सहयोगी बना पाओगे
दीपमाला
बराबरी नहीं करनी मुझे तुमसे
ना ही कोई हक़ चाहिए।
मुझे दे सको तो बस इक मान चाहिए
तुमसे इक सहयोगी का सम्मान चाहिए।
क्या बना पाओगे सहयोगी मुझे अपनी?
और क्या मान भी पाओगे?
सहयोगी मुझे सुख-दुख की
सहयोगी तुम्हारे हर पल-छिन की
क्या बना पाओगे सहयोगी अपने अंतर्मन की
सहयोगी जीवन और मरण की
सहयोगी अपने हर दिन की।
सिर्फ़ कहने भर के लिए
सहयोगी नहीं होती स्त्री
अपनाना पड़ता है उसे पूरे मन से
सँवारना होता है पूरे जतन से।
तभी बन पाती है वो सहयोगी
जीवन के संपूर्ण सफ़र में
कुटुंब, समाज और घर में।
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- कविता
-
- अनोखी भाषा
- अपने लिए भी वक़्त निकालो
- आँगन की गौरैया
- उस घर में ही होंगी ख़ुशियाँ
- उस दिन नई सुबह होगी
- एक स्त्री की मर्यादा
- काश होता इक कोपभवन
- क्यूँ ना थोड़ा अलग बना जाए
- चिट्ठियाँ
- जब माँ काम पर जाती है
- दीप तुम यूँ ही जलते जाना
- नीम का वो पेड़
- बेटे भी बेटियों से कम नहीं होते
- माँ नहीं बदली
- माँ मैं तुमसी लगने लगी
- मेरी अभिलाषा
- मज़दूर की परिभाषा
- ये आँखें तरसती हैं
- ये जीवन के एहसास
- रामायण
- वो नारी है
- संस्कारों की जकड़न
- सपने
- सर्दियों की धूप
- सहयोगी बना पाओगे
- स्त्री का ख़ालीपन
- हमारा गौरव
- ग़लतियाँ
- ज़िन्दगी की दास्तान
- ललित निबन्ध
- चिन्तन
- कहानी
- विडियो
-
- ऑडियो
-