कुछ संवाद, ख़ुद के साथ: 001
ममता मालवीय 'अनामिका'
दुनियाँ की सबसे ख़ूबसूरत चीज़ों में से एक है, एक लेखक द्वारा किसी अन्य लेखक पर लिखी हुई कोई किताब।
पढ़ते वक़्त ऐसा लगता है, मानों “दुनियाँ के सारे लेखकों में एक जैसा पागलपन है। जो उन्हें इस दुनियाँ में रहकर भी, एक अलग दुनियाँ बनाने का धक्का दे रहा हो।”
मैं जब भी कभी ज़िन्दगी के रास्ते में किसी पड़ाव पर ठहर जाती हूँ। आगे जाने का कोई बहाव नज़र नहीं आता, तो अक्सर कोई किताब उठा लेती हूँ।
“जीवन की गाड़ी को आगे धक्का देने के लिए, एक किताब पढ़ लेना काफ़ी होता है।”
किताबों से याद आया, किताबें पढ़ कर एक लाइब्रेरी बनाने का मेरा एक अदना-सा सपना है। ना जाने कब, कैसे, पूरा होगा। हाँ मगर जब पूरा हो जाएगा, तो चाहे किसी भी उम्र में रहूँ, फोटो खींच कर ‘फ़ुल फ़्लैक्स’ मारूँगी।
हालाँकि फ़िलहाल दिव्य प्रकाश दुबे की ‘अक्टूबर जंक्शन’ पढ़ रही हूँ। किताब पूरी भी नहीं हुई और मैं ख़ुद का लिखने बैठ गई। सपने और कहानियाँ भी ऐसे ही होते हैं, “जब हम किसी और के सपने के बारे में सुनते हैं, किसी और की कहानी पढ़ते हैं, तब अचानक से बीच में कूद कर हमारी कहानी आ जाती है। हमारे सपने आँखों में पानी बन कर झलक उठते हैं। और अपने ताने बाने बुन कर हमारे चेहरे पर गुलाबी तितली बिखेर देते हैं।”
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