नीला आसमान!

01-06-2026

नीला आसमान!

डॉ. पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’ (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

आज फिर दिन बीत गया, 
बिना किसी आवाज़ के, 
दीवारों ने मुझे देखा, 
घड़ी चलती रही, 
पर यह किसी ने नहीं पूछा, 
कि-
मैं कैसी हूँ?
 
मैं खिड़की के पास बैठी, 
नीले आसमान को देखती रही, 
जैसे दूर कोई अपना हो, 
जो कभी मिलने नहीं आता!
 
कितनी अजीब बात है, 
भीड़ में तो लोग मिल जाते हैं, 
पर अकेलेपन में, 
अपना ही साथ नहीं मिलता, 
मैंने हाथ बढ़ाया था कभी, 
किसी ने थामा नहीं, 
मैंने आवाज़ दी थी कई बार, 
पर कोई लौटा ही नहीं!
 
अब मैं बोलती भी नहीं, 
क्योंकि शब्दों का लौट आना, 
बहुत दुःख देता है, 
नीला आसमान, 
हर रोज़ मेरे ऊपर से गुज़रता है, 
पर मेरी देहरी पर, 
कभी नहीं उतरता!
 
शायद –
उसे भी पता है, 
कि कुछ घर इतने ख़ाली होते हैं, 
जहाँ दस्तक भी रो पड़ती है, 
आज फिर शाम हुई है, 
और
मैं यहीं हूँ–
अपने नाम के साथ, 
अपने साये के साथ, 
अपने अंतहीन अकेलेपन के साथ!! 

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