जीवन संघर्ष
पं. विनय कुमार
जीवन में है बहुत-कुछ
जीवन—यों ही नहीं जिया जाता—
जीवन में बसता है प्रेम—
प्रेम और घृणा
हर बार जीवन तलाशता है
अपने लिए एक मुकम्मल जगह
हर जगह सुरक्षित नहीं होता,
पथिकों के लिए
हर पथ—काँटों से भरा होता है
जहाँ चलना होता है अकेले
मित्रों के साथ नहीं चला जा सकता
किसी राह पर
मित्र सदैव नहीं रह सकते
साथ रहते मित्रों से
मत पूछो
किसी रास्ते का पता—
वे सदैव अपना रास्ता बतायेंगे
जो नहीं जाएगा—दूर-बहुत दूर
तुम्हें ढूँढ़ने ही होंगे
अपने रास्ते
वे जहाँ तक चलेंगे—
एक दिन रास्ते दोस्त बन जायेंगे—
रास्तों से पार करने पर ही मिलेगा
जीवन का लक्ष्य—
हर लक्ष्य-सुख और सुकून नहीं देता।
हर रास्ता—
बार-बार उलझा सकता है हमें—
हमारी ऊर्जा ख़त्म हो जा सकती है।
हर रास्तों से चलता-थकता आदमी
नहीं लौट सकता अपने घर
उसे विश्राम की ज़रूरत होती है
विश्राम-सब जगह नहीं होता
मन का विश्राम—
राह चलते नहीं हो सकता
विचारों के प्रवाह के साथ
मन का आना-जाना—
बार-बार-वह टोकता रहता है
अकेले में
मन के लिए चाहिए
एक ख़ूबसूरत ख़ुराक
आकर्षक, और मज़ेदार।
लेकिन इसे स्वार्थ चाहिए—अपने लिए
जीने की विवशता होती है उसमें—
वह जीवन को लिए चलता है साथ-साथ
जीवन जो अपना नहीं होता—
जब तक मन घूमता रहता है
निपट निर्जन में—
अकेले, तब तक
जीवन-उलझता है
थकता है—
अपनी रौद्र गति से वह
नर्तन करता है
जीवन की समस्याओं से
थककर
वह बोर होता है
भावनाओं का ज्वार उसे अपने लिए
जीवन का नूतन सौदर्य रचता है
जीवन के फ़लसफ़े के साथ
वह रचता है जीवन का इतिहास-
जीवन के इतिवृत्त में
सांध्य-चिंतन के साथ
मानसिक ऊर्जा के साथ
दिखती चलती रहती है
अनेकशः दिशाएँ—
और दिशाओं के ज्ञात-अज्ञात चिंतन
हर बार—
मुझे सराबोर करेंगे—
हर बार वह मेरे हिस्से रच सकता है
एक अनूठा इतिहास,
प्रत्येक इतिहास के भीतर
नूतनता होती है
सृष्टि के साथ लौटता हुआ मन—
बार-बार थकता हुआ—
विश्लेषण करता है
हर एक विश्लेषण—
जीवन के सौदर्य को
परखता है—
हर बार जीवन—
उलझता-थकता-चलता है निरंतर
मन के भीतर का एक और मन
भीतर—
सजीवता की पुष्टि करता है
और वह अपने लिए खोजता है
एक गन्तव्य-पथ—
केवल अपने लिए!
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