नीला आसमान!
डॉ. पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’
आज फिर दिन बीत गया,
बिना किसी आवाज़ के,
दीवारों ने मुझे देखा,
घड़ी चलती रही,
पर यह किसी ने नहीं पूछा,
कि-
मैं कैसी हूँ?
मैं खिड़की के पास बैठी,
नीले आसमान को देखती रही,
जैसे दूर कोई अपना हो,
जो कभी मिलने नहीं आता!
कितनी अजीब बात है,
भीड़ में तो लोग मिल जाते हैं,
पर अकेलेपन में,
अपना ही साथ नहीं मिलता,
मैंने हाथ बढ़ाया था कभी,
किसी ने थामा नहीं,
मैंने आवाज़ दी थी कई बार,
पर कोई लौटा ही नहीं!
अब मैं बोलती भी नहीं,
क्योंकि शब्दों का लौट आना,
बहुत दुःख देता है,
नीला आसमान,
हर रोज़ मेरे ऊपर से गुज़रता है,
पर मेरी देहरी पर,
कभी नहीं उतरता!
शायद –
उसे भी पता है,
कि कुछ घर इतने ख़ाली होते हैं,
जहाँ दस्तक भी रो पड़ती है,
आज फिर शाम हुई है,
और
मैं यहीं हूँ–
अपने नाम के साथ,
अपने साये के साथ,
अपने अंतहीन अकेलेपन के साथ!!
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- कविता
-
- अनसुलझी बातें
- अनुरागी प्रेम
- उनींदी है शाम
- उमंगों की डोर
- एक बूँद
- एक मैं
- एक ही परिप्रेक्ष्य
- ऐसे समेट लेना मुझको
- करूँगी बातें तुमसे
- क्या खोया, क्या पाया
- गुलमोहर के नीचे
- चलो बाँट लेते हैं अपनी सदाएँ
- तुम्हारा न होना
- दो अवरक्त रेखायें
- नीला आसमान!
- मेरा अस्तित्व
- मेरा विज़न—सिर्फ़ तुम
- मेरी व्यस्ततायें
- मैं लिखना चाहती हूँ
- ये फरवरी
- ये सारे सतरंगी रंग
- विश्वास का राग
- शब्द भी शून्य हो जायेंगे
- सच्चा प्रतिवाद
- चिन्तन
- विडियो
-
- ऑडियो
-