एनजीओ का शौक़

सुदर्शन कुमार सोनी

इस समय दीन-दुनिया में एक शौक़ चल रहा है, और इसमें ख़ास बात यह है कि ये शौक़ अभिजात्य वर्ग में, जिसके पास रोटी का सुनिश्चित और भरपूर साधन हैं, ज़्यादा फलफूल रहा है। उसका दिमाग़ समाज सेवा की भावना से लबलबा रहा है, वह "समाज सेवा", "देश सेवा" में पीछे न रह जाये यह चिंता उसे खाये जा रही है। वह सेवा के क्षेत्र में आगे कैसे बढ़ें तो इसके लिये किसी नेक ने एक सलाह दे दी कि एनजीओ खोल के दूसरे के लिये जियो! इसमें सेवा व मेवा दोनों का योग है।

मैं उस श्रेणी की बात कर रहा हूँ जिन्हें कि एनजीओ का चस्का समाज सेवा के कारण लग गया है, और जब पेट गले तक भर जाये तो फिर कई लोगों को टाईम पास के लिये समाज सेवा याद आने लगती है। और ऐसे सारे चस्केबाज़ पॉश इलाक़ों में आलीशान एसी भवनों में रहते हैं, एसी कारों में चलते हैं। पैदा शहर में हुये हैं तो ज़ाहिर है कि यहीं से दुनिया से रुख़्सत भी करेंगे! मेरा कहने का मतलब यह है कि उन्होंने गाँव कभी देखा नहीं, जैसा सिनेमा में देखा, किसी सीरियल में देखा या कि अखबारों में आने वाली स्टोरीज़ में पढ़ कर अनुमान लगाया, वैसा इनमें से अधिकांश असली गाँव को समझते हैं। लेकिन एजीओ बनाने के बाद उनकी बहुत ललक रहती है कि वे जल्दी से जल्दी किसी गाँव में जाये, गाँव वालों से उनका साक्षात्कार हो, गाँव के लोग उनको मसीहा समझें, वे वहाँ पूजे जायें, वहाँ की स्त्रियाँ उनकी आरती उतारेंगी और वे साल दो साल में गाँव का कायाकल्प "रालेगाँव सिददी" व "हिवरे बाजार" की तर्ज़ पर कर देंगे। आदि आदि ख़्वाहिश उनकी रहती है।

ऐसे ही एक अभिजात्य परिवार की महिला को एनजीओ का शौक़ चढ़ गया, पति अच्छी कार्पोरेट नौकरी में थे। अब मैंडम के पास टाईम और पैसा दोनों भरपूर थे। उन्हें किसी ने मेरे बारे में बता दिया कि मैं ग्रामीण क्षेत्र में नौकरी कर रहा हूँ, और ग्रामीण क्षेत्र का जितना काम मैं करता हूँ और जानता हूँ, मेरे जितना किसी अन्य नौकरी वाला नहीं करता और न ही जानता है! हमारी गाँव-गाँव, टोले-टोले में आंगनवाड़ी हैं, स्कूल हैं, महिलाओं, बच्चों, उनके परिवार वालों सभी से हमारा इंटरएक्शन होता रहता हैं।

हमें एक दिन जेठ के महीने में उनका फोन आया, उन्होंने कहा कि एक उन्होंने आपका रेफ़रेन्स दिया था कि आप गाँव से सीधे जुड़े हैं, और हम तो इंदौर में रहते हैं, तो इंदोर से गाँव कितनी दूर होग जहाँ कि आप हमें विज़िट करा सकते हैं?

मैंने कहा, "वही सौ किलोमीटर के बाद आपको हम ठेठ गाँव के दर्शन भी करा देंगे।"

वे बोली, "ठेठ गाँव?"

मैंने कहा, "हाँ, गाँव दो तरह के होते हैं, एक तो शहरी गाँव जो कि गाँव केवल नाम के हैं। ये शहर के पास स्थित होते हैं, पूरी शहरी आदतें हैं यहाँ के निवासियो की, खेती-बाड़ी में रुचि नहीं। यहाँ के नवयुवको को शहर में, मॉल में, होटलों में, दुकानों में, आटो चलाने में, टैक्सी चलाने में और अन्य काम करने में आनंद आता है। वे खेती-बाड़ी में रुचि नहीं रखते हैं। तो हम आपको ठेठ गाँव जेठ की इस गर्मी में विज़िट करायेंगे।"

वे बहुत प्रसन्न हो गयीं, चिड़िया की तरह चहक उठीं। शायद गाँव पहली बार आ कर देखेंगी। वे बोलीं कि वे शीघ्र ही मुझे फोन कर देंगी।

मैंने कहा कि ठीक है, हम तो रोज़ ही इन गाँव वालों के बीच रहते हैं, तो मेरे लिये तो सारे दिन बरोबर हैं। मैं तो गाँव के लिये, गाँव द्वारा और गाँव का ही काम करने के लिए बना हूँ। लेकिन उनका फोन कई दिनों तक नहीं आया। आख़िर एक दिन उत्सुकता में मैंने ही फोन कर लिया आख़िर मैं भी रोमांचित था, कि उनको गाँव दिखाना है, जिन्होंने कभी गाँव नहीं देखा हो!

वे बोली कि उस दिन, जिस दिन वे गाँव के लिये निकलना चाह रही थी; यहाँ शहर में ही "गाँव शहर में" करके एक प्रदर्शनी गुजरात की लग गयी थी, तो हमने सोचा कि यहीं गाँव देख लेंगे! लेकिन वे बोली इस बनावटी गाँव को देखने में सच में एन्ज्वाय नहीं हुआ। मैं शीघ्र ही आपके असली ठेठ गाँव आऊँगी और आपको आने के पहले फोन कर दूँगी।

मैंने पूछा कि गाँव के नाम से बना एनजीओ आपका ठीक चल रहा है?

बोली, ?हाँ, वह तो ठीक चल रहा हैं, बस गाँव देखना बाक़ी है, गाँव वालों के कल्याण के लिये काम करना है, उनका एक तरह से मसीहा बनना है," उन्होंने सकुचाते हुये कहा।

उनका फोन बहुत दिन तक फिर नहीं आया तो मैंने सोचा कि हमारे गाँव एक मसीही से, अब मसीहा तो पुल्लिंग है, तो चूँकि मैं स्त्री सशक्तिकरण का फ़रमादरबार हूँ तो मसीही लिखा है से वंचित हो जायेगा, तो मैंने एक दिन फिर फोन घुमा दिया।

वे उधर से बोली कि क्या बतायें, शर्मा जी, एक काम निकल आया था। तो गाँव के लिये नहीं निकल पायी। बोली यहाँ "इन्दौर उत्सव" लगा था और यह दो साल में एक बार लगता है, तो मैंने सोचा कि गाँव मैं बाद में आ जाऊँगी वैसे भी यह प्रचारित किया गया था कि इस बार का उत्सव "गाँव आपके द्वारे" की थीम पर है। फिर आप तो हैं ही कौन से ट्रांसफर हुये जा रहे हैं? इनका यह कहते ही मुझे वो सारे चेहरे याद आने लगे, जो कई माहों से अपने तबादले के पीछे "हाथ मुँह धोकर" पीछे पड़े हुये थे।

मैंने एक दिन फिर फोन लगा लिया उनको और पूछा कि वो आपका गाँव का एनजीओ ठीक से चल रहा है? वे बोलीं, "हाँ ठीक से चल रहा है। गाँव नहीं जा पाये थे तो यही एक दिन झुग्गी बस्ती में दस सिलाई मशीनें बँटवा दीं।"

मुझे लगा कि इनकी कुछ तो हस्ती है।

"लेकिन वो गाँव जैसा मज़ा नहीं आया, मुझे लगा ही नहीं कि मैं कोई ग़रीबों की मसीहा हूँ, और न ही किसी ने ढंग से स्वागत ही किया। वे महिलायें जैसे मुँह लटका कर आयीं थी। वैसे ही वे मशीन मिलने के बाद भी लटका कर कार्यक्रम समाप्ति पर वापिस हो लीं।"

मैंने कहा, "मैडम गाँव जब तक नहीं आयेंगी, एनजीओ चलाने का मज़ा महसूस नहीं होगा। ग्रामीण विकास में ही असली विकास है, देश का, और किसान का। शहर में तो अपार अवसर होते हैं; सब कोई न कोई काम करते रहते हैं, सबको काम मिल जाता है।"

वे बोलीं कि अबकी पक्का वे गाँव आयेंगी और उन्होंने गाँव का नाम व शहर से दूरी आदि सारी जानकारी ले लीं। हम भी फिर रोज़ की तरह अपने "नौकरी बचाओ आंदोलन" हेतु ज़रूरी आवश्यक कर्मों को करने में मशगूल हो गये। लेकिन माह भर हो गया, उनका फोन फिर नहीं आया और अपना मन बिल्कुल अकबका रहा था, व्याकुल था। ऐसी शख़्स को गाँव दर्शन करवाना चाहता था, जिन्होंने अभी तक केवल और केवल शहर दर्शन किये थे।

अब दो माह हो गये थे। हमसे जब नहीं रहा गया, तो हमने ही फिर फोन कर लिया। वो बोलीं कि क्या बतायें शर्मा जी हम राष्ट्रमंडल खेलों को देखने दिल्ली चली गयीं थीं। "खेल गाँव" का नाम सुना था तो हमने सोचा कि गाँव के यहीं दर्शन हो जायेंगे। लेकिन यह तो अलग ही चीज़ थी। अबकी मैं पक्का गाँव आऊँगी असली गाँव अपने सपनों का गाँव, और वे थोड़ी देर के लिये मौन हो गयीं। मुझे लगा कि वे आगे सोच रही होंगी जहाँ कि महिलायें उनके पहुँचने पर उनकी आधा किलोमीटर दूर से आरती उतारेंगी। उनको मसीहा मानेंगी, वे अपने एनजीओ के काम से पूरे गाँव की तस्वीर व तक़दीर बदल कर रख देंगी। यह बात अलग थी कि उनके पास कोई स्पष्ट कार्ययोजना नहीं थी, उन्होंने जब गाँव देखा ही नहीं तो फिर कार्ययोजना कैसे बने? यहाँ आयें तो कुछ समझ में आये।

अंततः एक दिन उनका फोन आया कि वे गाँव आ ही रही हैं!

मैंने कहा, "आ जायें। लेकिन यह समय ग़लत है। सभी लोग फ़सल कटाई में लगे हैं। आदमी मुश्किल से जुटेंगे।"

वे बोली, "औरतें तो आ जायेंगी।"

मैंने कहा, "आदमी का मतलब उसमें सब शामिल हैं।"

वे बोली, नहीं वे तो आ रही हैं नहीं तो ऐसे बूढी़ हो जायेंगी, लेकिन गाँव वो भी ठेठ वाला देख नहीं पायेंगी।

मैंने कहा ठीक है आ जाइये।

वे आ ही गयीं। गाँव के प्रवेश द्वार से सटी सड़क पर दस महिलाये शौच के लिये लौटा लेकर बैठी थीं। वे उनकी लग्ज़री कार अचानक यहीं आकर रुकने से एकदम से खड़ी हो गयीं और उन्होंने भी यह समझकर कि वे उनका स्वागत कर रही हैं हाथ जोड़ दिये। मैंने स्थिति भाँपकर जल्दी से उन्हें आगे की ओर ले गया। यह ठेठ गाँव था, गाँव की चौपाल में मैं उन्हें ले गया। मुश्किल से पन्द्रह आदमी इकट्ठे कर पाये थे हम लोग। उस तीन तो मेरे कार्यालय के थे इसके अलावा एक सरपंच व एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता थी। सरपंच भी एसपी मतलब सरपंच पति था। तो कुल छह तो यह लोग हो गये, बाक़ी नौ गाँव वाले थे। उनमें दो बच्चे गोद में थे। तो बचे सात लोग उसमें भी दो तो ऐसे बिल्कुल कब्र में पैर लटके हुये वाले, एक गाँव का पागल युवक नाक ज्ञानी भी ही ही करके वहाँ आ गया था ! लगता है इसके माँ बाप पागल थे जो कि नाम ज्ञान रखा! गाँव में बाहर से कोई भी आये ये दो बुजुर्ग चश्मे के अंदर से अपनी दार्शनिक दृष्टि से उनको निहारते ही थे। तब तक जब तक कि आये हुये गये न हो जायें! एक रजिस्टर्ड पियक्कड़ झगड़ू सिंह था वह आगे से पीछे झूम रहा था। जो नहीं आये वे सब काम में लगे थे, तो ऐसे बेकाम के कामों में अब आना, समय जाया करना समझने लगे थे।

वे बोलीं कि वे गाँव का उद्धार करना चाहती हैं। इस पर किसी को कुछ समझ में नहीं आया। क्योंकि ठेठ गाँव होने के बाद भी यहाँ पक्की सड़क थी, स्कूल आंगनवाड़ी भवन व पंचायत भवन था। एक रुपये किलो में अनाज मिल रहा था। बच्चों को स्कूल में मध्यान्ह भोजन, यूनिफ़ार्म, किताबें सब मुफ़्त थीं। महिलाओं के "स्व सहायता समूह" पहले से बने थे। दवाइयाँ मुफ़्त मिलतीं थीं, कृषि विभाग की योजनायें अलग चल रहीं थीं। महिला बाल विकास, आदिम जाति कल्याण विभाग सबकी योजनाये चल रहीं थीं। गाँव के कुछ बेरोज़गार व बिगड़ैल युवक पास बैठे चौपड़ खेल रहे थे। उन्हें दो-तीन बार बुलाने के बावजूद वे नहीं आये चौपड़ में ही मस्त रहे। मैडम को बहुत ग़ुस्सा आया कि वे मसीहा बनने का सपना लेकर गाँव के लोगों का सपना साकार करने आयी हैं, ख़र्च करना चाहती हैं लेकिन यहाँ तो कोई योजना ही आकार नहीं ले पा रही हैख; यहाँ के लोग इकटठे तक नहीं हुये। उल्टा पागल ज्ञानी एकदम से पास आकर पता नहीं क्या ऊटपटांग बोलकर माहौल ख़राब करके चला गया था। मोहतरमा गाँव पहली बार देख रही थीं और उसके रंग ढंग भी पहली बार ही।

अंत में उन्होंने गाँव वालों से पूछा कि उन्हें क्या चाहिये? तो दो ने मोटर सायकल की माँग व तीन ने 4 जी मोबाईल सेट की माँग कर डाली। एक ने ओवन की माँग कर डाली। वे अपने माथे का पसीना पोंछने लगीं। क्योंकि अभी 4 जी तो उनके पास भी नहीं था।

अब उन्हें जाने की जल्दी होने लगी थी, वे मुझे इशारा कर चुकीं थीं। मैंने सरपंच को इशारा कर दिया। उसने उनके सम्मान में उद्बोधन देकर अंत में बदमाशी भरा आश्वासन ले लिया कि वे अगली बार आयेंगी तो दो मोटर सायकल व तीन 4 जी सेट व एक ओवन गाँव के ग़रीबों के लिये लेकर आयेंगी।

उन्होंने अपने उद्बोधन में अनमने मन से हामी भरी। अब मैं उनका इंतज़ार कर रहा हूँ और वे मेरा फोन रिसीव नहीं करती। शायद वो अपना एनजीओ का काम अब केवल शहर में ही समेटे रखना चाहती हैं।

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