ठहरे न मगर वक़्त, धुरी की तरह क्यूँ है
सत्यवान साहब गाज़ीपुरी
मफ़ऊल मुफ़ाईलु मुफ़ाईलु फ़ऊलुन
221 1221 1221 122
इंसान की आदत भी इसी की तरह क्यूँ है
ठहरे न मगर वक़्त, धुरी की तरह क्यूँ है
हर शख़्स यहाँ अपने ही साए से डरे क्यूँ
सीने में छुपी आग छुरी की तरह क्यूँ है
इस दौर में एहसास की क़ीमत नहीं कोई
हर आँख यहाँ सूखी नदी की तरह क्यूँ है
इक प्यार के बदले में वफ़ाएँ ही तो माँगूँ
पर तू मेरे पहलू में कमी की तरह क्यूँ है
रिश्ते भी यहाँ धूप के टुकड़ों से लगे हैं
थोड़ी-सी मिली छाँव घड़ी की तरह क्यूँ है
जो लोग कभी साथ थे अब ख़्वाब से बिछड़े
हर याद ही टूटी-सी कड़ी की तरह क्यूँ है
अपने ही सवालों में घिरे बैठे हो ‘साहब’
हर सोच मेरी फैली सदी की तरह क्यूँ है
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- ग़ज़ल
-
- अकेले मिलेगा कहाँ चाँद फिर से
- उलझी हुई हम अपनी कहानी से भी आगे
- चाह मिलने की जागी सनम है
- जुदा भी हों तो किसी से कोई ख़फ़ा न लगे
- जो यूँ नाज़-ए-उल्फ़त में खोते फिरोगे
- झिलमिलाती जो झरोखों से वहीं झिलमिल हो तुम
- ठहरे न मगर वक़्त, धुरी की तरह क्यूँ है
- दिल को मेरे नाम ज़रा करके देखो
- दिल ने समझा तुझे ही हल शायद
- बन के माँझी कोई पतवार लिए बैठा है
- मेरे जाने के भी क़िस्सों से महक आएगी
- रोकने को तो खड़ा पूरा ज़माना होगा
- वक़्त से आर-पार करता हूँ
- हुस्न वालों से खुले-आम हवा दिल्ली की
- नज़्म
- विडियो
-
- ऑडियो
-