुत आया, लेकिन उस पर ज़ाहिर नहीं होने दिया। ऐसे ही कुछ महीने बीते होंगे कि फ़ाइनेंशियल इयर का लास्ट मंथ आ गया। काम का बोझ एकदम बढ़ गया। सीनियरों का हम दोनों को टॉर्चर करना ही मक़सद था तो कहने को भी कुछ और हेल्पिंग हैंड नहीं दिए। मैं आठ-नौ बजे के पहले ऑफ़िस से नहीं निकल पा रही थी।


एक दिन आठ बजे निकली तो बाहर एक टेंपो नहीं दिख रहा था। इंतज़ार करते-करते थक गई। कोई ऑटो तक नहीं दिेख रहा था। क़रीब एक घंटा बीता होगा कि एक बाइक तेज़ी से आगे निकली, फिर कुछ दूर आगे जाकर झटके से रुक गई और वापस मुड़कर तेज़ी से मेरे पास आकर रुकी। मैं डरी, कुछ समझती कि खुर्राट की आवाज़ आई, "अरे आप अभी तक यहीं खड़ी हैं।" वह हेलमेट लगाए था इसलिए पहचान नहीं पाई थी। मैंने कहा, “पता नहीं क्यों आज टेंपो, ऑटो दिख ही नहीं रहे हैं। पास होता तो रिक्शा कर लेती।”

उसने पूछा "जाना कहाँ है?" 

मैंने कॉलोनी का नाम बताया, तो वह बोला, "अरे वहीं तो मैं रहता हूँ। आपने कभी बताया ही नहीं कि आप इतनी दूर से आती हैं। ख़ैर आज तो आपको कोई टेंपो नहीं मिलने वाला, क्योंकि दोपहर से ही यह सब हड़ताल पर हैं। क्यों हैं पता नहीं। पैसेंजर ज़्यादा होने के कारण सारे ऑटो उसी रोड पर जा रहे हैं, जिस पर उन्हें आने-जाने दोनों तरफ़ से सवारियाँ मिल रही हैं। इसलिए आप मेरे साथ चलिए, मैं आपको छोड़ दूँगा, नहीं यहीं खड़ी रह जाएँगी।" मैं बड़े असमंजस में पड़ गई।

बाइक पर शादी से पहले भाइयों के साथ ही कभी-कभार चली थी। शादी हुई तो कुछ दिन उस उठाईगीर पति के साथ उसी राजदूत बाइक पर जिसे बाबूजी ने शादी में दिया था। बड़े शौक़ से कि उनका दामाद और बिटिया मोटर साइकिल से चलेंगे। उस समय दहेज में बाइक का दिया जाना मायने रखता था। अब इतने दिनों बाद, इतनी उम्र में एक पराए पुरुष के साथ बाइक पर जाने की मेरी हिम्मत नहीं हो पा रही थी। वह भी खुर्राट के साथ। जो अब हेलमेट उतार कर बात कर रहा था। 

मुझे असमंजस में पड़ा देखकर बोला, "इसमें इतना परेशान होने की क्या बात है? स्थिति को समझने की कोशिश करिए। इस समय कोई भी साधन नहीं मिलेगा। कोई दिक़्क़त हो गई तो ज़िम्मेदारी मुझ पर आ जाएगी कि इतनी देर क्यों हुई ऑफ़िस में।" खुर्राट आगे दोनों सीनियरों को गाली देते हुए बोला, "साले ना जाने क्या-क्या तमाशा कर दें, कोई ठिकाना नहीं उनका, बाक़ी जैसी आपकी इच्छा। मैं चलने के लिए कोई प्रेशर नहीं डाल रहा हूँ।"

स्थिति को देखते हुए मुझे भी लगा कि यह सही कह रहा है। इसके साथ जाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। विवश होकर उसके साथ घर को चल दी। मगर कुछ दूर चलने के बाद उसने बाइक रोककर कहा, "देखिए कुछ और नहीं समझ लीजिएगा। एक्चुअली मुझे इस तरह बाइक चलाने में दिक़्क़त हो रही है। आप मेरी तरह दोनों तरफ़ पैर करके बैठ जाइए। आसानी होगी। गाड़ी बैलेंस करना मुश्किल हो रहा है।" मेरे लिए फिर एक और धर्म-संकट। मगर विवश होकर बैठना पड़ा। भाइयों के साथ भी कभी उस तरह नहीं बैठी थी। मैं बड़ा ऑड फ़ील कर रही थी।

मैं रास्ते भर उससे गैप बनाने की कोशिश करती रही, लेकिन सब बेकार था। वह जैसे ही ब्रेक लेता मैं वैसे ही उससे टकरा जाती। बड़ा अजीब लग रहा था। शुरू में मुझे लगा कि खुर्राट जानबूझकर तेज़ ब्रेक लगा रहा है। मगर कुछ ही देर में यक़ीन हो गया कि नहीं वह सँभाल कर चल रहा है, तेज़ भी नहीं चल रहा है। मैं ही बैठने की अभ्यस्त नहीं हूँ, इसीलिए सँभल नहीं पा रही हूँ। मैं दोनों हाथ पीछे करके बाइक की सपोर्टिंग रॉड को पूरी ताक़त से ऐसे पकड़े हुए थी जैसे कि बाइक मेरे पैरों के बीच से आगे निकल जाएगी, और मैं सड़क पर गिर जाऊँगी। घर क़रीब आने पर सोसाइटी की ख़राब सड़क के कारण लाख कोशिशों के बाद भी मैं बार-बार खुर्राट से इतना ज़्यादा टच हो रही थी कि शर्मिंदगी के मारे आँसू आ गए। मन में आया कि बाइक से कूद जाऊँ नीचे। मगर विवश थी। मैं उसे घर तक नहीं ले जाना चाहती थी। इसलिए घर से थोड़ा पहले ही उतर गई।

घर पहुँची तो अम्मा रोती मिलीं। एक तो रोज़ से ज़्यादा देर हो गई थी। दूसरे वह बार-बार मोबाइल पर फ़ोन कर रही थीं। बाइक पर मैं रिंग सुन नहीं पा रही थी। उन्हें समझाया, अम्मा ऐसे परेशान ना हुआ करो। इतनी दूर घर लेकर बड़ी ग़लती कर दी है। काम कितना ज़्यादा है वह भी बता ही चुकी हूँ। मैंने उन्हें टेंपो की हड़ताल वग़ैरह सब बता दिया। सारे कारण गिना दिए, लेकिन यह नहीं बताया कि खुर्राट के साथ आई हूँ। मैंने सोचा कि इससे कहीं यह बेवज़ह तनाव में ना आ जाएँ। उस दिन मैं बड़ी देर तक जागती रही।

मुझे लगा कि खुरार्ट से स्पर्श का ख़्याल आते ही मुझ में अजीब सा रोमांच पैदा हुआ जा रहा है। और कुछ तनाव भी। अगले दिन उसने मुझसे फिर कहा, "आपको मेरे साथ चलने में कोई दिक़्क़त ना हो तो साथ ही चलिएगा, बेवज़ह इतनी प्रॉब्लम फेस करती हैं।" मैंने कहा ऐसी कोई बात नहीं, चली जाऊँगी । बातचीत के दौरान ही उसने बताया, "मैं चाचा के यहाँ रहता हूँ। चाचा अपने परिवार के साथ अयोध्या में रहते हैं। मकान में एक किराएदार है। एक पोर्शन चाचा ने मुझे दे रखा है। कोई किराया नहीं देना होता, इसलिए वहाँ रहता हूँ। खाना-पीना किराएदार बना देता है। हर महीने उसे पैसा दे देता हूँ।" उस दिन के बाद मैंने देखा कि वह बातचीत में पहले की अपेक्षा ज़्यादा साफ़ हो गया है। मगर काम-धाम के मामले में कोई परिवर्तन नहीं था। जिसके चलते अक्सर ज़्यादा देर होती ही रही। मजबूर होकर घर वापसी उसके साथ ही करनी पड़ती थी।

टेंपो से जाने में होने वाली दिक़्क़तों से आराम मिला तो धीरे-धीरे मेरा भी मन करता चलो चले चलते हैं। कुछ दिन में यह रेग्युलर हो गया। मैं घर से कुछ पहले ही उतर जाती। सुबह टेंपो से ही जाती। उसका साथ, उसका स्पर्श, उसकी ढेरों बातें मुझे रोज़ ही देर रात तक रोमांचित करती रहतीं थीं। फिर सोचती, मैं भी कैसी बेवकूफ़ हूँ। इन सब बातों का मेरे लिए क्या मतलब है। मेरा उसका क्या मेल। वह एक होनहार, अच्छी नौकरी वाला व्यक्ति है। उसके घर वालों ने उसको लेकर बहुत से सपने सँजोए रखे होंगे।

एक दिन जब वह साथ चला ऑफ़िस से तो घर चलने की ज़िद कर बैठा। मैं बड़े असमंजस में पड़ गई कैसे मना करूँ। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। आख़िर ले आई। माँ से मिलवाया। माँ के पैर छूकर वह ऐसे बतियाने लगा जैसे ना जाने कितने दिनों से परिवार का सदस्य है।

उसने मिनट भर में बता दिया कि, "हम दोनों साथ-साथ काम करते हैं। रोज़ साथ आते हैं।" यह भी उलाहना दे दिया कि मैं सुबह बेवज़ह तकलीफ़ उठाती हूँ, मैं उसके साथ नहीं जाती। वह रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। यह भी कह दिया कि, "इतने दिनों से साथ आ रहे हैं। लेकिन इन्होंने कभी यह नहीं कहा कि घर चलिए, एक कप चाय पी लीजिए। मैं कहीं घर ना आ जाऊँ इसलिए रोज़ घर से पहले ही उतर जाती हैं। लेकिन मैं ही आज बेशर्म बन गया कि जो भी हो, आज घर चलूँगा, आपसे मिलूँगा। यह अक्सर आपके बारे में बातें करती हैं। आपके स्वास्थ्य को लेकर इन्हें बड़ी चिंता रहती है। रहती ऑफ़िस में हैं लेकिन इनका मन यहीं आप पर लगा रहता है।"

उस समय वह ऑफ़िस वाला खुर्राट लग ही नहीं रहा था। आश्चर्य तो मुझे यह हो रहा था कि अम्मा भी उससे बेटा, बेटा कहकर ऐसे बात कर रही थीं जैसे सच में उनका बेटा है। और बरसों बाद कहीं बाहर से आया हैै। मैं चाय-नाश्ता ले आई तो अपने हाथ से उसे दिया। खुर्राट ने एक झटके में वह सारी बातें अम्मा को बता दी थीं जिन्हें मैंने कभी नहीं बताया था।

मैं भीतर ही भीतर डर रही थी कि अम्मा ना जाने क्या सोच रही होंगी, मुझे क्या समझ रही होंगी? उसके जाने के बाद मुझे कितनी गालियाँ देंगी। कुछ कह पाना मुश्किल है। कहीं गुस्से में ऑफ़िस जाना ही ना बंद कर दें। खुर्राट पर बड़ा ग़ुस्सा आ रहा था। मन ही मन कह रही थी कि यह जितनी जल्दी चला जाए यहाँ से उतना ही अच्छा है। अब जो भी हो जाए इसके साथ कभी नहीं आऊँगी। चाहे सारी रात बाहर ही क्यों ना बितानी पड़ जाए। जब वह उठकर जाने लगा तो मेरा मन और भी ज़्यादा घबराने लगा कि अब अम्मा से डाँट खाने का समय आ गया है। आश्चर्य नहीं कि हाथ भी उठा दें।

मैं गेट बंद करके जब अंदर कमरे में आने लगी तो मैंने महसूस किया कि मेरे पैर काँप रहे हैं। वह इतने भारी हो गए हैं कि उठ ही नहीं रहे हैं। एक-एक क़दम बढ़ाने में पूरी ताक़त लगानी पड़ रही है। जब अम्मा के सामने पहुँची तो ऐसे काँप रही थी, जैसे कोई छोटा बच्चा टीचर के सामने काँपता है। चेहरे पर पसीने का गीलापन साफ़ महसूस कर रही थी। अम्मा के सामने चाय-नाश्ते के रखे बर्तन उठाने को झुकी तो अम्मा की अनुभवी आँखों से अपनी हालत छिपा नहीं सकी थी।

अम्मा बोलीं, "क्या हुआ, तुम्हें इतना पसीना क्यों हो रहा है। तबीयत तो ठीक है ना।" मैंने बहुत मुश्किल से जवाब दिया था, हाँ अम्मा तबीयत ठीक है, थकान बहुत है बस। खाना खाते समय अम्मा ने खुर्राट के बारे में तमाम बातें पूछ डालीं, कौन है? कहाँ का है? माँ-बाप कौन हैं? कहाँ रहते हैं? तुमने इतने दिनों तक कुछ बताया क्यों नहीं? दबे शब्दों में अम्मा ने कुछ और भी ऐसी बातें पूछीं जिनका सीधा मतलब था कि हमारे उसके बीच कोई ऐसा-वैसा रिश्ता तो नहीं है।

मैंने उनकी हर बात का जवाब दे दिया था। लेकिन जब खा-पी कर लेटी तो भी मैं इस बात से निश्चिंत नहीं हो सकी थी कि अम्मा मेरी बातों से संतुष्ट हुईं कि नहीं। उनसे उस स्थिति के बारे में कोई बात नहीं कर सकी जिसे मैं ख़ुद ही नहीं समझ पा रही थी कि उसका साथ, स्पर्श मुझे क्यों अच्छा लगता है। अकेले होने पर वही दिलो-दिमाग़ पर क्यों छाया रहता है। रोज़ अच्छा-ख़ासा समय सोने से पहले उसी को सोचने में क्यों बीतता है। क्यों एक अजीब तरह की अनुभूति, रोमांच महसूस करती हूँ। 

अगले दिन ऑफ़िस के लिए निकल रही थी, अम्मा गेट बंद करने के लिए गेट पर आ गई थीं कि तभी खुर्राट बाइक लिए सामने आ खड़ा हुआ। मैं हक्का-बक्का हो गई। पूरे शरीर में सनसनाहट और पसीने का गीलापन महसूस होने लगा। उसने अम्मा को नमस्कार कर कहा, "माँ जीे आप परेशान ना हुआ करिए, ये मेरे साथ ही जाएँगी, आएँगी।" अम्मा उसके नमस्कार के जवाब में आशीर्वाद देकर बोलीं, "ठीक है बेटा, सँभल कर चलना, धीरे चलाना।"

सवेरे लेने के लिए उसका इस तरह आना मुझे उसकी धृष्टता लगा। अम्मा की बात ख़त्म होने के पहले ही वह बोला, "जल्दी आइए देर हो रही है। मैं बड़े धर्म-संकट में पड़ गई कि कैसे बैठूँ? जैसे रोज़ बैठती हूँ उसी तरह दोनों तरफ़ पैर करके या फिर, आख़िर में दोनों पैर एक ही तरफ़ करके बैठ गई। उसकी तरह नहीं बैठी। घर से कुछ ही दूर एक मोड़ से निकलकर उसने बाइक रोककर कहा, "आप आराम से बैठ जाइए। आप जानती हैं मुझे इस तरह ड्राइव करने में दिक़्क़त होती है।" मैं बिना कुछ बोले उसकी ही तरह बैठ गई।

इस तरह उसके साथ रोज़ ही आना-जाना हो गया। अब जिस दिन थोड़ा जल्दी छुट्टी मिल जाती थी, उस दिन वह इधर-उधर घूमने-फिरने भी साथ लेकर जाने लगा था। होटल में खाना-पीना सब होने लगा। इस दौरान वह ऐसी कोई बात नहीं करता था जिससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता कि उसके मन में क्या चल रहा है। उसके घर परिवार की बात करती तो वह बात बदल देता था।

ऐसे में उसके चेहरे पर आने वाले भावों को बड़ी कोशिश कर मैं इतना ही समझ पाती थी कि वह परिवार की बात आते ही चिढ़ जाता है। उसकी बातें ज़्यादातर ऑफ़िस या फिर फ़िल्मों के बारे में होती थीं। एक बात ज़रूर थी कि वह अक्सर बात करते-करते एकटक मुझे देखने लगता था। मैं सकपका कर पूछती ऐसे क्या देख रहे हैं? तो वह कहता, "कुछ नहीं।" जल्दी ही मेरी ज़िंदगी ऐसे ऊहा-पोह में पड़ गई थी कि मैं समझ ही नहीं पाती थी कि क्या हो रहा है। घर बाहर वही हर तरह से दिमाग़ में घूमता रहता था। बड़ी देर रात तक नींद नहीं आती थी। मैं पूर्व की ही तरह समय को भी बड़ी तेज़ी से बीतते देख रही थी।

एक दिन रात क़रीब बारह बजे उसका फ़ोन आया। मोबाइल में उसका नाम देखकर मैं घबरा गई कि इतनी रात को क्यों फ़ोन किया है। जल्दी से कॉल रिसीव की साथ ही यह भी देखती रही कि अम्मा जाग तो नहीं रहीं। मैंने हेलो कहा तो वह बोला, "आप अभी भी जाग रही हैं?" मैंने कहा, नहीं सो रही थी, रिंग हुई तो नींद खुल गई। आपकी कॉल देखकर घबरा गई, क्या हुआ? मैं बात करते हुए घर के एकदम दूसरे कोने में चली गई, कि अम्मा कहीं जाग ना जाएँ, बात ना सुन लें। वह बोला, "बस नींद नहीं आ रही थी तो सोचा शायद आप जाग रही हों तो आपसे बातें करूँ।"

मैंने झूठ कहा, नहीं मैं जल्दी सो जाती हूँ। सुबह जल्दी उठना होता है। तो उसने कहा, "ठीक है, रखता हूँ, सॉरी आपकी नींद ख़राब की, डिस्टर्ब किया आपको।" मुझे लगा कि जैसे यह कहते वक़्त उसकी आवाज़ कुछ बदल गई है। मैंने सोचा कि कहीं नाराज़ ना हो जाए तो तुरंत कहा, नहीं-नहीं सर, ऐसी कोई बात नहीं है। अब जाग ही गई हूँ। आप बात करिए।

असल में मेरा मन स्वयं उससे बात करते रहने का हो रहा था। सारी रात बात करने का। मैं बोलते वक़्त थोड़ा हड़बड़ा गई थी। उसने मुझे तुरंत रिलैक्स होने के लिए बोला फिर तुरंत वही फ़िल्मी डॉयलॉग कि आप आज के बाद मुझे सर नहीं कहेंगी। आप मेरा नाम लेकर बुलाएँगीं।

मैंने तर्क किया लेकिन उसकी ज़िद के आगे सब फ़ेल। फिर हमारी बातें आगे बढ़ीं तो बढ़ती ही गईं। उस समय पहले जैसी कोई बात नहीं थी। वह तब जो बातें कर रहा था, वह सब पहली बार कर रहा था। मैं जो जवाब दे रही थी, जो कुछ कह रही थी वह सब मैं भी पहली बार कह रही थी। उसने रोमांटिक बातें शुरू कीं और फिर कुछ ही देर में अंतरंग होता गया।

ऐसी रोमांटिक अंतरंग बातें जो जीवन में मैं पहली बार सुन रही थी। जिन्हें मैं कभी सोच भी नहीं पाई थी। मैं रोमांच उत्तेजना के कारण सिहर जा रही थी। मैं आश्चर्यचकित थी कि मेरे बारे में वह ऐसे ख़्याल रखता है। वह अब मुझे आपकी जगह तुम बोल रहा था। बीच-बीच में उसने मुझे कई बार टोका कि तुम हाँफ क्यों रही हो। तब मेरा ध्यान जाता कि मैं वाक़ई हाँफ रही हूँ। वह सेकेंड-दर-सेकेंड फ़्रैंक, बोल्ड होता जा रहा था। और मैं सम्मोहित सी उसी स्तर पर चढ़ती-उतरती चली जा रही थी।

शादी की पहली रात के बाद यह दूसरी ऐसी रात थी जिसे मैं चाह कर भी अब भी भुला नहीं पा रही हूँ। मुझे पल-पल बीतते समय का यूँ तो हमेशा पता रहता है लेकिन उस रात तो बातों में पता ही नहीं चला कि पल-पल करके साढ़े तीन घंटे कैसे बीत गए, मैं जैसे नींद से जागी जब उसने अचानक ही एक बेहद गहरी किस करते हुए कहा, "अब तुम सो जाओ स्वीटहार्ट, माय ड्रीम क्वीन, सुबह ऑफ़िस भी चलना है।" उसके विवश करने पर नहीं बल्कि उसके किस करने पर जवाब में स्वतः ही मुझसे भी किस हो गया था।

उसके हँसने फिर एक और किस की आवाज़ मुझे सुनाई दी थी। मगर तब मैं गहरी साँस लेकर उसे सिर्फ़ गुड नाईट कह सकी थी। फ़ोन डिस्कनेक्ट नहीं कर सकी, उसी ने किया। साढ़े तीन घंटे बाद मेरा ध्यान पूरी तरह अपनी तरफ़ गया। मैंने महसूस किया कि मैं पूरी तरह पसीने-पसीने हूँ। मेरी साँसें उखड़ी हुईं थीं। मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।

मैं अंदर आ कर लेट गई। अम्मा पर नाइट बल्ब की हल्की रोशनी में ही एक गहरी नज़र डाली थी, कि वह जाग तो नहीं रही थीं। उन्हें देख कर मुझे लगा कि मैं बच गई। अम्मा सो रही हैं। वह मेरी बातें नहीं सुन सकीं। साढ़े तीन बज रहे थे। नींद से आँखें कड़ुवा रही थीं। बेड पर लेटी हुई थी लेकिन सो नहीं पा रही थी। उसकी बातें कानों में गूँज रही थीं। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मुझे क्या हुआ है?

सुबह नींद खुली। ऑफ़िस का ध्यान आते ही हड़बड़ा कर उठ बैठी। सामने दीवार घड़ी पर नज़र पड़ते ही पैरों तले ज़मीन खिसक गई। दस बज रहे थे। ज़िंदगी में उतनी तेज़ उससे पहले और अब तक मैं बेड से कभी नहीं उतरी। मैंने घबराते हुए अम्मा का बेड देखा, वह खाली था। इस बार पैरों के नीचे से ज़मीन खिसकी नहीं एकदम से ग़ायब हो गई। मैं गहरे और गहरे अंतहीन घनघोर अँधेरे कुएँ में गिरती चली गई। डर के मारे पूरा शरीर साँय-साँय कर रहा था। 

पाँच बजे उठ जाने वाली अम्मा, जिस दिन मेरी नींद नहीं खुलती थी, उस दिन बड़े प्यार से माथे को सहला-सहलाकर उठाने वाली अम्मा, अक्सर माथे पर चूम लेने वाली अम्मा, कहाँ है? आज चूमा क्यों नहीं? जगाया क्यों नहीं? उठाया क्यों नहीं? अंदर-अंदर काँपती। थर-थराते, कँप-कँपाते और घबराते क़दमों से हाँफती-दौड़ती मैं सारे कमरे, किचेन, बाथरूम हर जगह देख आई। अम्मा कहीं नहीं थीं। आँगन में भी नहीं।

सीढ़ियाँ दौड़ती-फलांगती ऊपर छत पर पहुँची, अम्मा वहाँ भी नहीं थीं। मेरा सिर चकराने लगा। धूप-छाँव हो रही थी। बादलों के बड़े-बड़े टुकड़े इधर-उधर हो रहे थे। उनके बीच-बीच में से नीला आसमान झाँक रहा था। मेरा दिल किसी अनहोनी की आशंका से बैठा जा रहा था। मैं ज़मीन पर बैठे-बैठे रोने लगी कि अम्मा, मेरी प्यारी अम्मा, मेरे लिए अपने लड़कों, सारे रिश्तेदारों को भी सेकेंड भर में त्याग देने वाली अम्मा ने क्या हमारी बातें सुन लीं, क्या वह अपनी प्यारी बिटिया को चरित्रहीन मान बैठी हैं। अपने से क़रीब-क़रीब बीस बरस छोटे आदमी से अंतरंग बातें कर रही थी, यह क्या उन्हें घृणास्पद लगा। क्या विकृति लगी। इतनी ज़्यादा घृणास्पद कि मुझसे नफ़रत कर बैठीं। उनका दिल टूट कर बिखर गया। लड़कों, रिश्तेदारों से निराश अम्मा को सारी आशा मुझसे ही थी।

उनके सारे सपने मुझसे ही थे। जिसे मैंने लड़कों से भी ज़्यादा बुरी तरह तोड़ दिया, कुचल दिया। हर तरफ़ से हताश-निराश अम्मा कहीं कुछ अनहोनी... कहीं उन्होंने कोई आत्मघाती क़दम तो नहीं उठा लिया। मैं कुछ मिनट बैठी यही सोचती रही। फिर उठकर नीचे आई यह सोचते हुए कि अम्मा अगर तुमने ऐसा कुछ किया है तो मैं भी अभी-अभी यहीं जान दे दूँगी।

नीचे उतरते हुए मेरे दिमाग़ में यह भी आया था कि खुर्राट ऑफ़िस जाते हुए मुझे लेने आया होगा। अम्मा ने उसे दरवाज़े से ही भगा दिया होगा। उसके बाद ख़ुद...। तमाम अनहोनी बातों की भयावह तस्वीरों की आँधी दिमाग़ में लिए मैं कमरे में पहुँची कि मोबाइल उठाऊँ, खुर्राट को फ़ोन करके पूछूँ  कि उससे अम्मा ने क्या कहा? उसके लिए मन में कई अपशब्द निकल रहे थे, कि क्या ज़रूरत थी इतनी रात को फ़ोन करने की, ऐसी बातें करने की। दिन भर तो साथ रहती हूँ, जितनी बातें करनी थी, जैसी भी करनी थीं, वहीं कर लेता।

इतने दिनों तक तो कैसा जेंटलमैन बना रहा। यह तो उन सबसे भी शातिर निकला। पहले खुर्राट बन अपनी अलग तरह की इमेज का जादू चलाया। इंप्रेस किया। धीरे-धीरे जाल में फँसाता रहा। जब जाल में फँस गई पूरी तरह तो असली रूप में आया। अपनी इच्छा ज़ाहिर कर दी। कैसी-कैसी बातें कर रहा था। अकाउंटेंसी की तरह कामुक बातों का भी पूरा पंडित है। उम्र में कितनी बड़ी हूँ, लेकिन कितनी बातें पहली बार जान रही थी, सुन रही थी।

कुछ बातें मुझे बड़ी गंदी, घृणास्पद लगीं। यह सोच कर मैं हैरान हो रही थी कि मुझे क्या हो गया था कि मैं तीन साढ़े तीन घंटे तक ऐसी बातें सुनती रही। न जाने क्या-क्या उसके कहने पर बोलती, ...छिः! घिन आने लगी मुझे। मोबाइल उठाकर भी मैं खुर्राट को फ़ोन नहीं कर सकी।

मैंने सोचा अम्मा ने जो भी किया होगा उसके लिए अकेले खुर्राट ज़िम्मेदार नहीं है। मैं भी हूँ। बल्कि मैं ही ज़्यादा हूँ। वह पच्चीस-छब्बीस का है, जवान है। मैं तो पैंतालीस की हो रही हूँ। शादीशुदा, नहीं-नहीं परित्यक्ता हूँ, तरह-तरह के अनुभव से गुज़री परित्यक्ता हूँ। आदमी की निगाह सेकेंड भर में पढ़ सकती हूँ। इसे, इसे भी तो समझ ही रही थी। सच तो यह है कि मैं स्वयं ही उसके लिए उत्सुक होती जा रही थी। यह जानते हुए भी कि अम्मा बगल कमरे में सो रही हैं। रात में कई-कई बार बाथरूम के लिए उठती हैं। किसी भी समय उठ सकती हैं, बातें सुन सकती हैं।

मैं यह सब एक बार भी सोचे बिना कैसी निडरता के साथ बतियाती रही। इतनी बेशर्मी, निर्लज्जता से भरी बातें सुनकर अम्मा के दिल पर क्या बीती होगी। उन पर तो जैसे वज्रपात हुआ होगा। उनका कलेजा फट गया होगा, कि जिस लड़की को सबसे ज़्यादा पाक-साफ़, स्वाभिमानी, मान-मर्यादा वाली समझती रहीं, वही सबसे ज़्यादा निर्लज्ज निकली। 
 

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