मेरा आख़िरी आशियाना - 3

01-09-2019

मेरा आख़िरी आशियाना - 3

प्रदीप श्रीवास्तव

चाचा चले गए। मैंने सोचा अम्मा निश्चित ही शादी में नहीं जाएँगी। जब इतना ग़ुस्सा हैं तो सोचेंगी कि वहाँ जाने पर सारे लड़के सामने होंगे। हो सकता है वह सब कुछ बातचीत करें। इसीलिए चाचा की लड़की की शादी में दिया जाने वाला गिफ़्ट अभी से दे दिया। चाचा के जाने के बाद अम्मा कई दिन उदास रहीं। मगर मेरी सारी आशंकाओं के उलट अम्मा चाचा की लड़की की शादी में गईं। चाचा ने दुनिया की चिंता करते हुए अम्मा के तीनों कपूतों को भी बुलाया। कहा, "अब सब हमसे बोलते-चालते हैं तो कैसे ना बुलाते।" तीनों भाई परिवार सहित शामिल भी हुए। अम्मा के पैर भी संकोच के साथ ही सही छूए। भाभियों ने भी, पोते-पोतियों ने भी छूए। हमारी अम्मा जो पत्थर से भी कठोर दिल लेकर गई थीं वह सभी के पैर छूते ही बर्फ़ बनके पिघल गया। बह गया आँसू बनकर।

अम्मा ने बहुत कोशिश करके अपने आँसुओं को रोका। रोना बंद किया, कि चाचा के परिवार का कोई देख ना ले, नहीं तो कहेंगे कि क्या शादी-ब्याह, हँसी-ख़ुशी के माहौल को ख़राब कर रही हैं। शुभ शगुन का काम हो रहा है और यह आँसू बहा कर अपशगुन कर रही हैं। अम्मा परेशान हो गईं थीं। मन उनका उचाट हो गया था। वह लड़की की विदाई के बाद ही वापस आना चाहती थीं लेकिन चाचा ने रोक लिया। असल में सच्चाई यह थी कि वह पोते-पोतियों के प्यार-दुलार में रुकी थीं।

सब दादी, दादी कहते हुए अम्मा से चिपट गए थे। चार-पाँच साल का पोता तो उनकी गोद से उतर ही नहीं रहा था। सब इतना पीछे पड़ गए कि दादी को अपने घर खींच कर ले ही गए। चाचा, चाची ने भी प्यार-मनुहार की कि "जाओ, चली जाओ भाभी, बच्चे कितना प्यार से कह रहे हैं, इनकी क्या ग़लती, इनका हक़ क्यों छीन रही हो। तुम्हारे प्यार-स्नेह आशीर्वाद पर इनका पूरा हक़ है।" 

असल में चाचा चाहते थे कि माँ-बेटों के बीच की खाई पट जाए। जो हुआ सो हुआ है। दिल से किसी बात को लगाकर क्या बैठना। चाचा ने ही चुपके से तीनों भाइयों से कहा था, "माँ को सम्मान के साथ बुलाओगे तो जाएँगी।" पोते-पोतियों का प्यार जहाँ अम्मा को घर की तरफ़ खींचे लिए जा रहा था। वहीं लड़कों, बहुओं ने एक बार भी नहीं कहा तो उनके पैर उठ ही नहीं रहे थे। चाचा के कहने पर जब तीनों भाइयों ने कहा तब वह गईं थीं।

वहाँ वह लाख कोशिश करके भी अपने आँसुओं को रोक नहीं सकी थीं। बरसों बाद उस घर में वह क़दम रख कर आँसू रोकने की हर कोशिश करके भी असफल रहीं। वह घर जहाँ डोली से उतरने के बाद उन्होंने अपने दांपत्य जीवन का पहला क़दम चलना शुरू किया था। वह घर-आँगन जहाँ उन्होंने जीवन के ढेर सारे सुनहरे पल बिताए थे। और जीवन का वह सबसे काला दिन भी देखा था जब पति की दर्दनाक मौत के बाद उनका पार्थिव शरीर आया था। और फिर अर्थी में श्मशान की ओर रवाना हुआ था, अपने ही बेटों के कंधों पर। और अब उनके जाने के बाद हालत यह हो गई है कि उन्हें यह प्रण लेना पड़ा कि अपने बेटों के कंधों पर वह नहीं करेंगी अपनी अंतिम यात्रा।

घर से कोई रिश्ता नहीं रखेंगी। वही घर-आँगन जहाँ गुनगुनाया करती थीं कि सूरज ना बदला चाँद ना बदला। मगर लड़के इतना बदल गए थे कि अपनी औलाद कहने में भी अम्मा को संकोच होता था। अम्मा वहाँ ज़्यादा देर नहीं रुक पायीं। पोते-पोतियों के लाख कहने पर भी नहीं। वे कहते रहे दादी रुक जाओ। उनके आँसू भी अम्मा को नहीं रोक पाए। क्योंकि चाचा के कहने पर जिन लड़कों ने उनसे चलने के लिए कहा था, घर पहुँचने पर उन सब ने उनसे एक बार भी रुकने के लिए नहीं कहा। अम्मा फिर पत्थर दिल बन चाचा के यहाँ लौट आईं थीं। और चाचा-चाची के ढेरों आग्रह के बावजूद अगले दिन सुबह ही वहाँ से वापस चित्रकूट आ गईं। चाचा से साफ़ कह दिया कि बिटिया घर पर अकेले है।

मैं शादी में नहीं गई थी। एक तो ऑफ़िस से छुट्टी नहीं मिल रही थी। दूसरे मैं उस जगह किसी सूरत में नहीं जाना चाहती थी जहाँ मेरा सम्मान, इज़्ज़त किसी और ने नहीं सगे भाइयों ने ही तार-तार की थी। आने के बाद अम्मा चाचा पर भी बहुत नाराज़ हुईं। कहा, "हमें बुलाकर इस तरह उन सब से मिलाने की कोशिश उनको नहीं करनी चाहिए थी। कोई रिश्ता टूटने के बाद कहाँ जुड़ता है, जो ये जोड़ने चले थे।" मुझे लगा अम्मा को चाचा के लिए ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए। उन्होंने तो परिवार को माँ-बेटों को एक करने का पवित्र काम किया था। कितनी अच्छी है उनकी भावना।

यह बात अम्मा से कही तो अम्मा बोलीं, "तुम सही कह रही हो, लेकिन क्या करूँ उन सब ने एक शब्द भी नहीं कहा कि अम्मा रुक जाओ। मेरा मन था कि मैं अपने आदमी, अपने पुरखों के घर में रुकूँ। उस घर में कुछ समय और बिताऊँ जहाँ जीवन के न जाने कितने सुख-दुख के पल जिए थे। जहाँ इन्हीं बच्चों को जन्म दिया। जहाँ रात दिन अपने सुख-दुख कष्ट की परवाह किए बग़ैर इन सब को पाला। जहाँ इन सब की तोतली बातों, लड़खड़ाते हुए चलने की कोशिश में गिरने, उठ कर खड़े होने को देख-देख कर मन मारे ख़ुशी के झूम-झूम उठता था। मगर कलेजा फट गया कि उन सब ने एक बार भी नहीं कहा कि अम्मा रुक जाओ। कान यह सुनने को तरस गए कि, "अम्मा रुक जाओ।"

जब वहाँ से निकलने लगी तो मैं अपने को घोर अपमानित महसूस कर रही थी। यह सोचते हुए क़दम बाहर निकाल रही थी कि दुबारा अब इस घर की छाया भी नहीं देखूँगी। बार-बार मन में आ रहा था कि मैं गाती थी कि कितना बदल गया इंसान, किसी और ने नहीं मेरी औलादों ने ही चरित्रार्थ करके दिखा दिया है। वह भी एक नहीं, दो नहीं, तीन की तीनों ने। तीनों एक ही ढर्रे पर। उन्होंने, हमने आख़िर कौन सी कमी की थी इन सब को पालने-पोसने में। जो लोग कहते हैं कि महतारी-बाप जो संस्कार देते हैं बच्चे वही बनते हैं। मैं कहती हूँ कि यह कहना पागलपन है। हम दोनों ने पूरे घर में हमेशा अच्छे संस्कार दिए। जब-तक शादी नहीं हुई थी इन सब की, तब-तक यह सब भी ठीक थे, सही-सही चल रहे थे।" अम्मा यह सब कह कर रोने लगीं थीं तो बड़ी मुश्किल से चुप कराया था।

वह कुछ देर शांत रहने के बाद फिर बोलीं थीं, "तुमने बहुत अच्छा किया जो साथ नहीं चली। साफ़ मना कर दिया। मैं ही मोह में पड़ गई थी जो तुमसे भी चलने के लिए कहा था। मन में ग़ुस्सा तो बहुत था लेकिन फिर भी मन में कपूतों से मिलने के लिए जी हुलस रहा था। मगर तुमने इनकार करके हमारी ग़लती को और बड़ा नहीं होने दिया। लेकिन अब ख़ून खौल रहा है। सुनो तुमसे बहुत साफ़ कह रही हूँ कि जब मैं मरूँ तो इन सब को भूलकर भी ख़बर ना देना।" 

अम्मा एकदम आग बबूला होकर बोलीं थीं। मैं कुछ बोलने को सोच ही रही थी कि अम्मा ने फिर चाचा का नाम लेकर कहा, "उनको भी किसी सूरत में नहीं बताना। क्योंकि मालूम होने पर वह उन सबको बताएँगे ज़रूर। तुम्हें मेरी क़सम है, जो मैं कह रही हूँ बिल्कुल वैसा ही करना। ऐसा न करके तुम सिर्फ़ मेरी ही नहीं अपने बाप की आत्मा को भी कष्ट दोगी। उनका अपमान करोगी।" मैं तब उनका ग़ुस्सा, उनकी दृढ़ता देखकर काँप उठी थी।

मैंने कहा, अम्मा तुम परेशान ना हो, जैसा तुम चाहती हो मैं वैसा ही करूँगी। मैं भी कैसी अभागी हूँ जो मुझे यह सब करने की ज़िम्मेदारी लेनी पड़ रही है। यह सुनते ही वह बोलीं, "अभागी तुम नहीं, अभागे तो वह तीनों कपूत हैं, जिनका अधिकार छीन कर मैं तुम्हें दे रही हूँ।"

पता नहीं मैं अभागी हूँ कि सौभाग्यशाली मगर मैंने अम्मा की सभी इच्छाएँ अक्षरशः पूरी की थीं। किसी को कानों-कान ख़बर ना होने दी। यह सब मुझे उनके द्वारा क़सम दिए जाने के पंद्रह साल बाद ही करना पड़ा था। मैं सोचती थी कि समय और उम्र के साथ-साथ वह सब भूल जाएँगी। लेकिन मैं ग़लत निकली। समय के साथ वह बहुत कुछ भूल गईं। मगर इस बात को बराबर याद रखा। ना सिर्फ़ याद रखा बल्कि मुझे बार-बार पूरी शक्ति के साथ याद भी दिलाती रहती थीं। चाचा तब कुछ-कुछ समयांतराल पर आते रहते थे।

अम्मा को यह अच्छा नहीं लगता था। वज़ह सिर्फ़ इतनी थी कि उन्हें इस बात पर चाचा को देखकर ग़ुस्सा आ जाती थी कि उन्होंने धोखे से उन्हें बेटों से मिलवाने की कोशिश की। आखिर एक दिन बोलीं, "बिटिया तुम यहाँ से ट्रांसफ़र करा कर किसी दूसरे शहर चलो, जो यहाँ से काफ़ी दूर हो।" मैंने पूछा क्यों अम्मा? यहाँ सब ठीक तो है। कई बार पूछने पर बोलीं, "जब तक यहाँ रहूँगी उनकी याद आती रहेगी। वह दर्दनाक घटना मुझे रुलाती रहेगी। जिस दिन उनके साथ यहाँ वह घटना घटी तभी से मुझे यहाँ से पता नहीं क्यों घृणा हो गई है। सोचती हूँ कि किस-किस से घृणा करूँ, कब तक करूँ। मैं छोड़ना चाहती हूँ इस बुरी आदत को, इसलिए कहीं दूर चलो।" उनकी भावनाओं के आगे मुझे झुकना पड़ा। डेढ़ साल तक लगातार कोशिश करके ट्रांसफ़र करा पाई। अम्मा के बताए शहर लखनऊ में।

अम्मा को मैंने यह कभी नहीं बताया कि ट्रांसफ़र के लिए मैंने पूरे पिचहत्तर हज़ार रुपए रिश्वत दी थी, नहीं तो मनचाहा शहर छोड़ दो, ट्रांसफ़र भी नहीं होता। अम्मा वज़ह के नाम पर बात केवल बाबूजी की करती थीं। लेकिन उनकी बातों से मैं साफ़ अंदाज़ा लगा रही थी कि वह चाचा से भी छुटकारा चाहती थीं। मेरी यह आशंका चित्रकूट से लखनऊ चलते समय कंफ़र्म हो गई। जब उन्होंने क़सम दी इस बात की और सख़्त हिदायत भी कि चाचा या किसी रिश्तेदार को भी कभी नहीं बताऊँगी कि हम कहाँ चल रहे हैं। उनकी बात सुनकर मैं कुछ देर तक उन्हें देखती ही रह गई थी। मैंने सोचा कि लखनऊ आकर वह कुछ दिन ज़्यादा डिस्टर्ब रहेंगी। नई जगह उन्हें एडजस्ट होने में समय लगेगा, मगर मैं ग़लत थी, लखनऊ में उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी जेल से छूटकर आज़ाद हो गई हैं, अपने घर पहुँच गई हैं।

लखनऊ आकर उनकी यह रट और ज़्यादा तेज़ हो गई कि जैसे भी हो मैं जल्दी से जल्दी शादी कर लूँ। अपनी कोशिश वह करती रहीं। मैं जब कहती अम्मा अब क्या शादी करनी। इतनी उम्र हो गई है। वह भी दूसरी शादी। तो कहतीं, "कोई उम्र नहीं हुई है। चौंतीस-पैंतीस साल में तो आजकल लोग शादी कर रहे हैं।" मैं कहती अम्मा सब की और मेरी बात अलग है। इसके आगे वह मुझे बोलने ना देतीं, नॉनस्टॉप शुरू हो जाती थीं। कहतीं, "तुम्हें दुनियादारी कुछ पता नहीं है। एक इंसान ग़लत निकला तो इसका मतलब यह नहीं कि सब वैसे ही होंगे। एक बार कुछ बात हो गयी तो इसका मतलब यह भी नहीं कि उसी बात को लेकर बैठे रहें, बाक़ी ज़िंदगी उसी बात को सोचने में गला दें।

ज़िंदगी में बहुत ऊँच-नीच होती रहती है, ऐसे अकेले कब तक ज़िंदगी काटोगी। मैं भी तुम्हारे लिए कितने दिन रहूँगी। ज़िंदगी भर तो बैठी नहीं रहूँगी। अपनी आँखों के सामने तुम्हारा घर-परिवार देख लूँ तो मुझे चैन पड़ जाए। नहीं तो मेरे प्राण भी नहीं निकलेंगे। यमराज से भी तू-तू, मैं-मैं करनी पड़ेगी कि रुक जाओ, अभी बिटिया की शादी करनी है।" उनकी इस बात पर मुझे हँसी आ जाती तो कहतीं, "बिटिया हँसो नहीं, तुम्हें मेरी तकलीफ़ का अंदाज़ा नहीं, लेकिन मुझे तुम्हारी तकलीफ़ का अंदाज़ा है। क्या मैं नहीं समझती कि तुम किस तरह ज़िंदगी जी रही हो।" उनकी इस बात पर मैं लाख कोशिश करती थी नॉर्मल बनी रहने की, लेकिन चेहरे पर घनघोर गंभीरता आ ही जाती थी।

ऐसे में कई बार हम माँ-बेटी रो पड़ती थी। अपनी-अपनी जगह बैठी हम दोनों ही रोती रहती। आँसू बहाती रहती। बड़ी देर बाद ख़ुद ही दोनों चुप हो जाती, क्योंकि हमें कोई चुप कराने वाला, सांत्वना देने वाला नहीं था। मैं उठती, चाय बनाती। अम्मा के साथ बैठकर पीती। असल में अम्मा अपनी जगह सही थीं। मैं भी अन्य की ही तरह ख़ुशहाल अच्छी ज़िंदगी जीना चाहती थी। मैं भी सपना देखती थी कि मेरा भी कोई पति हो, बच्चे हों, पूरा परिवार हँसी-ख़ुशी से रहे। परित्यक्ता बनने के डेढ़ साल बाद ही मैं यह सपना देखने लगी थी। लेकिन परिस्थितियाँ एक के बाद एक बिगड़ती ही गईं। समय तेज़ी से निकलता जा रहा था। मैं यह नहीं कहूँगी कि समय निकल गया और मुझे पता ही नहीं चला। मुझे सब पता चल रहा था। मैं एक-एक पल को तेज़ी से अपने से बिछुड़ते देख रही थी।

मैं अच्छी तरह समझ रही थी कि मेरे जीवन के स्वर्णिम पल निकलते जा रहे हैं। परिस्थितियों ने मुझे विवश कर रखा था। मेरी अनुभवी अम्मा की तेज़-तर्रार आँखें सब देख-समझ रही थीं। उनका अपने कपूतों से नफ़रत का कारण ही यही था कि मेरे भाइयों ने अपनी परित्यक्ता बहन की बजाए ज़िंदगी संवारने, उसकी दूसरी शादी करने के उसके चरित्र पर महज़ इसलिए कीचड़ उछाला, पूरे समाज में बदनाम किया जिससे मैं उनकी प्रॉपर्टी की हवस पूरा होने में और रोड़ा ना बनूँ। बाबूजी की नौकरी उनमें से किसी एक की बीवी को मिल जाए।

अम्मा की कोशिश में कहीं कमी नहीं थी। वह लगी रहीं। पेपर में निकलने वाले ऐड भी देखतीं। फ़ोन करतीं। लेकिन लोगों की बातचीत, प्रश्न सुनकर घबरा जातीं। दो-चार दिन शांत रहतीं फिर कोशिश करतीं। एक दिन मुझसे बोलीं, "सुन बिटिया मैं ठीक से बात नहीं कर पाती। कान से सुनाई भी कम देता है। ऐसा कर तू ही माँ बन कर बात किया कर। मैं सुनती रहूँगी।" उनकी बात मुझे बड़ी अटपटी लगी। लेकिन फिर उनकी ज़िद, उनका आदेश, जिसे मैं सालों-साल से मानती आई थी। मैं बात करती, वह ईयर फ़ोन का एक हिस्सा अपने कान में लगाकर बड़े ध्यान से सुनतीं। फिर कहतीं इससे आगे बात करेंगे, ये सही लग रहा है। या इससे आगे बात करना ठीक नहीं है।

उनकी इस कोशिश के चलते कई लोग आए भी। लेकिन बात जहाँ से शुरू होती वहीं ख़त्म हो जाती। किसी की नज़र में मैं ज़्यादा हेल्दी होती चली गई थी, तो किसी की नज़र में ज़्यादा लंबी थी। कईयों के घरवालों ने तो बड़ी बेशर्मी से यह पूछा कि, "क्या सच में पहली शादी से तुम्हारे कोई बच्चे नहीं हैं।" फ़ोन पर सारी बातें बता दिए जाने के बावजूद यह पूछा जाता था। इन बातों से हम दोनों माँ-बेटी बहुत आहत होती। बड़ा अपमान महसूस करती थी। मैं कहती, बस कर अम्मा अब और अपमान नहीं सहा जाता।

लेकिन अम्मा अपनी बिटिया की ख़ुशी, उसकी ज़िंदगी सुरक्षित करने के लिए कुछ भी सहने को तैयार थीं। इस काम में हम माँ-बेटी को लगा कि किराए का मकान ठीक नहीं है। इसलिए अपना मकान जो हम कुछ समय बाद लेने की सोच रहे थे उसे जल्दी से जल्दी लेना तय किया। इसमें खेत बेचने से मिले पैसों से बड़ी मदद मिली। फिर भी बजट कम होने के कारण मेन सिटी से थोड़ा दूर एक सोसाइटी में लेना पड़ा। जो मेरे ऑफ़िस से क़रीब तीस किलोमीटर दूर था। आने-जाने में होने वाली दिक्क़तें मुझे बिल्कुल थका देती थीं। कई टेंपो बदलकर ऑफ़िस से घर पहुँच पाती थी।

ऑफ़िस में भी वही माहौल था, जैसा दुनिया में अन्य जगह है। कुछ अच्छे, तो ज़्यादातर नोचने खाने वाले लोग ही मिले। दो सीनियर तो पहले ही दिन से पीछे पड़ गए थे। बिना काम के बुला कर बैठा लेते थे। बहुत क़रीबी, बहुत हमदर्द बनने का प्रयास करते दोनों। उन दोनों की पूरी हिस्ट्री वहाँ के बाक़ी लोगों ने बड़ी जल्दी ही बता दी थी। दोनों की मक्कारी जान-समझ तो मैं भी रही थी। इसलिए धीरे-धीरे अपनी दूरी बढ़ाती रही।

एक दिन एक कुछ ज़्यादा ही आगे बढ़ा तो साफ़ कहा कि, सर कोई काम हो तभी बुलाया करिए। मैं बेवज़ह की बातें पसंद नहीं करती। दोनों के मन की नहीं हुई तो दोनों परेशान करने का कोई रास्ता नहीं छोड़ते थे। उनके चमचे भी साथ लगे रहते थे।

चित्रकूट में मैंने इस तरह की समस्या का सामना नहीं किया था, इसलिए यहाँ एकदम परेशान हो गई थी। दोनों सीनियर का डर इतना था कि बाक़ी लोग यहाँ तक कि महिलाएँ भी मुझसे बात करने से कतराती थीं। मैं अम्मा को कुछ नहीं बताती थी कि वह परेशान होंगी। जैसे-तैसे आगे बढ़ती रही। विभाग का लेखा अधिकारी था तो कम उम्र का ही लेकिन था बहुत ही तेज़-तर्रार। बड़े रौब-दाब के साथ रहता था। थोड़ा उद्दंड भी था। सीनियर ने जानबूझकर मुझे उसी के साथ अटैच कर दिया, कि मुझे अकाउंट का काम आता नहीं, वह खुर्राट आदमी मुझे रोज़ प्रताड़ित करेगा, जब उसे पता चला तो वह भी तुरंत समझ गया कि निशाना कहाँ है।

उसने छूटते ही भद्दी-भद्दी गालियाँ दीं सीनियर को। यह भी ना सोचा कि मैं सामने खड़ी हूँ। जब उसका ग़ुस्सा कम हुआ तो बोला "सॉरी, यह साले इसी लायक़ है। बताइए आपने अकाउंट का काम कभी किया नहीं, आप से काम लूँ, अकाउंट का मामला है, कुछ गड़बड़ हो गई तो दोनों की नौकरी ख़तरे में, या फिर मैं अकेले ही करता रहूँ। बदनाम यह करेंगे कि एक वर्किंग हैंड साथ दिया तो है, काम क्यों नहीं लेते, क्यों नहीं सिखाते, वह काम नहीं कर रही है तो यह तुम्हारा फ़ेल्योर है।" 

वह सही कह रहा था। सीनियर ने एक तीर से कई निशाने साधे थे। खुर्राट आदमी और मुझको एक साथ परेशान करने और हमारी नकेल कसने के लिए। उनका अनुमान था कि मैं काम जानती नहीं तो ग़लती मिलते ही पनिश करने मौका उन्हें आसानी से मिल जाएगा। इससे मैं अपनी नौकरी बचाने के चक्कर में उनके सामने सरेंडर कर दूँगी। इस चाल से मैं बहुत डर गई थी। कई दिन मुझे ठीक से नींद नहीं आई थी।

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