ज़मीं को फ़लक से मिला दें हवाएँ
सत्यवान साहब गाज़ीपुरी
घटाओं को इतना झुका दें हवाएँ
ज़मीं को फ़लक से मिला दें हवाएँ
तड़पती हैं पनघट पे मुरझा के कलियाँ
जो वर्षों से सूखी पड़ी वन की नदियाँ
कहीं से तो कुछ बूँद ला दें हवाएँ
ज़मीं को फ़लक से मिला दें हवाएँ
जो सोया है दिल बन के तूफ़ाँ जगा दे
वो चाहें न चाहें मगर मेरी यादें
ख़यालों में उनके सजा दें हवाएँ
ज़मीं को फ़लक से मिला दें हवाएँ
जहाँ भी तेरे हों छलकते हुए जाम
मेरी बेख़ुदी का बहारों को पैग़ाम
कभी फूल बनकर लुटा दें हवाएँ
ज़मीं को फ़लक से मिला दें हवाएँ
समंदर में चीख़ें जो रह रह के गूँजें
ये ‘साहब’ के अश्कों की कश्ती न डूबे
किसी भी किनारे लगा दें हवाएँ
ज़मीं को फ़लक से मिला दें हवाएँ
ख़ुशी की सुगंधों में पल पल लपेटें
मेरा दर्द बनकर तेरा ग़म समेटें
कभी मरहमों सा सिला दें हवाएँ
ज़मीं को फ़लक से मिला दें हवाएँ
ख़यालों की महफ़िल का दिल ये परिंदा
इसे उम्र भर गुनगुना के है ज़िंदा
ये ‘साहब’ की ग़ज़लें सदा गूँजती हों
हर इक सम्त उनको सुना दें हवाएँ
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