झिलमिलाती जो झरोखों से वहीं झिलमिल हो तुम

15-04-2026

झिलमिलाती जो झरोखों से वहीं झिलमिल हो तुम

सत्यवान साहब गाज़ीपुरी (अंक: 295, अप्रैल द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

रमल मुसम्मन महज़ूफ़
फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन
 
2122    2122    2122    212
  
झिलमिलाती जो झरोखों से वहीं झिलमिल हो तुम
राह मुश्किल ही सही फिर भी मेरी मंज़िल हो तुम
 
इक अधूरी दास्ताँ का आख़िरी अरमाँ मेरा
हर अधूरापन जो पूरा कर सके वो दिल हो तुम
 
हर दफ़ा नज़रें मिलाना उलझनों के बावजूद
इस क़दर मासूम होकर भी बड़े क़ातिल हो तुम
 
राह में तूफ़ानी साए हों अँधेरे कम सही
जब भी चाहूँ हाथ थामूँ हर दफ़ा मुश्किल हो तुम
 
तिल जो चूमा था कभी यूँ मुस्कुराकर प्यार में
आज तक क़िस्मत के माथे पर गुलाबी तिल हो तुम
 
दूर होकर भी सदा बनकर भटकती हो यहीं
इक सुकूँ की ख़ामुशी में भी मुझे हासिल हो तुम
 
दिल के दरिया में उतर के ख़ुद से बिछड़ा जो कोई
राह भटके को सहारा दे वही साहिल हो तुम
 
जिसको चाहा था दुआ बनकर वही दिल में बसा
यूँ जो रग रग में उतर आए मेरे क़ाबिल हो तुम
 
दिल में रहते हो मगर दिल को ख़बर होने न दो
इस क़दर चुपचाप मुझमें क्यों मेरे बिस्मिल हो तुम
 
तेरे दर पे आ गया अब तो मुझे अपना भी लो
आख़िरी ख़्वाहिश मेरी तुम ही मेरी मंज़िल हो तुम

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