ये फरवरी
डॉ. पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’
प्रत्येक फरवरी
अपने संग ले आती है
फिर कोई नई अपूर्णता,
कुछ यादें
जो पूर्ववर्ती जाड़े में
धूमिल हो रह गई थीं
पड़ी थीं किसी कोने में
इस बार
वे पुनः उभरती हैं,
शायद–
इस महीने की सुबहें
कुछ मिलिंद होती हैं
कुछ-कुछ उनींदी-सी
कुछ काहिल भी
जैसे हो कोई
अतीत की तस्वीरें
जिन्हें सालों बाद
खोला गया हो
एलबमों में से
और साँझें . . .
वो तो और भी
अथाह . . .
हल्की कँपकँपी में
सिमटी हुईं
किसी इंतज़ार में
डूबी हुईं
फरवरी
ख़्वाहिशों की ऋतु है
एक आधी-अधूरी
ख़्वाहिशें
कुछ प्रेमाभिव्यक्ति लिए हुए
जो कभी कहीं कहने से
थम गई थीं
कुछ मुलाक़ातें
जो सिर्फ़ तय होने के
बाद भी न मिल पाईं
और . . . . . .
कुछ इकरार
जो समय के धुँधलके में
छूट गए . . . . . .
यह महीना रहा
उन अलगावों का
जो हिय के मध्य
किसी अदृश्य डोरियों में
खिंचता रहा हो
न तो पूरी तरह
टूट पाए
और न ही पूरी तरह
जुड़ पाए . . .
ऋतुराज की
प्रथम फुसफुसाहटों में
गुँथे हुए होते हैं
ये फरवरी के पुष्प
या तो खिलें
या कि ठिठक कर
रह गए
इसी अधूरेपन की
चाहत में
अपनी पहचान को
गढ़ती
ये फरवरी
कुछ बिखरे-अधूरे-से
सपनों
अधूरे से
अल्फ़ाज़
और
अधूरे से
आलिंगनों में
उलझी हुई
ये फरवरी . . .!!!
डॉ पल्लवी सिंह 'अनुमेहा'
लेखिका एवं कवयित्री
बैतूल, मध्यप्रदेश
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