लिखते हुए
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श’
कितना अच्छा लगता है
उसके बारे में लिखना भी।
उसके बारे में लिखते वक़्त
हम शिकायत नहीं करते,
हम उसे बचा लेते हैं
समय की आँच से।
कुछ लोग ज़िंदगी से चले जाते हैं,
लेकिन लिखते समय
वो फिर सामने बैठ जाते हैं,
बिल्कुल वैसे ही
जैसे कभी थे।
इसलिए अच्छा लगता है।
क्योंकि लिखते हुए
हम उसे खोते नहीं,
हम उसे समेट लेते हैं।
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- कविता
- ग़ज़ल
-
- अंततः अब मिलना है उनसे मुझे
- इक लगन तिरे शहर में जाने की लगी हुई थी
- इश्क़ तो इश्क़ है सबको इश्क़ हुआ है
- इश्क़ से गर यूँ डर गए होते
- उनकी अदाएँ उनके मोहल्ले में चलते तो देखते
- गीत-ओ-नज़्में लिख उन्हें याद करते हैं
- गुनाह तो नहीं है मोहब्बत करना
- दिल उनका भी अब इख़्तियार में नहीं है
- मेरा सफ़र भी क्या ये मंज़िल भी क्या तिरे बिन
- रोज़ जोश-ए-जुनूँ आए
- सिर्फ़ ईमान बचा कर मैं चला जाऊँगा
- सुनो तो मुझे भी ज़रा तुम
- हर सम्त इन हर एक पल में शामिल है तू
- विडियो
-
- ऑडियो
-