मेरी व्यस्ततायें
डॉ. पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’
मेरी व्यस्तताओं की
राहों में
अवसादों के
दोनों ओर
विषादों के
बियाबान बीहड़
हैं अंतहीन।
मैं कब विच्युत हो
इनकी
निविड़ता,
निविरीसता में
गुम हो जाती हूँ।
एकाएक
मैं ख़ुद ही नहीं
जानती . . .
न कम्पित हूँ
किसी स्मृति की
आर्त्तनाद से
न किसी अवसाद
की टीस से
होती हूँ अनमयस्क,
अस्थिर
अहसास के
बुनियादों पर।
बस
थाह लेते हुए
अगम्य रास्ते . . .
पहुँच जाती हूँ
इसके अंतिम
किनारों के
पड़ाव पर
वहीं . . .
जहाँ से
व्यस्ततायें
टोहती है
मेरी ओर . . .!
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