चलो बाँट लेते हैं अपनी सदाएँ

15-04-2026

चलो बाँट लेते हैं अपनी सदाएँ

डॉ. पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’ (अंक: 295, अप्रैल द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

तुम अपनी निस्तब्धता का, 
श्वेत आवरण मुझे सौंप दो, 
मैं अपने अंतःकरण का, 
कोलाहल तुम्हें 
अर्पित कर दूँ, 
ताकि इस अदृश्य आदान-प्रदान में, 
हम दोनों अपने-अपने
भार से कुछ मुक्त हो सकें।
  
तुम्हारी दृष्टि में जो संचित है, 
अनकही रात्रियों का अथाह, 
अविराम विस्तार, 
जहाँ स्मृतियाँ धुँधली, 
चाँदनी की तरह, 
धीरे-धीरे उतरती हैं, 
और खो जाती हैं—
उसे मैं अपने स्वप्न लोक की, 
देहरी पर प्रतिष्ठित कर लूँ, 
और मेरी पलकों पर, 
जो ठहरी है, 
अधूरी नींद की थकी, 
हुई विषाद-रेखा, 
उसे तुम अपनी करुणा की
कोमल छाया में, 
निश्छल विराम दे देना। 
 
चलो, इस मन की परतों को, 
भी विभाजित कर लें—
तुम मेरे शब्दों की, 
क्लांति को स्वीकारो, 
वे शब्द जो कभी, 
पूर्ण न हो सके, 
जो हर बार होंठों तक, 
आकर लौट गए, 
और मैं तुम्हारे भावों की, 
उस गहन नीरवता को ओढ़ लूँ, 
जिसमें एक सम्पूर्ण 
जगत छिपा है, 
पर जिसे कोई सुन
नहीं पाता। 
 
तुम अपने अधूरे स्वप्नों का, 
अंश मुझे दे दो, 
मैं अपने बिखरे हुए, 
ख़्वाब तुम्हें सौंप दूँ, 
ताकि इस विनिमय में—
शायद कोई, 
आकृति बन सके, 
एक ऐसा रूप, 
जो अधूरा होते हुए भी, 
पूर्णता का, 
आभास दे सके। 
 
तुम्हारे अंदर जो वेदना है, 
वह केवल, 
तुम्हारी न रहे—
मैं उसे अपने अंतर्मन की, 
गहराइयों में उतार लूँ, 
और मेरे भीतर, 
जो अनकही पीड़ा है, 
उसे तुम अपने
धैर्य की अग्नि में, 
धीरे-धीरे गलने देना। 
 
शायद इस प्रकार, 
तुम्हारे दुःख का कुछ अंश, 
हल्का हो जाए, 
यूँ ही आधे-अधूरे क्षणों में, 
टूटे हुए लम्हों के सहारे, 
हम किसी सम्पूर्णता का, 
सूक्ष्म बोध पा लें—
एक ऐसी पूर्णता, 
जो केवल अनुभूति में, 
जन्म लेती है, 
पर कभी शब्दों में नहीं ढलती। 

चलो बाँट लें अपनी सदाएँ—
अपने एकांत, अपने शून्य, 
अपनी थकान, 
अपनी स्मृतियों की धूल, 
और समय की चुप्पियाँ, 
कदाचित, 
इस विभाजन में ही, 
हम अपने अस्तित्व का, 
कोई समग्र अर्थ खोज लें, 
और जो हम कभी, 
अकेले न समझ सके, 
उसे मिलकर समझ, 
पाने का साहस जुटा लें . . .!!

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें