आप और मैं एक ही नाव पर सवार हैं क्या!

15-09-2022

आप और मैं एक ही नाव पर सवार हैं क्या!

सुदर्शन कुमार सोनी (अंक: 213, सितम्बर द्वितीय, 2022 में प्रकाशित)

मैं पसीने से तरबतर हो गया था। दिल-ओ-दिमाग़ में चिंता व भय ने बिजली चमकने की तेज़ी से घर कर लिया था। भीड़ छाती पीट-पीट कर ख़तरनाक लगते नारे लगा रही थी। मैंने दूसरा वीडियो क्लिक किया। यहाँ भी वही हाल। तीसरा, चौथा क्लिक किया। यहाँ प्रतिकार में दूसरी तरह के ख़तरनाक नारे लगाये जा रहे थे। मैं वैसा ही भयाक्रांत हो गया मध्यम वर्ग जैसे पैट्रोल के दाम बढ़ने पर होता है। 

लगने लगा कि अब बाहर निकलना ख़तरे से ख़ाली नहीं। पर अपने वफ़ादार कुत्ते हेतु दवाई ख़रीदने वर्ग विशेष के बाहुल्य वाले इस इलाक़े में आना पडा़! ‘आओ चाय हो जाये’ पर दर्जनों लोग चाय की चुस्कियों के बीच बोल-बतिया रहे थे। एक गली में युवा दीन-दुनिया को भूल क्रिकेट खेलने में मशग़ूल तो दुकानों में व्यापारी व ग्राहक दोनों व्यस्त दिखे। सब तरफ़ सब कुछ सामान्य था। 

सौहार्द का सूखा, भीतर सोशल मीडिया में भले व्याप्त दिखता हो, पर बाहर आपसी सौहार्द की अतिवृष्टि व्याप्त थी। तनावमुक्त हो घर लौट आया। 

भोजनोपरांत मोबाइल में पुनः खप गया। तनावमुक्त से पुनः तनावयुक्त होने में पल भर भी नहीं लगा। कोई सोना बेच, लोहा ख़रीदने की बात तो, उदयपुर वाली घटना पर दो पक्ष गला फाड़ रहे थे। बस आपसी गुत्थम-गुत्था की ही देरी लगती थी। अब पुनः महसूस होने लगा कि दोपहर तो क़िस्मत से सही-सलामत लौट आया। हक़ीक़त में कभी भी कहीं भी कुछ भी अप्रिय हो सकता है। पर ये मन मानता कहाँ है। सायं पुनः पुराने शहर के बाज़ार में था। इक छोटी सी दुकान पर चटोरों की भारी, पर सर्वधर्म समभाव वाली भीड़ गर्मागर्म मंगोड़ों का मज़ा ले रही थी। मंदिर से भजन की, तो पास की मस्जिद से अज़ान की आवाज़ आ रही थी। एक वर्ग के एक डॉक्टर के यहाँ सर्वधर्म समभाव प्रदर्शित-सी करती मरीज़ों की भारी भीड़ थी। मन का भारीपन पुनः उतर गया। घर लौट आया। सोशल मीडिया की अदृश्य सम्मोहनी से शक्ति ने पुनः खींच लिया। एक धार्मिक गुरु भड़काऊ भाषण दे रहे थे। तो दूसरे वीडियो में दूसरे धार्मिक गुरु दूसरे तरह से बरस रहे थे। इसने पुनः तनाव की नाव में सवार कर दिया। 

दूसरे दिन मैं भारी व आशंकित मन से कार्यालय आया। यहाँ कुछ नहीं तो सात-आठ अल्पसंख्यक वर्ग के कर्मचारी हैं। पर यहाँ तो सोशल मीडिया की रत्ती भर परछाईं भी नहीं दिखी। सब कुछ हमेशा की तरह सामान्य। 

सायं एक साहित्यिक कार्यक्रम में किन्ही गोकुल सोनी जी के व्यंग्य ‘श्वान पर टैक्स की कहानी’ का पाठ चल रहा था। उन्होंने रेखाकिंत किया था कि जिस श्वान पर ‘अगले जनम मोहे कुत्ता कीजो’ जैसा ग्रंथ लिखा जा चुका है उस पर टैक्स कैसे लग सकता है! समीक्षा बाद में डॉक्टर मोहम्मद आजम ने की। पिछले दिवस का ख़ौफ़ व चिंता अब तक पूरी तरह उतर चुके थे। 

घर लौटा। मोबाइल पर उँगलियाँ चलाने ही वाला था कि मन ने मंजूरी नहीं दी! एक पुस्तक में खो गया। काफ़ी सुकून मिला। अगली सुबह अत्यंत प्रफुल्लित महसूस कर रहा था। 

कहीं गंगाधर की तरह आपकी भी तो साँप छछूंदर की स्थिति नहीं है सोशल मीडिया के बाहर व भीतर के बीच ज़मीन आसमान का फ़ासला है। फ़ैसला आपके हाथों में है।अ

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