वंचित रह जाती है जो लड़कियाँ, 
ममत्व के छाँव से;
वो अक्सर उम्र से, पहले बड़ी हो जाती हैं
बहता है उनके आँचल में, 
ममता का निर्मल सरोवर; वो लड़कियाँ, 
हर किसी पर प्रेम-दुलार लुटाती हैं।


देखती हैं जब किसी माँ को,
अपनी बेटी को सँभालते;
तब वो अपने नयनों से, 
अश्रु धार बहाती हैं।
अपनी बेटी को दुनियाँ की हर ख़ुशी दूँगी,
उस क्षण ये वादा ख़ुद से कर जाती हैं।


नहीं मिलता जिन्हें माँ का कोमल स्पर्श,
वो हर किसी के घाव पर, मरहम लगाती हैं।
आँखों में देख कर, हर ग़म पहचान लेना;
ये हुनर भी वो बचपन में ही सीख जाती हैं।


माहवारी की पीड़ा का दर्द भी,
कहाँ भला वो किसी से कह पाती हैं।
हर सवाल के जवाब वो ख़ुद ढूँढ़ती,
तब ये लड़कियाँ ख़ुद की माँ बन जाती हैं।


जब भी कोई पीड़ा हृदय को सताती ,
तब माँ की साड़ी में लिपट जाती हैं।
नहीं होते वो हाथ आँसू पोंछने वाले,
तब ये ख़ुद को सँभालना भी सीख जाती हैं।


फ़रमाइशें करने का सुख इन्हें कहाँ मिलता,
ये हाथ जला कर, ख़ुद खाना बनाना सीख जाती हैं।
जिस उम्र में हम खिलौने से खेला करते हैं,
उस उम्र में ये असली घर चलाना सीख जाती हैं।


अँधेरे में अपनी ज़िंदगी जी कर,
ये प्रेम के दीप जलाना सीख जाती हैं।
ये बिन माँ की बेटियाँ भी देखो,
कितनी जल्दी 'सयानी' बन जाती हैं।

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