सतीत्व बनाम स्त्रीत्व

01-09-2020

सतीत्व बनाम स्त्रीत्व

अनीता श्रीवास्तव

“ हैलो!” उधर से एक अपरिचित स्वर था। कंचन के एक हाथ में आटा लगा था। दूसरा हाथ मोबाइल सहित कान पर लगाए वह किचिन से बाहर आ गई। 

“क्या हो रहा है जानेमन?” सुन कर कंचन के हाथ-पाँव फूल गए। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। ऐसे मौक़ों पर अक़्सर कुछ सूझता नहीं। उसे भी नहीं सूझा। अकबका कर उसने फोन काट दिया। 

जा....ने....म……न। कुछ अलग सा लगा। जैसे किसीने लिहाफ़ के धागे तोड़ एक ही वार से रुई का रेशा-रेशा हवा में उड़ा दिया हो। एक-एक रेशा, एक-एक शब्द। वह शब्दों का साथ गहरे दूर तक निकल आई। दूर, जहाँ ख़ूबसूरत वादियाँ थीं और नशीली हवा चल रही थी। ऊँचे और मोटे तने वाले दरख़्त भी थे जिनके पीछे छुपा जा सकता था। दूर क्षितिज पर धरती-आकाश का आभासी मिलन देख यथार्थ में रोमांचित हुआ जा सकता था। उसी रोमांच को भरकर बहके हुए पंछी उस ओर चले जा रहे थे…धरती पर दो जोड़ी पैरों के निशान थे..जो जानबूझकर न तो एक-दूसरे से आगे निकलते थे न ही पीछे छूटने को तैयार थे।

छूटने को तो वक़्त भी तैयार नहीं था। थम जाना चाहता था। बूँद बराबर समय में नदी बराबर उम्र बिताना चाहता था। पलों की ताक़त के सामने उम्र असहाय लगने लगी थी। उसने अपने बालों में लगी पिन निकाल दी और बाल बिखेर कर पंखे के नीचे बैठ गई। ये ख़ुद की उँगलियाँ थीं जिन्हें वह बालों में नरमी से फिराए जा रही थी। उसने आँखें बंद कर लीं। दो जोड़ी पैर अभी भी साथ-साथ चल रहे थे। अगले ही पल वह कुछ गुनगुना रही थी... कोई मीठा गीत जो उसकी आत्मा का गान था। ... जो नश्वर देह पर उम्र के प्रभाव से अछूता जान पड़ता था... उसने ख़ुद को इस तरह उड़ेल दिया था कि उसका स्वर ही उसका वजूद बन गया था। उसने हाथ से अपने कपोलों को सहलाया और बालों की लट, जो आधी सफेद हो चली थी, उसे कान के पीछे धकिया दिया।

जब वह कॉलेज में थी इसी तरह के सपने देखा करती थी।

“कुमुद मेरा मन पढ़ने में नहीं लगता।“

उसने अपनी हितैषी और जानकार समझ कर कुमुदनी से कहा था। कुमुदनी ने इस बात को ले कर उसकी इतनी खिंचाई की कि उस दिन से बेचारी अपना हाले-दिल सात तालों में बंद रखने लगी। उसके घर के सामने, सड़क के उस पार, कम्पनी बाग़ था। वह अक़्सर सोचा करती एक दिन वहाँ किसी के साथ जाएगी, जो उससे अच्छी लगने वाली बातें करेगा। उसकी बड़ी-बड़ी गहरी आँखों की किसी झील से तुलना न भी करे तो भी साधारण शब्दों में तारीफ़ तो कर ही देगा। उससे उसकी ‘हॉबी’ पूछेगा या शायद गाना सुनने को कहेगा। वह उससे आइसक्रीम या चाट खाने को कह सकता है। कंजूस होगा तो फूल भी दे सकता है। वहीं लगे हैं। इतना सब होने के बाद जब वह आने लगेगी, कल फिर आने का वादा बिल्कुल नहीं करेगी। वह बेवकूफ़ थोड़ी है! वह उसे मम्मी से मिलवाने की ज़िद करेगी। उसे लड़के के लिखे लंबे शायरी वाले प्रेम-पत्रों का इंतज़ार रहेगा। इन पत्रों की भाषाई ग़लतियों पर वह कभी ध्यान नहीं देगी। वह केवल भावनाओं को समझेगी। 

फिर...एक दिन... वही हुआ जो सदैव होता आ आया है। भावनाओं के नाज़ुक परिंदे कल्पनाओं के पंख लगा कर गगन में उड़ते तो हैं मगर एक ही झटके में संसार उन्हें निर्ममतापूर्वक यथार्थ के धरातल पर ला पटकता है। संसार भावनाओं पर नहीं चलता। उसका विवाह रविकिशन से होना तय हुआ। इससे पहले देखने-दिखाने की रस्म अदायगी हुई। उस घर के छोटे से ड्रॉइंगरूम के पर्दे बदल दिए गए। माँ ने ललिता चाची के घर से टेबल-क्लॉथ मँगाया था जिसे उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों में होमसाइंस के प्रेक्टिकल के लिए बनाया था। माँ ने ट्रंक में से स्टील के चमचमाते बर्तन भी निकाले थे जिनमें मेहमानों को परोसा-खिलाया जाना था। कंचन, बुआ की साड़ी पहन कर रविकिशन और अपने भावी ससुराल वालों के सामने नमूदार हुई। कुछ औपचारिक बातों के बाद दोनों को अकेला छोड़ दिया गया। रविकिशन ने कुछ बात छेड़ी... बल्कि प्रश्न किए। कंचन ने प्रश्नों के उत्तर दिए। प्रश्न उत्तर का सत्र अच्छा चल रहा था। हद तो तब हो गई जब उससे कंचन शब्द का अर्थ पूछा गया। बातें और भी हुईं मगर उनमें से कोई भी बात उस बात जैसी नहीं थी जो कम्पनीबाग़ वाले ख़्याल में हुई थी।

रविकिशन, सचमुच एक अच्छा लड़का था। ‘न’ करने की कोई वज़ह ही नहीं थी। सुबह माँ ने पूछा,”लड़का कैसा लगा?” 

कंचन चुप रही। उसे पता था दरवाज़े के उस तरफ़ पापा खड़े है... और उसकी चुप्पी को ‘हाँ’ समझ लिया गया। माँ ने उसे हर्षातिरेक में गले लगा लिया था। कंचन को समझ नहीं आ रहा था उसे ख़ुश होना चाहिए था या नहीं। लेकिन माँ ख़ुश थीं। पहले ही प्रयास में बेटी का रिश्ता तय हो गया था। उम्र भी अधिक नहीं हो पाई थी। सब समय पर हो रहा है। माँ ने गहरी साँस ली।

पापा के ऑफ़िस जाने का समय हो गया था। माँ रसोई से, हाथ में पापा का टिफ़िन ले कर आ रहीं थीं। कंचन को देखा तो उसे ही पकड़ा दिया। कंचन ने, यंत्रवत, टिफ़िन ला कर पापा के हाथ में पकड़ा दिया। कोई और दिन होता तो वह पहले टिफ़िन खोल कर देखती, सब्ज़ी क्या बनी है? या शायद पूछ ही लेती। लेकिन आज उसने ऐसा नहीं किया। मन नहीं था। बिना टिफ़िन खोले और माँ से कुछ पूछे ही जैसे उसे सब पता था। उसे पता था कि टिफ़िन के सभी खंडों में वही भर होगा जो रोज़ भर जाता है... जो हमेशा खाया जाता है… जिसका हमेशा से चलन रहा है... कुछ भी नया सम्भव नहीं।

उसका घर-संसार रविकिशन के साथ अच्छा चल रहा था। कर्ण-पीयूष स्कूल जाने लगे तो उसे थोड़ा समय मिलने लगा। रविकिशन वक़्त के पाबंद हैं। समय पर ऑफ़िस जाना। समय पर घर आना। सोना, जागना, खाना-पीना, सब समय पर। समय पर सारे काम करने के बाद भी तो समय नहीं मिलता। आप समय का लाख मान रखिये। समय नहीं पसीजेगा। छन्नी में बची चाय-पत्ती से चाय की तरह बूँद-बूँद रिसता ही चला जाता है। समय ने कभी किसी का लिहाज़ नहीं किया। कंचन का भी नहीं। पता ही नहीं चला कब चौदह साल हो गए, उसके और रविकिशन के साथ को। अब तक वह कम्पनीबाग़ वाले ख़्याल से ख़ुद को मुक्त हुआ समझने लगी थी क्योंकि न तो उस ख़्याल को उसने याद किया न भुलाया ही। बहुत बार ऐसा हुआ जब किसी सन्डे की शाम रविकिशन उसे पार्क ले कर जाते, बच्चे झूला-वूला झूलते फिर सी-सा पर खेलने चले जाते। रविकिशन चहलक़दमी करते। वह भी... सिर्फ़ दिखने के लिए, हक़ीक़त में वो वहाँ से निकल कम्पनीबाग़ वाले ख्याल में चली जाती। या कम्पनीबाग़ ही चल कर उसकी आँखों में आ जाता, मगर जो कभी दिखाई नहीं दिया था, ख़्यालों वाले उस लड़के का इंतज़ार करने में उसे डर लगता। वह बड़ी कठिनाई से उसकी जगह रविकिशन को बिठा पाती। लेकिन लगातार अभ्यास के बाद ये अब उसके वश में हो गया था। 

उस दिन सोमवती अमावस्या थी। उसने तुलसी की एक सौ आठ परिक्रमा लगाईं। बीच-बीच मे वह आँख बंद करके विष्णु भगवान का ध्यान करती जाती थी। हर चक्कर पर एक चिरोंजीदाना कटोरी में रखना होता था। उन दानों में से जो पहले ही गिन कर रख लिए गए थे। कटोरी में दाना डालते समय उसकी नज़र अपने पैरों में लगे महावर और बिछिये पर पड़ गई। उसके अपने ही पायल के घुँघरू बज उठे। उसे लगा वह दुल्हन से कहाँ अलग है! कम्पनीबाग़ वाला ख़्याल उसे फिर अपनी गिरफ़्त में लेने लगा। वह उसीके पीछे-पीछे चल रही है। वह उसकी संगिनी है। ख़्याल आते ही उसने सिर का पल्लू थोड़ा और आगे खींच लिया। एक सौ आठ फेरी पूरी होते-होते न जाने कितनी बार इस ख़्याल ने उसका सतीत्व खंडित किया।

उसे, अब,अपनी पूजा छिपाने लायक़ कर्म लगने लगी थी। घर लौट कर उसने फ़ौरन कपड़े बदल लिए। गाउन पहना और ज़रूरी कामों में लग गई। कितनी मेहनत की थी सोमवती अमावस्या की पूजा में! कितनी मेहनत की थी घर को घर बनाने में! स्त्री धर्म को निभाने में उसने कब कमी रखी थी! फिर ये कम्पनीबाग़ का ख़याल, जो सिर्फ ख़याल है, उसका पीछा क्यों नहीं छोड़ता!
 

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