भौंक से भारत दर्शन

01-07-2026

भौंक से भारत दर्शन

सुदर्शन कुमार सोनी (अंक: 300, जुलाई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

अभी एक कार्य से सूरत जाना हुआ। वहाँ के कुत्तों की सूरत और सीरत ने मन मोह लिया। सुबह-सुबह भूखे होने पर भी न आपस में लड़ते, न इंसानों से उलझते। शान्ति और सहअस्तित्व में यक़ीन रखने वाला शांत समुदाय। इंसानों की बेरुख़ी और बेख़बरी के बावजूद कोई विद्वेष नहीं। गाँधी मार्ग वाले कुत्ते थे, गरबा पर पंजा थिरकाने वाले, भूखे रहकर भी ‘सत्य मेव जयते, बाओं-बाओं’ कहने वाले संत-स्वभाव। 

अब याद आएँ मध्यप्रदेश के कुत्ते—बिना चेन के भी और चेन वाले भी चैन न लेने वाले। आते-जाते हर इंसान या वाहन पर ऐसे भौंकते हैं मानो एफ़आईआर दर्ज हो गई हो। क्षेत्रवाद के ऐसे कट्टर कि महल्ले की सीमा पार होते ही राष्ट्ररक्षा में जुट जाते हैं। यूपी के तो कुत्ते भी लठैत स्वभाव के, दौड़ते हुए पूछते हैं, “कौन जात?” 

अब हमने सारे प्रदेशों का दौरा वहाँ के कुत्तों का चाल-चलन जानने किया। यों तो पहले भी कई प्रदेशों में गए पर कुत्तों पर कभी गहराई से नज़र नहीं डाली। हाँ, इंसान के कुत्तेपन को तो कई बार गहराई से देखा है। दिल्ली के कुत्ते बॉस लेवल के—मूड ख़राब? काट लो! सर्वोच्च न्यायालय भी कह बैठा—ख़तरनाक हैं। पंजाबी कुत्ते रोटी नहीं, पनीर टिक्का माँगते हैं, नहीं मिले तो भँगड़ा कर लेते हैं—“ओये, दास लिया तेनु!” हरियाणा के कुत्ते जाट बॉडीबिल्डर जैसे—“भौंक दिया, अब मत छेड़ियो! नहीं तो पटक देंउं।”

बंगाल-असम के कुत्ते बुद्धिजीवी टाइप, रवींद्र संगीत और भूपेन हजारिका में डूबे हुए। काटना बुर्जुआ काम मानते हैं। असम के तो चाय ऑफ़र करके काटते हैं। दक्षिण के कुत्ते शालीन, अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं। केरल के कुत्ते एनआरआई बनने की ख़्वाहिश पाले हुए। काटने की जगह आयुर्वेदिक पम्फलेट थमाते हैं। तमिलनाडु वाले सिर्फ़ तमिल में भौंकते हैं—भौंक भाषा थोपने के ख़िलाफ़। कर्नाटक के टेकी कुत्ते ज़ूम कॉल करते हैं—वूफ़ भी सिलिकॉन एक्सेंट में। आंध्र के कुत्ते राइस प्लेट देख डांस कर बैठते हैं। तेलंगाना के बाइलिंग्वुअल तेलुगू और काटने की भाषा में निपुण। 

राजस्थान के कुत्ते सूखे-संयमी, बाल्टी भर पानी में संयम का पाठ पढ़ाते हैं—“रे बालक, रुक जा, काटूँ के प्यासा हूँ!” इंसान से ज़्यादा भेड़ों व ऊँटों के साथ रहते हैं। उत्तराखंड के कुत्ते पहाड़ी सादगी वाले, चढ़ाई में किसी को नहीं दौड़ाते—ऊपर भगवान बैठा है। महाराष्ट्र के गरजते कुत्ते तिलक की तरह कहते हैं—भौंकना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। मुंबई के कुत्ते जगह की तंगी से पूँछ दाएँ-बाएँ नहीं, ऊपर-नीचे हिलाते हैं। ओड़िशा के सांस्कृतिक कुत्ते रथ देखकर नतमस्तक, घंटी सुनकर शांत। झारखंड के कोयले जैसे कठोर, चिढ़ाओ तो डायनामाइट। 

उत्तरपूर्व के सबसे फ़ैशनेबल—गॉगल, हैट, रंग-बिरंगे जूते। काटेंगे नहीं, सेल्फ़ी माँगेंगे। छत्तीसगढ़ के कुत्ते जंगल और शहर के बीच के जीव—लोकगीतो पर पूँछ हिलाते हैं। और कश्मीर के? सबसे संतुलित—आतंकवाद, सेना और सैलानी से सामंजस्य। उनकी आँखों में बर्फ़ नहीं, भावनाएँ पिघलती हैं। 

तो, भारत विविधताओं का देश है और उसके कुत्ते भी। हर प्रदेश की भौंक में अलग स्वाद, पर एकता वही—जिसने हड्डी डाली, उसकी पूँछ हिली। और अंत में, सब कुत्ते एक मत से कहते हैं—इंसान का इंसानपन हमसे ज़्यादा कुत्तई लिए हुए है। हमारा कुत्तापन तो निश्छल है, वरदान है। इंसान ने उसे भी बदनाम कर डाला। 

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