मन को बच्चा ही रहने दो
दीपमाला
बड़े चाहे जितने हो जाओ
मन को बच्चा ही रहने दो
मन होगा गर बच्चे जैसा
निश्छल प्रेम को समझोगे तुम
अगर होगी भी कभी लड़ाई
मिनटों में सुलझा लोगे तुम
झगड़े कितने भी हो जाएँ
मन को बच्चा ही रहने दो।
बच्चा होने में ही असली
जीवन का आनंद है भैया
बड़े हो गए जिस दिन तुम
जीवन होगा जंग ओ भैया
उम्र भले कितनी बढ़ जाए
मन को बच्चा ही रहने दो।
बच्चे सा मन होगा कोमल
मन के भाव समझ जाओगे
उनके जैसा दिल होगा तो
सबके दिल में रह पाओगे
करो दूर मन से कटुताएँ
मन को बच्चा ही रहने दो।
यूँ ही बच्चे गर बने रहोगे
बचपन जीवंत रहेगा सदा ही
नीरस होगा कभी ना जीवन
ख़ुशियाँ यूँ ही रहेंगी सदा ही।
दूर छिटक सारी चिंताएँ
मन को बच्चा ही रहने दो।
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- कविता
-
- अनोखी भाषा
- अपने लिए भी वक़्त निकालो
- आँगन की गौरैया
- उस घर में ही होंगी ख़ुशियाँ
- उस दिन नई सुबह होगी
- एक स्त्री की मर्यादा
- काश होता इक कोपभवन
- क्यूँ ना थोड़ा अलग बना जाए
- चिट्ठियाँ
- जब माँ काम पर जाती है
- दीप तुम यूँ ही जलते जाना
- नीम का वो पेड़
- प्रेम की भाषा
- बेटे भी बेटियों से कम नहीं होते
- मन को बच्चा ही रहने दो
- माँ नहीं बदली
- माँ मैं तुमसी लगने लगी
- मेरी अभिलाषा
- मज़दूर की परिभाषा
- ये आँखें तरसती हैं
- ये जीवन के एहसास
- रामायण
- वो नारी है
- संस्कारों की जकड़न
- सपने
- सर्दियों की धूप
- सहयोगी बना पाओगे
- स्त्री का ख़ालीपन
- हमारा गौरव
- ग़लतियाँ
- ज़िन्दगी की दास्तान
- ललित निबन्ध
- चिन्तन
- कहानी
- विडियो
-
- ऑडियो
-