अकेले मिलेगा कहाँ चाँद फिर से
सत्यवान साहब गाज़ीपुरी
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
122 122 122 122
वो गलियाँ, वो राहें बता चाँद फिर से
अकेले मिलेगा कहाँ चाँद फिर से
ये सारा जहाँ देख ले फिर नज़ारा
मेरी छत पे मिलने को आ चाँद फिर से
मैं चुपके से तुझसे निगाहें मिलाऊँ
ज़माने से मुझको छुपा चाँद फिर से
न मुझसे सही, तू किसी का तो हो जा
किसी का तो कर दे भला चाँद फिर से
वो पनघट पे हम तुम, खिलें बन के इक गुल
चला दे वफ़ा की हवा चाँद फिर से
मैं झिलमिल झरोखे को कब तक निहारूँ
दिखा दे मुझे चेहरा आ चाँद फिर से
तेरे हाथ 'साहब' की पतवार-ए-कश्ती
भँवर में न यूँ तू डुबा चाँद फिर से
अँधेरों में 'साहब' से मिलना-बिछड़ना
किसी का न यूँ दिल दुखा चाँद फिर से
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