चाह मिलने की जागी सनम है

15-05-2026

चाह मिलने की जागी सनम है

सत्यवान साहब गाज़ीपुरी (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़े
 
212    212    212    2
 
रंग बरसे, बहकते क़दम हैं
चाह मिलने की जागी सनम है
 
तुम कहो तो फ़ज़ा ही बदल दें
यूँ तेरा चुप भी रहना सितम है
 
तुम यहीं, हम कहीं ढूँढ़ते हैं
क्यों कि हम ख़ुद में मौजूद कम हैं
 
दिल में उठती लहर इस तरह की
दूर हो के भी नज़दीक हम हैं
 
फूल खिलते तो हैं मुस्कुराकर
रौंद देती हवा बेर'हम है
 
'साहब' उसकी गली जो भी गुज़रा
आज तक आँख सब ही के नम है

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