एक बच्चे की ज़ुबानी: भारत के विभाजन की आँखों देखी कहानी

01-06-2023

एक बच्चे की ज़ुबानी: भारत के विभाजन की आँखों देखी कहानी

विजय विक्रान्त (अंक: 230, जून प्रथम, 2023 में प्रकाशित)

 

बात १९४६ के आसपास की है। मैं कॉन्वेंट ऑफ़ जीसस एण्ड मैरी स्कूल अम्बाला कैण्ट में दूसरी कक्षा में पढ़ता था। घर में नया नया फिलिप्स का रेडियो आया था। शाम को, बुज़ुर्गों सहित, हम बहन-भाई अपने इस खिलौने के चारों ओर बैठ जाते थे और इसका पूरा आनन्द उठाते थे। केवल हम ही नहीं, बल्कि मुहल्ले के आसपास के घरों के बच्चे और बुज़ुर्ग भी हमारे इस आनन्द में भागीदार हो जाते थे। रेडियो पर गाने भी आते थे, ख़बरें भी आती थीं। लेकिन हम बच्चों के लिये सब से बड़ा जो अजूबा था, वो था इस डिब्बे में से निकलती हुई आवाज़। बस उसी को सुनकर हम सब बच्चे मस्त हो जाते। जहाँ तक ख़बरों के प्रसारण की बात है, वहाँ बैठे हुए बड़े-बुज़ुर्ग उनको बड़े ध्यान से सुनते थे लेकिन हम बच्चों को हिन्दु, मुसलमान, हिन्दुस्तान, पाकिस्तान इत्यादि कुछ नामों से आगे कुछ पता नहीं कि ख़बरों को लेकर क्या कहा जा रहा है। 

समय के साथ-साथ और बड़ों की आपसी बातचीत से मुझे ऐसा लगने लगा था कि कुछ बहुत बड़ा होने जा रहा है। जब बड़ों को यह कहते सुनता था कि “न जाने इस देश का और हमारा क्या भविष्य होगा” मेरी बच्चों वाली सोच “सोच” में पड़ जाती। मुझे तो अपने हमउम्र मित्रों के साथ पिठ्ठू खेलना, बॉल से खेलना और भागदौड़ करने में जो आनन्द मिलता वो रेडियो की ख़बरों से नहीं। 

अब, जब कभी भी पिताजी के साथ बाहर जाता तो शहर में जुलूस देखने को मिलते। पता नहीं यह लोग बहुत ऊँची-ऊँची आवाज़ में जो नारे लगा रहे थे वो क्या कह रहे थे? जैसे-जैसे समय बीतता गया शहर में हलचल भी बढ़ने लगी। कुछ लोगों को तो अपने घर के बाहर तीन रंग का झण्डा, जिसके बीच में चरखा था, लगाते देखा। कौतहूलवश एक बार पिताजी से पूछा तो उन्होंने बताया कि देश को अँग्रेज़ों की ग़ुलामी से आज़ादी मिलने वाली है। मेरी बाल खोपड़ी में जुलूसों के नारों में और “आज़ादी” शब्द का कोई महत्त्व नहीं था। अपनी दुनिया तो दिन में स्कूल, थोड़ा खेल-कूद और शाम को पण्डित श्री किशन से उर्दू की ट्युशन तक ही सीमित थी। 

१९४७ के आते आते तो अम्बाले का ढाँचा ही बदलना शुरू हो गया। आये दिन पुराने लोग, जिन में अधिकतर मुसलमान होते थे, अम्बाला छोड़ कर कहीं जा रहे थे और नये-नये लोग, जिन्हें पहले कभी नहीं देखा था, आसपास देखने को मिलते थे। जनाब कादिर अली साहब, जो अम्बाला के दरोगा-चुँगी थे, पिताजी के बहुत गहरे मित्रों में से एक थे। वो हमारे घर के पास ही सरकारी कोठी में रहते थे और उन्हें कबूतर पालने का बहुत शौक़ था। उनको हम बच्चे हमेशा चाचाजी कह कर बुलाते थे और वो मुझे हमेशा बेटा कहकर बुलाते थे। कभी-कभी हम बच्चे कबूतरों से खेलने के लिये उनकी कोठी में बिना-बताये पहुँच जाते थे। एक दिन जब पिताजी के साथ हम जनाब कादिर साहब की कोठी पर पहुँचे तो बहुत बड़ी हलचल देख कर अजीब-सा लगा। वहाँ खड़े दो ट्रकों पर उनके घर का सामान लादा जा रहा था। ऐसा लगता था कि चाचाजी की बदली हो गई है और वो अम्बाला छोड़ कर कहीं और जा रहे हैं। मुझे क्या पता था कि यह शायद दोनों मित्रों की अन्तिम मुलाक़ात थी। बिछुड़ते हुए जो दोनों की आँखों में नमी देखी थी उसकी तस्वीर अभी तक मुझे अच्छी तरह से याद है। घर वापस आते हुए पिताजी ने बताया कि हिन्दुस्तान के दो हिस्से हो गये हैं; हिन्दुस्तान और पाकिस्तान और तुम्हारे चाचाजी हिन्दुस्तान छोड़ कर पाकिस्तान जा रहे हैं। मेरी बालबुद्धि में यह बात बैठ ही नहीं रही थी कि आख़िरकार चाचाजी को अम्बाला छोड़कर पाकिस्तान जाना क्यों पड़ रहा है? 

एकाएक चार अगस्त की रात को बड़े ज़ोर का धमाका हुआ। पता चला कि हमारे घर के पास जो गिरजाघर था वहाँ पर बम्ब फटा है और कुछ लोगों को चोटें भी आई हैं। इस घटना से लोगों के दिल में एक डर-सा बैठ गया। अगले दिन, जिस अहाते में हम लोग रहते थे, वहाँ के बड़े लोग इकट्ठे हो गये और अहाते में रोज़ रात को पहरा देने का फ़ैसला किया। पिताजी के पास अपनी बन्दूक थी। जिस दिन उनकी ड्यूटी होती थी, वो बन्दूक से पहरा देते थे। कभी-कभी तो और पड़ौसी भी रात को पहरा देने के लिये पिताजी से बन्दूक माँग कर ले जाते थे। 

धीरे-धीरे सफ़ेद रंग के खद्दर का कुर्ता पाजामा या धोती कुर्ता पहने और सिर पर सफ़ेद टोपी लगाये लोग नज़र आने लगे। रोज़ सुबह को ये लोग गाना गाते हुए शहर के चक्कर लगाते थे। मेरे पूछने पर पिताजी ने बताया कि ये लोग “प्रभात फेरी” के लिये निकले हुए हैं और देशभक्ति के गाने गा रहे हैं। पिताजी ने यह भी बताया कि जो गाना यह सब गा रहे होते हैं वो नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज का राष्ट्रगान है। 
 
“शुभ सुख चैन की बरखा बरसे, भारत भाग है जागा
पंजाब, सिन्ध, गुजरात, मराठा, द्राविड़ उत्कल बंगा
चंचल सागर, विन्ध्य, हिमालय, नीला जमुना गंगा
तेरे नित गुण गाएँ, तुझसे जीवन पाएँ
हर तन पाए आशा। 
सूरज बन कर जग पर चमके, भारत नाम सुभागा, 
जय हो! जय हो! जय हो! जय जय जय जय हो!॥

सब के दिल में प्रीत बसाए, तेरी मीठी बाणी
हर सूबे के रहने वाले, हर मज़हब के प्राणी
सारे भेद और फ़र्क मिटा के, सभी गोद में तेरी आके, 
गूँथें प्रेम की माला। 
सूरज बन कर जग पर चमके, भारत नाम सुभागा, 
जय हो! जय हो! जय हो! जय जय जय जय हो!॥

सुबह सवेरे पंख पखेरे, तेरे ही गुण गाएँ, 
सुगंध भरी भरपूर हवाएँ, जीवन में रूत लाएँ, 
सब मिल कर हिन्द पुकारे, जय आज़ाद हिन्द के नारे। 
प्यारा देश हमारा। 
सूरज बन कर जग पर चमके, भारत नाम सुभागा, 
जय हो! जय हो! जय हो! जय जय जय जय हो!!”

आख़िर वो दिन भी आ गया जिस का सब को इन्तज़ार था। १४ अगस्त, १९४७ की रात को पिताजी ने हम सब बच्चों को अगले दिन जल्दी उठने को कहा। अगले दिन तो ऐसा लग रहा था जैसे किसी मेले में जा रहे हों। सुबह ही पिताजी की उँगली पकड़ कर अनाज मण्डी पहुँच गये जहाँ पर तिरंगा झण्डा फहराया गया और मिठाई बाँटी गई। सारे शहर में लाउडस्पीकरों पर जो गाने बज रहे थे उनमें से वन्दे मातरम्‌ अभी भी याद है। बाक़ी गाने अपनी समझ से बाहर थे। 

हमारा मकान ईदगाह रोड पर था और हमारी बैठक अम्बाले की मशहूर ईदगाह के मेन गेट के ठीक सामने थी। ईदगाह और उसका कम्पाउण्ड अपने आप में बहुत बड़ी जगह में थी। गेट के बाईं ओर थोड़ी दूर अन्दर जाने पर एक बहुत बड़ा चबूतरा था जहाँ पर मस्जिद बनी हुई थी। उसके सामने कम्पाउण्ड में ईद के मौक़े पर हज़ारों नमाज़ी नमाज़ पढ़ने आते थे। ईद के इस मौक़े पर तो हम बच्चे बड़े मज़े से लोगों को आपस में ईद मुबारक कहते और गले-मिलते हुए देखते थे। मुझे याद है कि कई बार तो ईद के मौक़े पर पिताजी ने ठण्डे पानी का इन्तज़ाम भी किया था और “ईद मुबारक” कह कर गरमी में लोगों को ठण्डा पानी भी पिलाया था। अभी तक यहाँ हिन्दु मुसलमान में कोई भेदभाव नहीं था। 

मेरे देखते ही देखते अम्बाला कैण्ट वो शहर नहीं रहा जो पहले था। अचानक बहुत सारे लोग जाते जा रहे थे और आते जा रहे थे। एक दिन क्या देखा कि ईदगाह के गेट के ठीक पास ही पाकिस्तान से आये एक सिख परिवार ने ईदगाह की दीवार तोड़ कर चार कमरे बना कर एक होटल खोल लिया और उस होटल का नाम “Hotel-de Paris” रक्खा है। पाकिस्तान से आये हुए और शरणार्थीयों ने भी ईदगाह की चारों ओर की बाक़ी दीवारें तोड़ कर छोटे-छोटे तम्बू लगाकर सिर छुपाने की जगह बना ली थी। धीरे-धीरे तम्बुओं की जगह कच्चे मकान बनने शुरू हो गये। अब तक मुल्लाह लोग भी सब कुछ छोड़-छाड़ कर पाकिस्तान चले गये थे। हर रोज़ यही देखने को मिलता कि जहाँ कहीं भी ख़ाली जगह होती, वहीं पर अपने इन भाइयों ने जैसे-तैसे रहने का ठिकाना बना लिया। 

अम्बाला कैण्ट और अम्बाला शहर में कोई पाँच किलोमीटर की दूरी थी। इसी बीच पिताजी ने भी शरणार्थियों को बसाने में मदद करने के लिये अपना नाम  वालंटियर फ़ोर्स (volunteer force) में दे दिया था। अब वो सप्ताह में दो-तीन बार सुबह को रिफ़्युजी कैम्प में जाते थे और शाम को काफ़ी देर बाद घर लौटते थे। एक दिन मैंने भी उनके साथ जाने की इच्छा जताई। पहले तो वो थोड़ा हिचकिचाये लेकिन माँ के कहने पर मान गये। अगले दिन अम्बाला रोडवेज़ की 2 नम्बर बस लेकर हम अम्बाला कैण्ट और अम्बाला शहर के आधे रास्ते में नये बसे मॉडल टाउन रिफ़्युजी कैम्प में पहुँचे। देखा तो वहाँ तो चारों तरफ़ तम्बू ही तम्बू नज़र आ रहे थे। लगता था जैसे कि एक पूरा शहर बसा हुआ हो। एक-एक तम्बू में पूरा परिवार ठहरा हुआ था। वालंटियर्स (Volunteers) के दफ़्तर के लिये तीन तम्बू अलग से थे। ऐसे ही एक तम्बू में पिताजी जाकर बैठ गये। थोड़ी देर बाद मुझे छोड़कर वो अपने काम में लग गये और मुझे कहा कि यहीं बैठना है और बाहर नहीं जाना है। कुछ देर ऐसे ही बैठे रहने के बाद मुझे भी कुछ सेवा करने का मन आया लेकिन मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा कि मैं यहाँ क्या काम कर सकता हूँ। जब मैं ने देखा कि पास वाले टैण्ट में मुझ से थोड़ी ज़्यादा उमर के बच्चे कुछ सफ़ाई का काम कर रहे हैं तो पता नहीं मेरे दिमाग़ में क्या आया और मैं भी उन सब के साथ सफ़ाई के काम में लग गया। लौट कर आये पिताजी ने यह सब देखा तो हँस कर मुझे शाबाशी दी। 

मॉडल टाउन कैम्प के अलावा अम्बाला में बलदेव नगर कैम्प भी एक बहुत बड़ा रिफ़्युजी कैम्प था। वहाँ भी कई बार जाने का मौक़ा मिला। एक बच्चे की आँखों से जो लोगों की पीड़ा देखी और किस तरह से ज़िन्दा रहने के लिये सारे परिवार को जूझते देखा, उस दृश्य का दिलो-दिमाग़ पर ऐसा ठप्पा लग गया जो शायद कभी भी नहीं जायेगा। पिताजी से जब लोग अपने दर्दनाक क़िस्से बताते थे कि कैसे अपना बना-बनाया भरा घर छोड़कर रातों-रात एक उस सफ़र के लिये निकलना, जहाँ यह भी पता नहीं कि कहाँ जाना है और ज़िन्दा भी पहुँच पायेंगे या नहीं, सुनकर कभी-कभी तो डर-सा लगने लगता था। कैसे भद्र परिवार को भूख का सामना करना पड़ा, क़त्लेआम के शिकार हुए, आँखों के सामने बच्चे माँ-बाप से बिछुड़ गये, बहन-बेटियों की इज़्ज़त लूटी गई के मार्मिक क़िस्से सुनकर एक बच्चे के दिमाग़ पर क्या बीती होगी आप पर छोड़ता हूँ। 

मुसलमानों को पाकिस्तान जाने के लिये और हिन्दुओं को भारत आने के लिये लोगों को अधिकतर अपने ही बलबूते पर आना-जाना पड़ता था। इस सफ़र में दोनों तरफ़ों को हिंसा का सामना भी बहुत करना पड़ा। जहाँ-जहाँ कुछ भाग्यवान परिवारों को मिलिटेरी की सुरक्षा मिल गई, वो बिना कोई मार-काट सहे नये देश में सही सलामत पहुँच गये। अम्बाला शहर में पिताजी के एक मित्र दोस्त मुहम्मद बाँसों का काम करते थे। उनका परिवार भी काफ़ी लम्बा चौड़ा था। एक दिन वो पिताजी से आकर बोले कि भाई जान क्या कोई ऐसा तरीक़ा है कि पाकिस्तान जाने के लिये उनको किसी तरह मिलिटेरी सुरक्षा मिल जाये। बहुत खोजने पर पिताजी ने पता किया तो मालूम हुआ कि ब्रिटिश आर्मी का एक कर्नल फ़ैरी इस महकमे का इंचार्ज है। कर्नल फ़ैरी की कोठी का पता किया और एक दिन उसकी कोठी पर पहुँच गये। 

पिताजी कर्नल फ़ैरी को इम्प्रैस करने के लिये मुझे इसलिये साथ ले गये कि बेटा कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ता है और कर्नल फ़ैरी से अँग्रेज़ी में बात करेगा। चूँकि स्कूल में मुझे नन्ज़ और ब्रिटिश टीचरों से वास्ता रहता था इसलिये इंग्लिश बोलने में झिझक तो नहीं थी, फिर भी एक नौ-दस साल के बच्चे से आप क्या उमीद कर सकते हैं! थोड़ी देर में कर्नल फ़ैरी बाहर आये और पिताजी से बात करने के बाद मुझ से भी इंग्लिश में कुछ पूछा जिसका जवाब मैंने दे दिया। (कर्नल फ़ैरी ने मुझ से क्या पूछा मुझे याद नहीं है। हाँ, इतना ध्यान है कि इंग्लिश में कुछ कहा था) जब उसे मेरे स्कूल के बारे में पता चला तो बहुत ख़ुश हुआ। पिताजी से बात करने के बाद उस ने पूरी प्रोटैक्शन देने का वायदा किया और चाचा दोस्त मुहम्मद के जाने की एक तारीख़ तय हो गई। कॉन्वाय के जाने से दो दिन पहले हम कर्नल फ़ैरी के यहाँ उनका धन्यवाद करने गये जहाँ पिताजी ने उसकी बेटी पैनी को एक सोने का सैट, अपने हाथों से, बतौर गिफ़्ट दिया। सैट देखकर पैनी के चेहरे पर जो ख़ुशी आई थी, वो अभी भी याद है। कॉन्वाय की सुरक्षा में चाचा दोस्त मुहम्मद पाकिस्तान ठीक-ठाक पहुँच गये थे। कोई सत्तर साल बाद उनके पोते ख़्वाजा अरशद से मेरा सम्पर्क हुआ और उनके पाकिस्तान का पता मिला। मालूम पड़ा कि चाचाजी तो नहीं रहे लेकिन उनका परिवार मण्डी बहाउद्दीन में सर्राफ़े का काम करते हैं। अरशद से मेरी बातचीत होती रहती है। 

इन्हीं दंगों के बीच पिताजी को दो हफ़्ते के लिये किसी काम से अमृतसर जाना पड़ गया। उन दिनों अमृतसर, लाहौर के नज़दीक होने के कारण हालात ऐसे थे कि कोई भी नहीं चाहता था कि वो अमृतसर जायें। ख़ैर उनकी अपनी मजबूरी थी इसलिये जाना बहुत ज़रूरी था। दो सप्ताह बाद जब वो लौटे तो उनके साथ एक चौदह पन्द्रह साल का लड़का था। पूछने पर उन्होंने बताया कि यह लड़का, जिसका नाम बद्री था, अपने माँ-बाप से बिछुड़ गया है। उन्होंने आगे यह भी कहा कि जब तक बद्री के माँ-बाप का पता नहीं चलता यह हमारे साथ रहेगा। बद्री अभी तक माँ बाप से बिछुड़ने के सदमे में था। पिताजी और माताजी का स्नेह और परिवार के माहौल में धीरे-धीरे वो काफ़ी घुल-मिल गया। मुझे तो जैसे एक मित्र या बड़ा भाई मिल गया हो। आठ-दस महीने बाद बद्री के माँ-बाप का पता मिल गया। कुछ चाँस की बात है कि वो अम्बाला शहर में ही बस गये थे। बद्री के जाने के बाद भी उसने सम्पर्क बना रहा। १९६५ में मेरे भारत छोड़ने के बाद उस से मुलाक़ात नहीं हुई। 

अम्बाले का बजाजा बाज़ार कोई ५०० मीटर लम्बा होगा। इसी बाज़ार में सड़क के दोनों ओर शरणार्थियों ने अपनी छोटी-मोटी दुकानें लगा ली थीं। खाने-पीने का सामान और जिसकी जो मर्ज़ी थी वो बेचते थे। मुनाफ़े के नाम पर बहुत कम मुनाफ़ा लेते थे। उनके इतना सस्ता सामान बेचने का लोकल दुकान्दारों के धन्धे पर काफ़ी असर पड़ा। ऐसे ही एक चीनी बेचने वाले का क़िस्सा बहुत मशहूर हुआ। रोज़ सुबह वो ढ़ाई मन की चीनी की बोरी लाता था और दाम के दाम बेचता था। इस बहाने शाम तक उसकी सारी चीनी भाव के भाव बिक जाती थी। काम ख़तम करने के बाद वो ख़ाली बोरी तीन रुपये में बेच देता था और यही उसकी सारे दिन की कमाई होती थी। धीरे-धीरे उसका काम बढ़ता चला गया और उसने ढंग की दुकान भी खोल ली। 

इस सब के बावजूद भी मेरा स्कूल जाना वैसा ही रहा। एक दिन हमारे स्कूल की मदर सुपीरियर “मदर बॉनावैंचर” ने बताया कि कॉन्वेंट स्कूल में हिन्दी की शिक्षा शुरू हो रही हैं। कुछ दिन बाद हमारी हिन्दी की नई टीचर “मिसेज़ डीन” ने क्लासें लेना शुरू कर दिया। अब उर्दू और अँग्रेज़ी के साथ-साथ हिन्दी भाषा का शिक्षण भी शुरू हो गया। 

मार-काट की ख़बरें तो आम हो गई थीं। पहले रेडियो पर जब-जब ख़बरें आती थीं तो कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता था। अब वो कुछ कुछ समझ आने लगी थीं और उनको सुनना भी अच्छा लगने लगा था। मुझे अच्छी तरह से याद है कि उस दिन स्कूल की छुट्टी थी और मैं मित्रों के साथ घर के बाहर खेल रहा था। पता नहीं कहाँ से शोर हुआ कि हमारे अहाते के बाहर किसी का क़त्ल हो गया है। अब जाते हुए डर भी लग रहा था और दिमाग़ कह रहा था कि पता करो कि क्या हुआ है? डरते-डरते और घर वालों को बिना बताये दोस्तों के साथ अहाते से बाहर तक जाने की हिम्मत तो की और दूर से देखा कि भीड़ लगी हुई है और लोग “क़त्ल हो गया, क़त्ल हो गया” का शोर मचा रहे हैं। मुझे अच्छा ख़ासा पता था कि अगर और नज़दीक जायेंगे और पता चल गया तो घर पर मार पड़ेगी, इसलिये चुपचाप वापस घर आ गया। 

जहाँ यह क़त्ल हुआ था उसके सामने ही शर्मा जी की जूस की दुकान थी। उसी शाम पिताजी को मिलने शर्मा जी हमारे घर आये और उन्होंने जो आँखों देखा हाल बताया वो कुछ ऐसे था। 

जैसे पाकिस्तान से जो हिन्दु भारत आये थे वो अपने मकान को वहाँ पर ताला लगा कर आये थे। इसी तरह से भारत से जो मुसलमान पाकिस्तान गये थे वो भी अपने अपने मकानों को ताला लगा गये थे। हलवाई बाज़ार में एक ऐसा मुस्लिम परिवार था जिसके लोग मकान को ताला लगाकर पाकिस्तान चले गये थे और वहाँ ठीक-ठाक भी पहुँच भी गये थे। पता नहीं उस घर के मालिक को भारत में अपना मकान देखने का क्या भूत सवार हुआ कि वो अकेला वापस अम्बाला आया, मकान देखा कि ठीक से ताला लगा हुआ है फिर उसके बाद सीना तान कर शहर में घूमने को निकल पड़ा। क्योंकि वो अम्बाले का ही रहने वाला था इसलिये उसकी जान-पहचान भी ख़ूब थी। सफ़ेद रंग की अचकन पहने आसपास के दुकानदारों से और लोगों से दुआ सलाम करता वो दुर्गा चरन रोड पर चल रहा था। उसे नहीं मालूम कि उसको दो पाकिस्तान से भारत आते हुए रिफ़्युजी जो क़त्ले-आम में अपना पूरा परिवार खो बैठे थे, उसका पीछा कर रहे हैं। उन में से एक इन साहब से वैसे ही जानकर मामूली-सा टकरा गया। अब क्या था, यह हज़रत आगबबूला हो गये और ग़ुस्सा करने लगे। इतने में दूसरा रिफ़्युजी भी आ गया और बात बढ़ने लगी। थोड़ी देर में दोनों ने अपना-अपना छुरा निकाला और इन सज्जन को तड़पा-तड़पा कर सब के सामने मार दिया। डर के मारे उसे बचाने कोई भी आगे नहीं आया। पुलिस के आधा घण्टे बाद पहुँचने तक दोनों क़ातिल ग़ायब हो गये थे। 

शहर का सारा ढाँचा बदल चुका था। अपने घर और मकान की सुरक्षा के लिये लोगों ने रात को स्वयं पहरा देने के लिये ज़िम्मेवारी अपने हाथों में ले ली थी। अब तो सड़कों पर कभी-कभी रात को पहरे के लिये मिलिटेरी के जवान भी नज़र आने लगे थे। पूरी कोशिश की जा रही थी कि शहर में अमन बना रहे लेकिन इक्की-दुक्की वारदातों का होना आम बात थी। इसी संदर्भ में एक दिन पिताजी जी ने बताया कि सुरक्षा के लिये शहर में  ‘नेशनल वालंटियर कोरNational Volunteers Corps (NVC)’ की स्थापना हो रही है और जिन-जिन लोगों के पास किसी क़िस्म का भी कोई हथियार है उन्हें उसके इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग दी जायेगी। इस ट्रेनिंग के लिये पिताजी को भी जाना पड़ा। 

ट्रेनिंग के बारे में तो मुझे अधिक याद नहीं है। इतना अवश्य ध्यान है कि NVC अधिक दिनों तक नहीं चली। हो सकता है कि NVC को सरकार ने NCC में बदल दिया हो। 

रोज़ नये नये शरणार्थी शहर में आ रहे थे और सरकार अपनी तरफ़ से उन्हें कैम्प में रहने की सुविधा दे रही थी। शहर में कांग्रेस पार्टी का और नेताओं का बहुत बोलबाला था। इन्हीं नेताओं में पण्डित भगतराम शुक्ला का नाम बहुत जाना-पहचाना था। छुटपन में और बड़े होने पर मुझे शुक्ला जी से कई बार मिलने का मौक़ा मिला है। बहुत ही सज्जन पुरुष थे शुक्ला जी। 

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) के “शाख़ा” मॉडल के आधार पर कांग्रेस पार्टी ने “ब्रिगेड” नामक शाखा में बच्चों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। जैसे संघ में “नमस्ते सदा वत्सले मातृभुमे” प्रार्थना गाई जाती है उसी से प्रकार कांग्रेस ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के राष्ट्रगान को अपने ब्रिगेड में गाना शुरू कर दिया। खेद की बात है ब्रिगेड अधिक दिन चल नहीं पाई और थोड़ी बार ही इसको बन्द करना पड़ा। 


मुझे ३० जनवरी, १९४८ की शाम अच्छी तरह से स्मरण है। उस रोज़ शाम को पिताजी ने कुछ साधु संतों को खाने पर बुलाया हुआ था। हम सब घर वाले इसी काम में जुटे हुए थे। जैसे-जैसे शाम को मेहमान आने शुरू हो गये, हमारी गतिविधियाँ भी तेज़ हो गयीं। जब सब मेहमान आग ये तो उनेमें से जो सब से बाद पहुँचे थे बोले कि अभी अभी ख़बर मिली है कि महात्मा गाँधी की हत्या हो गई है। फिर क्या था; मेहमान और सारे घर वाले रेडियो की तरफ़ भागे और कान लगा कर ख़बर सुनने में व्यस्त हो गये। ख़बर मिली कि किसी नाथूराम गोडसे ने तीन गोलियों से गाँधी जी की हत्या कर दी है। 

बचपन से ही मैं ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) की शाखा में जाना शुरू कर दिया था। रोशन लाल जी, कृष्ण कुमार जी और अश्वनी कुमार जी हमारी शाखा के संचालक और मुख्य शिक्षक होते थे। रोज़ शाम को शाखा में जाना, उनकी गतिविधियों में भाग लेना और अन्त में “नमस्ते सदा वत्सले मातृभुमे” प्रार्थना के बाद घर लौटना नित्य का कार्यक्रम हो गया था। 

एक सुयोजित संगठन होने के कारण देश में आर.ऐस.ऐस. की लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी और कांग्रेस के कुछ प्रमुख नेताओं को यह बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था। गाँधी जी की हत्या में उन्हें आर.ऐस.ऐस. को जड़ से मिटाने का एक अवसर मिल गया। उस समय के प्रधान मन्त्री जवाहरलाल नेहरु ने अमृतसर में घोषणा भी की कि राष्ट्रपिता की हत्या में आर.ऐस.ऐस. का हाथ है। फिर क्या था; २ फ़रवरी १९४८ को संघ के गुरुजी को बन्दी बना लिया गया और ४ फ़रवरी को केन्द्रिय सरकार की सूचना अनुसार आर.ऐस.ऐस. पर प्रतिबन्ध लगा दिया। अब शाख़ायें लगना बन्द हो गया था। धीरे धीरे शहर की दीवारों पर अंग्रेज़ी के बड़े बड़े अक्षरों में J और उसके नीचे ‘For Justice to RSS’ लिखा पाया गया। इस प्रतिबन्ध के दौरान सरकार ने आर.ऐस.ऐस. के मुख्य कार्यालय “डॉ. हेडेगेवार भवन” को भी अपने कब्ज़े में ले लिया। १७ जुलाई १९४९ को केन्द्रिय सरकार ने यह प्रतिबन्ध हटा दिया। मुझे बहुत अच्छी तरह से याद है कि १९४९ के अगस्त के अंत या सितम्बर के शुरू में अम्बाला कैण्ट में आर.ऐस.ऐस. का बहुत बड़ा कैंप लगा था। मैं उस समय छटी या सातवीं कक्षा में पढ़ता था परन्तु इस कैंप में जो बच्चों की सरगर्मियाँ थीं उन में खुल कर भाग लिया। कैंप का श्रीगणेश शहीद भगत सिंह जी की माताजी ने किया था। पहले दिन शहर में बहुत बड़ा जुलूस निकला था। उस दिन मुझे आदरणीय माताजी के चरण स्पर्श करने का और उनके साथ फोटो खिंचवाने का अवसर भी प्राप्त हुआ। दुर्भाग्य मेरा कि वो फोटो मेरे पास नहीं है। 

एक सप्ताह के उस कैंप में बच्चों में देशसेवा, देशप्रेम और सच्चा नागरिक बनने के संस्कारों पर बहुत अधिक ज़ोर दिया गया। स्वस्थ रहने के लिये शरीरिक व्यायाम का महत्त्व समझाया। दूसरे ख़ेमों में बड़ों के कार्यक्रम चल रहे थे जिसके बारे में अधिक ज्ञान नहीं है। पिताजी ने उन सब कार्यक्रमों में खुल कर भाग लिया था। यहीं इस कैंप में मथुरा के पास के राया गाँव के ठाकुर यशवन्त सिंह से भें भी हुई। बड़े भाई की तरह, यह सज्जन मुझ से उमर में बड़े थे। इन से १९६५ तक पत्र-व्यवहार बना रहा। 


देश के विभाजन को दो साल हो चुके थे। धीरे-धीरे पाकिस्तान से आये हुए लोगों से भी मिलना जुलना बढ़ने लगा था। स्कूल में भी नये टीचर और विद्यार्थी आ गये थे। नये-नये मित्र बनना शुरू हो गये थे। कुछ नये मित्रों के साथ तो एकदम घर जैसा आना-जाना हो गया था। अपने नये मित्रों में आठवीं कक्षा में मेरी दोस्ती हरीश वर्मा से हो गई थी। हरीश के पिताजी श्री कँवर भान जी हमारे टीचर भी थे। ये वो बचपन की दोस्ती थी जो यहाँ कैनेडा तक वैसे ही बनी रही जैसी शुरू में थी। १९६५ में मैं फ़रवरी में और हरीश सितम्बर में कैनेडा आये थे। यहाँ रहकर भी हमारा प्यार बिल्कुल वैसा ही बना रहा जैसे पहला था। परिवार सहित हरीश बर्लिंगटन में और मैं मिसीसागा में रहते थे। क़िस्मत की मार देखिये कि रविवार, १६ मई २०२१ को कैलेडौन में एक ट्रक के साथ ‘हैड ओन कोलीज़न’ सीधी टक्कर में हरीश ने इस संसार से नाता तोड़ दिया। अपने इस मित्र हरीश की याद सदा सदा मेरे दिल में रहेगी। 

ॐ शान्ति, शान्ति, शान्ति हरि ॐ

विजय विक्रान्त

1 टिप्पणियाँ

  • भारत विभाजन के संदर्भ में बेहतरीन संस्मरण. ....सादर वंदन आदरणीय. ...

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