छोटे प्राणी बड़े काम के
प्रभुदयाल श्रीवास्तव
गई एक दिन चुनमुन चींटी,
नदी किनारे पानी पीने।
फिसला पैर गिरी पानी में,
डर से छूटे उसे पसीने।
नदी किनारे वहीं पेड़ पर,
एक कबूतर ने जब देखा।
जान बचे चींटी की कैसे?
एक तोड़कर पत्ता फेंका।
चींटी ने जब पत्ता देखा,
उस पर चढ़कर जान बचाई।
पत्ता जब लग गया किनारे,
चींटी ने थी राहत पाई।
आकर मिली कबूतर से वह,
बोली भैया हूँ आभारी।
अगर ज़रूरत पड़ी कभी तो,
कर दूँगी मैं मदद तुम्हारी।
हँसा कबूतर मन ही मन में,
ये नन्ही क्या मदद करेगी।
जान ज़रा सी तो है इसकी,
मेरे दुख क्या दूर करेगी।
तभी अचानक एक शिकारी,
ने गुलेल से साध निशाना।
उसी कबूतर के ऊपर ही,
एक बड़ा सा पत्थर ताना।
चींटी ने जब यह देखा तो,
उस व्याध पर ग़ुस्सा फूटा।
काट लिया उसके पैरों पर,
उसका हाय! निशाना चूका।
अब तो हुआ कबूतर भावुक,
बोला तुमने जान बचाई।
तुम हो मेरी प्यारी बहना,
मैं हूँ बहना तेरा भाई।
छोटे प्राणी बड़े काम के,
काम बड़े अक्सर कर जाते।
पता नहीं हम बड़े लोग क्यों,
इन छोटों को समझ न पाते।
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