नालंदा की सुनो कहानी

01-05-2026

नालंदा की सुनो कहानी

प्रभुदयाल श्रीवास्तव (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

पात्र: तीन बच्चे आयु-१३-१४ वर्ष 

 

(मंच का पर्दा धीरे-धीरे खुल रहा है तभी मंच के पीछे से मद्धम लेकिन ओजपूर्ण स्वर में आवाज़ आ रही है)

 

नालंदा की सुनो कहानी, नालंदा की वाणी में। 
अद्भुत गूढ़ रहस्य छुपा है, इसकी कथा कहानी में। 
विस्मित कर देने वाला है, सच में ही मेरा इतिहास। 
सुन लो बिल्कुल सत्य बात है, नहीं हास न ये परिहास . . .

 

 पर्दा पूरा खुल जाता है (मंच पर पीछे स्क्रीन पर नालंदा के खंडहरों के दृश्य दिख रहे हैं)

 

 (एक बालक और एक बालिका भारतीय वेश भूषा में, बालक कुरता और पायजामे में और बालिका साड़ी में दिखाई पड़ते हैं)

बालक:

अरे ये कैसी आवाज़ है, किसकी आवाज़ है, कितनी मीठी और मधुर है यह आवाज़। कौन है यहाँ कृपा करके सामने आयें महाशय। 

बालिका:

पर भैया यहाँ! यहाँ तो कोई नहीं है। 

बालक:

लेकिन-लेकिन यह आवाज़, आवाज़ तो है न। 

 

तभी (परदे की बग़ल से भिक्षु वेश में एक बालक प्रवेश करते हुए)

 

भिक्षु:

हाँ-हाँ यह आवाज़ मेरी ही थी। मैं नालंदा हूँ, नालंदा, मुझे नहीं जानते आप? आपका अतीत आपका गौरव आपका इतिहास, सब कुछ भूल गये क्या! 

बालक, बालिका (एक साथ):

अरे नहीं नहीं, हम अपना इतिहास कैसे भूल सकते हैं, सुना है पढ़ा है लेकिन बात पुरानी है न इसलिए थोड़ा विस्मृत हो गया है। अच्छा है आप ने स्मरण करा दिया। आपको सादर प्रणाम। (दोनों प्रणाम करते हैं)

नालंदा:

प्रसन्न रहो, देश के के दीपक बनो और देश दुनिया को आलोकित करो। 

बालक:

आदरणीय आप नालंदा हैं, प्राचीन और नामचीन विश्वविद्यालय, शिक्षा और ज्ञान का केंद्र, युद्ध कला, नीति शास्त्र, विज्ञान और ज्योतिष की शिक्षा देने वाला गुरु कुल हैं आप। ठीक कह रहा हूँ न मैं? हमें अपने बारे में कुछ अधिक बताएँगे तो हम आपके आभारी होंगे। 

नालंदा:

हाँ बच्चो बिलकुल ठीक कह रहे हैं आप लोग। मैं नालंदा ही हूँ अपना इतिहास अपनी भव्यता और अपनी शान-ओ-शौकत, सब अपने हृदय में समेटे हूँ, अपने अतीत को स्मरण कर प्रसन्न होता रहता हूँ, सब याद है मुझे हा-हा-हा-हा (हँसता है)।

बालिका:

अब पहेलियाँ मत बुझाओ नालंदा। अपने बारे में विस्तार से कहो। आपका जन्म आपकी जीवनी, इतने अद्भुत थे तो अचानक कहाँ विलीन हो गये, सब बताओ नालंदा, बिल्कुल सच। 

नालंदा:

हाँ-हाँ क्यों नहीं, क्यों नहीं, सब कुछ बताता हूँ आप को . . .

मैं नालंदा मैं नालंदा, मैं था सूरज मैं था चंदा। 
बोला करती तूती जग में, मैं हिमगिरी था मैं था गंगा। 

बालक:

लो अब आप तो गाने लगे, ज़रा ढंग से बताओ तो समझ में आये। 

नालंदा:

अच्छा तो सुनो, बात उन दिनों की है जब पाँचवीं सदी के भारत में मगध में, सम्राट कुमार गुप्त का शासन था। देश में बौद्ध धर्म चरम पर था। उसी समय मेरा निर्माण किया गया। जिसमें बौद्ध अध्ययन की सारी व्यवस्थाएँ और सुविधाएँ थी। तीन सौ कमरों वाला विशाल परिसर था मेरा जिसमें सात बड़े हाल और नौ मंज़िल का विशाल पुस्तकालय था। 

बालिका (आश्चर्य से):

इतना विशाल, इतना बड़ा परिसर! कैसे हो सकता है? 

नालंदा:

हाँ-हाँ इतना ही बड़ा था ये परिसर, जिसमें, जिसमें दो हज़ार शिक्षक थे और दस हज़ार विद्यार्थी। भिक्षुक विद्वान, ज्ञानपिपासु यहाँ ज्ञान प्राप्ति की आशा में देश विदेशों से आते थे। 

बालक:

विदेशों से! कहाँ-कहाँ से आते थे? 

नालंदा:

कोरिया जापान, चीन, इंडोनेशिया, तिब्बत, ईरान, ग्रीस . . .

बालिका:

अरे बस भी करो, क्यों कपोल-कल्पित बातें करते हो। इतनी दूर से भला क्यों यहाँ पढ़ने आयेगा कोई? 

नालंदा:

क्यों आयेगा हा-हा-हा-हा (ज़ोर से हँसता है) अरे यह तो भारत वर्ष की साख थी भारत का ज्ञान था और प्रसिद्धि थी जिसकी दुनिया दीवानी थी। 

बालक:

ऐसा क्या था यहाँ जो दूर-देशों से लोग यहाँ आते थे? 

नालंदा:

यह पूछो कि क्या नहीं था सोने की चिड़िया कहलाने वाले इस देश में! सब कुछ था जो एक सुंदर सुसंस्कारित और सुव्यवस्थित देश के पास होना चाहिए। 

ज्ञान ध्यान का केंद्र बड़ा यह, सारे जग को पाठ पढ़ाया। 
सत्य अहिंसा करुणा ममता, से सबको परिचित करवाया। 
नहीं किसी से डरे दबे हम, ऊँचा रखा सदा ही झंडा। 
मैं नालंदा मैं नालंदा . . .

बालिका:

अरे भाई नालंदा जी आप तो फिर गाने लगे। अब अधिक प्रतीक्षा न करवाएँ और स्पष्ट बताएँ कि ऐसी क्या विशेषता थी आपमें, क्यों लोग आकर्षित होते थे हमारे देश की तरफ़ और आपकी तरफ़। क्या पढ़ाया जाता था, विद्यार्थी कहाँ रहते थे? शिक्षकों के निवास की क्या व्यवस्था थी कहाँ से पढ़ाने आते थे? कहाँ सोते थे? 

नालंदा:

अरे भाई बताता हूँ, थोड़ी श्वास तो लेने दो। (गहरी श्वास लेता है) . . . बहुत बड़ा परिसर था मेरा। सभी विद्यार्थी मेरे परिसर में निर्मित कमरों में रहते थे। बहुत कड़ा अनुशासन होता था। प्रवेश योग्यता के आधार पर ही होता था। 

बालक:

क्या पढ़ाई होती थी वहाँ, क्या विज्ञान कथाएँ, पंचतंत्र, सरित्सागर, हितोपदेश, महाभारत, रामायण, जातक कथाएँ भी वहाँ पढ़ाते थे? 

नालंदा:

ज्ञान का भंडार था हमारे यहाँ, बड़े-बड़े विद्वान् और महान शिक्षक थे शिक्षा देने के लिए। शीलभद्र, धरमपाल, चंद्रपाल, गुनमति, स्थिरमति जैसे उद्भट विद्वान्न थे, सभी अपने-अपने विषय विशेषज्ञ। 

बालिका:

आश्चर्य, हमारे देश में इतना बड़ा विश्वविद्यालय और वह भी इतना प्राचीन! क्या विश्व विद्यालय में, कुलपति, कुलाधिपति होते थे? प्रशासन की क्या व्यवस्था थी, धन की आपूर्ति कैसे होती थी? 

नालंदा:

लो अब इतनी सी बात नहीं समझते। राजाओं और योग्य गुरुओं के रहते भला अर्थ की व्यवस्था करना कैसे कठिन हो सकता था। पहले तो गुप्त साम्राज्य के संरक्षण में सम्पूर्ण व्यवस्था होती थी, बाद में कन्नौज के राजा हर्षवर्धन ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और मुझे अपने उत्कर्ष तक पहुँचाया। यहाँ महायान बौध धर्म का शिक्षा का केंद्र था लेकिन हीनयान के छात्र भी यहाँ पढ़ाई करते थे . . . विशाल लायब्रेरी थी। रत्नोधि, रत्न सागर, रत्न रंजक इत्यादि इनके नाम थे। कुमार गुप्त के समय आचार्य सारदित्य यहाँ के प्रमुख थे। 

बालक:

लेकिन यह तो बताओ आपका निवास स्थान कहाँ है, मतलब आप कहाँ स्थित थे नालन्दाजी? 

नालंदा:

थे, आश्चर्य है, मैं अभी भी हूँ, भले ही भग्नावस्था में हूँ। मेरे अवशेष, मेरा अतीत, मेरी भव्यता, मेरी दिव्यता गवाही देने को अभी भी तत्पर है। पटना से पचासी किलोमीटर दूर दक्षिण पूर्व में राजगीर से साढ़े ग्यारह किलोमीटर उत्तर के एक गाँव में हूँ। मुझे अलेक्सेंडर कनिघम ने खोजा था। 

बालिका:

खोजा था! क्या कह रहे हैं आप, क्या आप खो गए थे कहीं? 

नालंदा:

खोया तो नहीं था लेकिन विदेशी आक्रान्ताओं के हमलों, तलवार के ज़ोर पर धर्म परिवर्तन का भय, भाग दौड़ की आपाधापी और अपनी जानमाल की रक्षा में रत लोगों का मेरी तरफ़ ध्यान ही नहीं रहा। वह तो एक भयंकर दौर था स्मरण आता है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। धर्मान्ध नबाबों, सूबेदारों के अत्याचारों से त्रस्त जनमानस किसी भी तरह भागता रहा। अपनी विरासत को सँभालना भी असम्भव हो गया। वह तो अँग्रेज़ शासकों ने खोज बीन की तब जाकर मेरा पता लगा। 

बालक:

आपका इतिहास भी तो कहीं लिखा होगा, किसी किताब में शिलालेख में? 

नालन्दा:

हाँ-हाँ क्यों नहीं। . . .

देश विदेशों से आ आकर शिष्य यहाँ शिक्षा लेते थे। 
ज्ञान अलौकिक जो मिलता था, जन-जन में वितरित करते थे
रहे बहाते मुक्त हस्त से, सदियों सदी ज्ञान की गंगा
मैं नालंदा . . .

भारतीय तो अपना इतिहास ठीक से सँजोकर नहीं रख सके लेकिन चीनी यात्री ह्वेनसांग/इत्सिंग ने अपनी भारत यात्रा के विवरण में मेरी विस्तृत जानकारी दी है। ह्वेनसांग ने तो मेरे परिसर में रहकर शिक्षा गृहण की थी। बाद शिक्षक बनकर अध्यापन भी किया। बौद्ध सारिपुत्र का जन्म भी यहीं पर हुआ था। 

बालिका:

आप तो बहुत अच्छा गाते हैं नालंदा, ख़ैर आप यह बताओ, आपका परिसर कितना बड़ा था, बनावट कैसी थी? 

नालंदा:

मेरा परिसर स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना था। विशाल दीवार से घिरा था सारा परिसर। एक बड़ा प्रवेश द्वार था। उत्तर से दक्षिण तक मठों की क़तार थी। सामने स्तूप मंदिर थे और मंदिरों में बुद्ध भगवान की मूर्तियाँ थीं। सात बड़े कक्षों में व्याख्यान होते थे। कमरों में सोने के लिए पत्थर की चौकियाँ थीं। पुस्तकें रखने के लिए आले थे। दीपकों को रखने के लिए भी अलग जगह थी। प्रत्येक मठ के आँगन में कुआँ था। पानी की सुदृढ़ व्यवस्था थी आठ विशाल बड़े भवन थे। 

बालक:

लेकिन नालंदा इतना बड़ा विश्वविद्यालय इतने सारे विद्यार्थी, शिक्षक इनका प्रबंधन कैसे होता था? कार्य को सुचारु रूप से चलाने की क्या व्यवस्था थी? 

नालंदा:

यहाँ पर प्रत्येक कार्य पूर्ण व्यवस्थित ढंग से होता था, निष्पक्ष और बिना किसी भेद-भाव के। यहाँ पढ़ने वाले भिक्षु ही कुलपति और प्रमुख आचार्यों का चुनाव करते थे। कुलपति दो चुनाव परामर्श दात्री समितियों से परामर्श लेकर प्रशासन के कार्य संपन्न कराते थे। एक समिति के ऊपर शिक्षा पाठ्यक्रम का दायित्य था तो दूसरी समिति आर्थिक/वित्तीय और प्रशासनिक कार्य देखती थी। इसके अतिरिक्त हमें दौ सौ गाँव उपहार में प्राप्त हुए थे। उनमें उपलब्ध खेतों में उगाई जाने वाली फ़सल की आय से विश्वविद्यालय के आर्थिक प्रबंध होते थे। 

बालक:

वाह! भाई नालंदा जी, आश्चर्य किन्तु सत्य भी। इतना नामचीन, अद्भुत शिक्षा का केंद्र कैसे विलुप्त हो गया, इतिहास की गर्त में समा गया यह सच में ही समझ से परे है। 

नालंदा:

यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि धर्मों, नस्लों और पंथों के संघर्ष ने बड़े-बड़े ज्ञान ध्यान के केन्द्रों और आस्था और उपासना स्थलों को मिट्टी में मिलाकर नेस्तानाबूद कर दिया। नालंदा भी उसी का शिकार हुआ। 

बालक:

कैसे नालंदा, कैसे, कैसे हुआ यह सब इतना घोर अत्याचार? देश के महान शासक कहाँ थे? कहाँ थे देश के वीर सेनानी, कहाँ थी देश भक्त प्रजा? राम और कृष्ण के देश की यह दुर्दशा! 

नालंदा:

शासक भी थे और देश के वीर सेनानी और देशभक्त प्रजा भी यहीं थी लेकिन निजी स्वार्थ, सत्ता के टकराव और आपस की वैमनस्यता ने देश को तोड़कर रख दिया। सत्ता की हवस अपने राज्य का विस्तार और धन की लालसा ने राजाओं, जागीरदारों को अंधा कर दिया। विदेशी आक्रान्ता देश पर हमले करते रहे और हमारी आपसी फूट का लाभ उठाकर हमें, हमारी संस्कृति, हमारे बल को नष्ट करते रहे। 

बालिका:

लेकिन नालंदा जी आपको मतलब—नालंदा विश्वविद्यालय को किसने नष्ट किया? 

नालंदा:

और कौन करेगा, विदेशी आक्रान्ताओं के अतिरिक्त? वैसे तो मेरे उदय के साथ ही शत्रुओं की दृष्टि हम पर पड़ चुकी थी। छोटे-मोटे हमले होते रहे लेकिन हम अपना अस्तित्व बचाए रहे। किन्तु बारहवीं सदी में बख्तियार खिलजी नामक एक तुर्क सेनापति ने विश्वविद्यालय को आग के हवाले कर दिया। 

बालिका:

उफ़! लेकिन क्यों, क्यों किया उसने ऐसा, क्या गुनाह किया था विश्वविद्यालय ने? 

नालंदा:

गुनाह, गुनाह बस यही था कि बौद्ध शिक्षा का यह विशाल अद्भुत और अनोखा केंद्र मानवता के लिए समर्पित था। एक धर्म विशेष (इस्लाम) के अनुयायी यह नहीं चाहते थे। कोई भी शिक्षा का केंद्र उनके धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म की शिक्षा दे, यह उन्हें स्वीकार नहीं था। इसलिए इसे आग के हवाले कर नष्ट कर दिया और हज़ारों बौद्ध भिक्षुओं को मार डाला। 

बालक:

घोर अन्याय हुआ है हमारे संस्थानों पर, कितना अपमान कितनी हिंसा, अब क्या बचा है वहाँ अवशेष, खंडहर, मिट्टी पत्थरों के ढेर, यादें सिर्फ़ यादें। 

नालंदा:

नहीं बच्चो नहीं, नालंदा आज भी ज़िन्दा है। सरकारी प्रयासों से इसे पुनर्जीवित किया गया है। पुराने खंडहरों से कुछ दूरी पर नये निर्माण किये गए हैं। जिसमें पर्याप्त मात्रा में भवनों की व्यवस्था की गई है ताकि अधिक से अधिक संख्या में शिक्षक और छात्र बैठ सकें। 

बालिका:

नालंदा जी अभी वहाँ किस तरह की पढ़ाई हो रही है? क्या पुराने विषय पढ़ाये जा रहे है? 

नालंदा:

हाँ चूँकि विश्व विद्यालय प्राचीन का ही नया रूप है इसलिए प्राचीन विषय तो शामिल करने ही होंगे। लेकिन उतनी ही सीमा तक जितने हमें आज के सन्दर्भ में आवश्यक होंगे। ऐतिहासिक, पारिस्थितिक, पर्यावरण, बौद्ध दर्शन, धर्म, भाषा साहित्य, मानविकी, प्रबंधन, अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध—ये विषय विभिन्न क्षेत्रों में शामिल किये गए हैं। चीन, थाईलेंड, ऑस्ट्रेलिया, लाओस जैसे देशों का सहयोग भी इस कार्य में किया गया है। 

बालक और बालिका:

वाह, वाह मज़ा आ गया कहानी सुनने में (दोनों गाते हैं):

नालंदा अब भी जीवित है बसा हुआ है यादों में। 
हैं सुगंध अब भी कुछ बाक़ी, दृश्य झूमता आँखों में। 
जब तक चंदा तारे नभ में जब तक है धरती आकाश। 
नहीं मिटेगा नालंदा का दिव्य भव्य और अमर प्रकाश। 
अब तो नालंदा के नभ में लहराता है रोज़ तिरंगा।

नालंदा ( पास में आकर):

 मैं नालंदा मैं नालंदा, मैं हूँ सूरज मैं हूँ चंदा . . .

 

(फिर तीनों बच्चे थोड़ा आगे आकर आपस में हाथ मिलाकर ऊपर करते हैं और गाते हैं) 

 

हम नालंदा हम नालंदा, हम ही हिम गिरी हम हैं गंगा
हम हैं सूरज हम हैं चंदा, साँस-साँस में है नालंदा। 
हमें देश आगे ले जाना, चलना मिला-मिलाकर कन्धा। 
हम नालंदा हम . . .

 

(धीरे-धीरे पर्दा बंद हो रहा है)

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