आदि और अन्त
पं. विनय कुमार
सुबह-सुबह
हर एक व्यक्ति
घूरता है
एक दूसरे को
करने के लिए पराजित
और आगे निकल
ख़ुद अपना आसमाँ छूने की
ग़रज़ से!
हर एक व्यक्ति के
भीतर तड़प पैदा
होती रहती है
सब अपने लिए जीना चाहते हैं—
सूरज भी
चाँद भी
हवा भी
धरती भी
और
आग भी—
लेकिन हर एक
का श्रम
काम आता रहता है
एक-दूसरे तक को
और
जीवन इसी तरह से
बनता रहता है हर रोज़
हरेक जड़-चेतन तक का!
एक छोटा बीज भी
फूटने के लिए जगह की माँग
करता है।
वह भी अपने लिए
संघर्ष करता है।
फ़र्क़—
केवल दिखने-महसूस
करने का ही है।
जन्म से लेकर
संघर्ष चलता रहता है।
मरने के बाद
पंचतत्व में विलीन होते जाने का
धुआँ भी अपने लिए
स्पेस चाहता है।
सुबह से शाम तक
यह संघर्ष
चलता रहता है
निरंतर
अथक
और बेवजह!
हम आगे बढ़कर
कहाँ पहुँच पाते हैं।
धरती पर जन्म
लेकर धरती में ही
समा जाने का
सफ़र आज भी
जारी है।
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