जुदा भी हों तो किसी से कोई ख़फ़ा न लगे
सत्यवान साहब गाज़ीपुरी
मुज्तस मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़
मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़इलुन
1212 1122 1212 112
जुदा भी हों तो किसी से कोई ख़फ़ा न लगे
मैं चाहता हूँ मुझे आप बेवफ़ा न लगें
भरें हम आह सदा एक दूसरे के लिए
मगर किसी को भी इस प्यार की हवा न लगे
करूँ मैं आप की तारीफ़ बज्म-ए-महफ़िल में
मेरी ग़ज़ल में अगर आप को बुरा न लगे
कभी न टूटे ये रिश्ता है वास्ता दिल का
चलें न साथ मगर फिर भी हम जुदा न लगें
बुनूँ न मैं भी कोई ख़्वाब दूसरे के लिए
किसी पे आप भी मुझको कभी फ़िदा न लगें
ये क्या हुआ कि मेरा दिल ख़फ़ा सा है साहब
किसी की बात मुझे आजकल भला न लगे