अंकुर सिंह

अंकुर सिंह

अंकुर सिंह

जन्मतिथि: मई 1992
शिक्षा: 2012 मैकेनिकल इंजीनियरिंग से डिप्लोमा (पॉलीटेक्निक)
प्रारंभिक सृजन काल: विधार्थी जीवन से
साहित्यिक परिचय:

देश-विदेश से प्रकाशित अनेक समाचार पत्रों और  और पत्रिकाओं में नियमित अंतराल पर राजनीतिक, सामाजिक एवम साहित्यिक मुद्दों पर लेख, कहानी के साथ कविताओं का प्रकाशन होता रहता है। अनेक साहित्यिक संस्थाओं से साहित्य शिरोमणि, साहित्यनुरागी, साहित्य दीप, शारदेय, वीणापाणी, काव्य रत्न, काव्य लोक, हिमावंत साहित्य गौरव, वागीश्वरी, विधायदायिनी, काव्य गौरव सम्मान 2020, साहित्य रचना सम्मान जैसे अनेकों साहित्यिक सम्मान पत्र मिल चुके हैं। 

लेखन के प्रति रुचि स्कूल के दिनों से थी। इंजिनियरिंग में आने पर लेखन छूट सा गया था। कभी-कभी सोशल साइट पर लिखता रहता था। राजस्थान के साहित्यिक मित्र राजेश जी ज्ञानीचोर ने प्रेरित किया ’अच्छा लिखते हैं पत्र पत्रिकाओं में लिखा करें’। उनके प्रेरणा के साथ साहित्य सेवा में चाचा महेंद्र सिंह राज, सुधीर श्रीवास्तव, जमील और सोनल ओमर इत्यादि अनेक मित्रों का मार्गदर्शन और विशेष सहयोग मिलता रहता है।

व्यक्तिगत परिचय:

उत्तर प्रदेश के जौनपुर ज़िला, डोभी ब्लाक में वरिष्ठ समाजसेवी रघुकुलश्रेष्ठ बाबू रामेश्वर प्रसाद सिंह के तीसरे संतान के रूप में जन्म हुआ। बचपन काल में माता सत्यभामा की तबियत ख़राब होने के कारण दादी चंद्रकुमारी देवी और बड़ी बहन प्रिया ने पालन पोषण में विशेष ध्यान रखा। दूसरी बहन प्रियंका का उपनाम गूंजा होने के कारण गुंजेश नाम मिला। पिता बजरंगी नाम से बुलाते थे बचपन में और इसी कारण बजरंग कंस्ट्रक्शन फ़र्म बना पीडब्ल्यूडी में बी क्लास के ठेकेदार थे पर माँ के तबीयत और सामाजिक, राजनीतिक गतिविधियों में ज़्यादा रुचि के कारण व्यवसाय पर ध्यान न दे पाने के कारण उनका व्यवसाय ज़्यादा दिन चल नहीं पाया। परिवार की ज़रूरत की चीज़ें खेती, पारिवारिक संपत्ति से मिलने वाले किराए के साथ दादी की पेंशन पर निर्भर रहने लगी। बड़ी बुआ इंद्रबाला, नाना दिनेश (कहने को ये चचेरे नाना है लेकिन ननिहाल का सुख यहीं मिला) और अन्य कुछ लोगों ने शिक्षा पूर्ण करने में विशेष योगदान दिए। प्रारंभिक शिक्षा दुर्गा शिक्षा सदन, सरस्वती शिशु/विद्या मंदिर के बाद दसवीं और बारहवीं श्री गणेश राय इंटरमीडिएट कॉलेज कर्रा डोभी जौनपुर से हुईं। उसके बाद प्रसाद पॉलीटेक्निक जौनपुर से डिप्लोमा हुआ। दादी की मृत्यु 2008 में होने के बाक़ी ख़र्च को देख पिता हॉस्टल में रखने में असमर्थ थे तो इंजीनियरिंग की शिक्षा भीषण गर्मी और सर्दी के दिनों में रोज़ाना पॉकेट मनी और किराए के रूप में आठ सौ रुपए से अस्सी किलोमीटर की दूरी तय करते हुई। 2013 से विभिन्न पदों पर वाराणसी, रेवाड़ी, गुलबर्गा कर्नाटक, विजयवाड़ा आंध्रा प्रदेश, चंद्रपुर महाराष्ट्र के बाद वर्तमान में मैहर सतना में सीमेंट कम्पनी में कार्यरत हूँ।

जीवन का ध्येय: जीविकापार्जन के साथ साहित्य और समाज सेवा में भी योगदान देते हुए जियो और जीने दो के मूल मंत्र के साथ जीवन जीना।

 

मेरा परिचय

वैशाख शुक्ल पक्ष चतुर्दशी,
दिवस  कैलेंडर  शुक्रवार।
मध्यरात्रि में हुआ अवतरित,
हर्षित  हुआ पूरा परिवार॥
 
सवा मन लडडू की मन्नत,
तात गजानन को चढ़वाए।
गंगा मैया आऊँगी पुत्र संग,
वचन माँ भामा ने निभाए॥
 
भाई  बहनों का  मैं  प्यारा,
ख़ुशी भरा परिवार हमारा।
सब में स्नेह है, सब में प्यार,
बहती सबमें प्यार की धार॥
 
हम में अनमोल मधुर रिश्ते,
छोटे बड़ों को करें नमस्ते।
साथ में रहके करते मस्ती।
हम सब बड़े प्यार से रहते॥
 
पापा हैं परिवार के मुखिया,
बड़ी  बहन  का नाम प्रिया।
प्रियंका आकाश संग मेरी,
है हरदासीपुर में कुटिया॥
 
पुष्कर तटपर सदन हमारा,
नाम उसका रामेश्वर धाम।
मम्मी मेरी सिया माँ जैसी,
ऐसा हैं प्यारा कुटुम्ब ग्राम॥
 
दादी को था अति प्रिय,
उनका मैं लाडला बेटा।
पापा के नेतागिरि पर,
क़स्बे वाले कहते मुझे नेता॥
 
बड़ी बुआ से प्यारा नाता,
सब बातें मैं उन्हें बताता।
करके मुझको शिक्षा दान,
बनी वो मेरी भाग्य विधाता॥
 
काशी में ननिहाल हमारा,
नाना-नानी का राजदुलारा।
शिक्षण हेतु सुविधा देकर
विषम दशा में बने सहारा॥
 
इष्ट मित्र संग कुछ परिचित,    
यहाँ तक आने में मदद किये।
करूँ मैं सभी का वंदन।
जो शिक्षा अरु रोटी प्रबंध किये॥
 
मड़ैया व शिशु मंदिर बाद,
कर्रा बना विद्या का आलय।
प्रसाद से डिप्लोमा करके,
सीमेंट फैक्ट्री में मेरा कार्यालय॥
 
पेशे से अभियन्ता हूँ मैं, 
सीमेंट कम्पनी में करता काम।
जौनपुर ज़िला डोभी में 
हरदासीपुर है मेरा ग्राम॥
 
शौक़ है पढ़ने लिखने का
कविताएँ भी लिखता हूँ।
कुछ कहानियाँ लेख लिखे,
छंदबद्ध अब सीखता हूँ॥
 
कवि नहीं इक साधक हूँ,
साहित्य साधना करता हूँ।
माँ शारदा की रहे कृपा,
उनकी आराधना करता हूँ॥
 
श्रेष्ठजनों का मिले प्रसाद,
समाज सेवा में ध्यान रहे। 
ऐसी कृपा  करो  भगवन,
जग  में  अपना  मान रहे॥