मेरी प्रिय मित्र शैल जी: एक संस्मरण 

01-07-2026

मेरी प्रिय मित्र शैल जी: एक संस्मरण 

आशा बर्मन (अंक: 300, जुलाई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

अभी भी विश्वास नहीं आता है कि शैल जी हमें छोड़कर चली गई हैं। मेरा और उनका साथ बहुत पुराना है, 43 वर्ष पुराना। वे मेरे निकट के मित्रों में से थीं। मेरी लेखनी ‘हैं’ के स्थान पर ‘थीं’ के लेखन में बाधा दे रही है। कैसे एक ही पल में एक व्यक्ति वर्तमान से भूतकाल में परिवर्तित हो जाता है। उनसे बराबर मेरी बातचीत और मिलना जुलना होता ही रहता था। वे एक अत्यंत स्नेही व्यक्ति थीं। शैल जी का व्यक्तित्व अत्यंत सरल और स्नेहपूर्ण था। बहुत ही हँसमुख उनका स्वभाव था। वे अत्यंत स्पष्टवादी थीं।

आठवें और नवें दशक में यहाँ टोरोंटो में हिंदी की एक मासिक गोष्ठी होती थी। उसी हिंदी गोष्ठी से हमारी मित्रता का सूत्रपात हुआ। अपनी नयी-नयी रचनाएँ लेकर उस गोष्ठी में हम रचनाकार हर महीने मिलते थे, हमारा युवा मन उत्साह से भरा रहता था  और प्रत्येक बार अपनी रचनाएँ सुनते-सुनाते थे। उसमें अचला जी, शैल जी, डॉक्टर यादव, आनंद प्रकाश जैसे लोग थे। यह गोष्ठी हर महीने सबके घरों में होती थी। हम लोगों का समय बहुत अच्छा बीतता था। उन्हीं दिनों हम सभी ने बहुत सारी कविताएँ लिखी थीं। तत्कालीन वरिष्ठ कवि डॉक्टर यादव से हम लोगों को बहुत ही उत्साह मिलता था। उन दिनों वर्ष में एक बार प्रोफ़ेसर हरिशंकर आदेश जी को भी हम लोगों को कवि सम्मेलन के लिए बुलाते थे। टोरोंटो में उनका एक शिक्षा संस्थान था, जहाँ प्रतिवर्ष वे एक कवि सम्मेलन का आयोजन करते थे। कभी-कभी अपने घर पर भी वे कवि सम्मेलन करते थे। उसमें शैल जी और उनके पति श्री नरेंद्र शर्मा हम लोग के साथ ही जाते थे। इसके अलावा भी हम लोग प्रायः मिलते रहते थे। 1987 में कैलगरी के श्री नाथ द्विवेदी जी ने तत्कालीन हिंदी के कई कवि-कवयित्रियों को लेकर एक काव्य संकलन निकाला था, जिसका नाम था ‘कैनेडियन हिंदी काव्यधारा’।

इस पुस्तक का विमोचन हुआ था तत्कालीन काउंसिलाध्यक्ष श्री वी पी सिंह जी के द्वारा तब का एक चित्र संलग्न है, इसमें क्रम से हैं, शैल जी, आशा बर्मन, श्री वी.पी. सिंह और स्नेह सिंघवी जी। 

शैल जी सबसे बहुत प्यार से बात करती थीं। जैसे उनका व्यक्तित्व सरल था, वैसे ही उनकी कविताएँ भी बहुत सरल सहजमयी होती थीं। वे मध्य प्रदेश से थीं। उनकी भाषा उर्दू मिश्रित हिंदी थी, लेकिन भाव इतने गहरे होते थे कि मन को गहराई से स्पर्श करते। कवि सम्मेलनों में उनको बहुत ज़्यादा प्रशंसा मिलती थी। भारतेन्दु जी उनको उस समय की टोरोंटो की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री मानते थे। शैल जी की प्रसिद्ध कविताओं के कुछ अंश मैं साझा करना चाहती हूँ । 

 

 

माटी की सुगंध

जब अपनी माटी की गंध मुझे नहीं मिलती
तो मैं बेचैन हो जाती हूँ 
ठीक उसी तरह
जैसे छोटे बच्चे को अँगूठा
चूसने से रोक दिया जाए
यह भी नहीं कि जो गंध 
मुझे यहाँ की माटी में आती है
वह अच्छी नहीं लगती 
जीने के लिए यह भी अच्छी है
पर अन्दर कहीं एक बेचैनी 
रहती है पाने को
अपनी माटी की गंध, 
जिसमें पलकर में बड़ी हुई
 
इसे भला मैं आप या कोई 
कैसे भूल सकता है
उसमें अपनापन है, आत्मीयता है
और आंतरिक सुंदरता है
 
अहम की दीवार

यूँ लगा तुमको पुकारूँ कई कई बार
और मैं तुमको बता दूँ तुमसे कितना प्यार
पर न जाने क्यों जिह्वा से कुछ नहीं कहती
बीच में आ जाती है यह अहम की दीवार
 
ग़लतियाँ कुछ आपकी हैं, कुछ हमारी भी
क्यों हुई है मुझसे ग़लती, जानता है दिल
पर कभी भी सामने नहीं कर सकी स्वीकार
बीच में उठ आई है, यह अहम की दीवार 

शैल जी से मेरा प्रथम परिचय जितना आकस्मिक था उतना रोचक भी।

मुझे याद है 1986 जनवरी की एक शाम और मैं एक कवि सम्मेलन में गई। यह हिंदी परिषद का कवि सम्मेलन था। त्रिपाठी जी ने उसको आयोजित किया था। मैसेज सिंघवी उसमें संचालन कर रही थीं, एक साथ अनेक कवि स्टेज पर बैठे थे। जिसमें प्रोफ़ेसर आदेश जी, भारतेन्दु जी, डॉक्टर यादव जी। कैनेडा में यह मेरा पहला कवि सम्मेलन था, वहाँ जाने के लिए मैं बहुत उत्सुक भी नहीं थीं। मुझे लगा, छोटे बच्चों को छोड़कर जाना, पता नहीं कैसा होगा कैनेडा का कवि सम्मेलन। पर जब मैं गई, तो मुझे बहुत ही अच्छा लगा। बहुत दिनों के बाद इतनी शुद्ध हिंदी में कविताएँ सुनीं, बहुत साल के बाद एक हिंदी का कार्यक्रम देखा, तो मैं जैसे भाव विभोर हो गयी। जहाँ मैं जाने के लिए उत्सुक नहीं थीं, वहाँ से आना मेरे लिए कठिन हो रहा था।

कार्यक्रम के पश्चात जब मैं शैल जी से मिली और उनको मैंने बताया कि मुझे कितना आनंद आ रहा है उस कार्यक्रम में। उन्होंने मुझसे अपना फोन नंबर देने का अनुरोध किया। उन्होंने मुझे फोन किया और अपने घर बुलाया। उन दिनों एक मासिक गोष्ठी हुआ करती थी, जहाँ हिंदी के नए रचनाकारों को रचना पाठ के लिए आमंत्रित किया जाता था। उन्होंने मुझे वहाँ जाने के लिए आमंत्रित किया। वहाँ पर डॉक्टर यादव के संचालन में नए कवि मिलते थे और अपनी गद्य पद्य में नियमित रूप से अपनी रचनाएँ सुनते-सुनाते थे। मैं हर माह वहाँ जाने लगी और तब शैल जी से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई। वे मेरे घर के पास भी थीं अतः हम लोग का मिलना-जुलना भी बढ़ गया। बहुत दिनों के बाद एक दिन मैंने उसे पूछा, कि “अच्छा शैल जी, जब पहली बार मैं आपसे मिली, आप तो स्टेज पर बैठी थीं तब मैं दर्शक ही थी। तो मुझे चाहिए था कि मैं आपका फोन नंबर लूँ, पर आपने मेरा नंबर क्यों लिया?” उनका उत्तर बड़ा रोचक था। वे बोलीं कि “बात यह कि आपने मेरी कविता की इतनी प्रशंसा की, तो मुझे लगा कि आज तक किसी ने भी मेरी कविताओं की इतनी प्रशंसा नहीं की थी। तो मुझे लगा इनसे मिलना चाहिए।”

इस प्रकार कि हमारी मित्रता की शुरुआत हुई। उसके बाद हम लोगों की मित्रता इतनी बढ़ी कि हम महीने में दो-तीन बार मिला करते थे फिर हम लोग कवि सम्मेलनों में भी साथ-साथ जाते।

उन दिनों शैल जी की कविताएँ बहुत पसंद की जाती थीं। सातवें और आठवें दशक में शैल जी के साथ मैंने हिंदी परिषद तथा हिंदी साहित्य सभा के अंतर्गत कई कार्य किये। सभा का आयोजन, मंच संचालन, कवि सम्मेलन में भाग लेना इत्यादि। बहुत आनंद आता था उनके साथ कार्य करके। नवें दशक में अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में हमारे साथ वे लोग रॉचेस्टर गए थे। उस समय की भी मधुर स्मृतियाँ मेरे मन में अंकित हैं। 

एक और बहुत रोचक स्मृति है। शैल जी, अचलाजी, इंदु जी इन मित्रों के जन्मदिनों पर हम लोग कविताएँ लिखते थे। शैल जी और उनके पति श्री नरेंद्र शर्मा जी की शादी की 25 सालगिरह पर मैंने अचला जी के साथ मिलकर एक पैरोडी गीत रचा था जो उन्होंने बहुत पसंद किया। यह नीरज जी के एक गीत पर आधारित था। उन दिनों शर्मा जी भी व्यंग्य लिखते थे और हमारी गोष्ठी में सुनाया करते थे। इसी सम्बन्ध में हम लोगों ने लिखा था। शर्मा जी शैल जी से कहते हैं: 

मैं व्यंग्य का राजकुँवर हूँ

तुम शहज़ादी काव्य जगत की
यदि हम दोनों ही ना लिखें तो
हिंदी भाषा का क्या होगा
मैं व्यंग्य का राजकुँवर हूँ . . .
 
इतने दानी नहीं मित्रगण
अपनी एक पुस्तक छपवा दे
इतना भावुक नहीं है कोई
हमको एक सम्मान दिला दे
 
लिखना इतना सहज नहीं है
फिर भी यह सोचा करता हूँ
यदि जग न समझे इन भावों को 
जाने भुवन कहाँ पर होगा ? 
मैं व्यंग्य का राजकुँवर हूँ

2010 के बाद उनके पति श्री नरेंद्र शर्मा जी की तबीयत ख़राब होने की वजह से शैलजी जी काफ़ी परेशान थीं, फिर स्वयं उनकी तबियत पिछले 2 वर्षों से अच्छी नहीं थीं और क्रमशः धीरे-धीरे वे हिंदी के कार्यक्रमों से दूर होती गयीं और पिछले 7 साल में तो वे कहीं जाती नहीं थीं। उन्होंने अपने आप को सबसे अलग कर लिया था। मैं साथ चलने के लिये उत्साहित भी करती थीं पर सफल न हो सकी।

पर उनको हिंदी में रुचि रहती थीं, इसलिए जब मैं भी कोई प्रोग्राम देखती, ऑनलाइन कोई अच्छा प्रोग्राम होता, मैं उन्हें लिंक भेजती थीं तो वे उस लिंक के द्वारा सब सुनती थीं। हमारे उत्तर अमेरिका का होली का कार्यक्रम भी उन्होंने देखा। हिंदी घर की कोई अच्छी कहानी भी सुनती थीं, फिर उसके बारे में बातचीत भी करती थीं।

बहुत अच्छी स्मृतियाँ हैं मेरे मन में उनके लिए और हमेशा रहेंगी  क्योंकि हम लोग परस्पर एक आंतरिकता के बंधन से जुड़े थे। यद्यपि शैल जी ने इहलोक से विदा ले ली है पर मेरे हृदय में उनके लिए एक विशेष स्थान सदा से रहा है और रहेगा।

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