मनोभूमि
अवनीश कश्यप
हम दोनों के पास
दो आँखें थीं—
उसकी—छोटी,
मेरी—बड़ी।
वो पहाड़ियों से
जितना दूर देख लेता था,
मेरी आँखें भी
ऊँची इमारतों से
उतनी ही दूरी
टटोल लेती थीं।
दो हाथ थे—
उसके—हल्के,
मेरे—भारी।
वो अखाड़े में
बैठकर
मेरे लिए
ताली बजा लेता था,
मैं—
वहीं खड़े होकर
एक–दो हाथ
आज़मा लेता था।
दो पैर थे—
उसके—मज़बूत,
मेरे—कमज़ोर।
वो ऊँचाइयों को
यूँ ही
नाप लेता था,
मैं—
साँसों के बोझ तले
अर्ध दूरी पर
घुटनों को
ले बैठ जाता था।
दो ज़ुबानें थीं—
उसकी,
उसके जैसी;
मेरी,
मेरे जैसी।
वो मेरी ज़ुबान
सीखने की कोशिश करता था,
और मैं—
उसकी ज़ुबान से
अपने मतलब की बात
निकाल लेता था।
मातृभूमि एक ही थी।
उसका घर उत्तर-पूर्व में,
मेरा हिस्सा उत्तर की ओर।
वो मुझे अपना मानता था।
पर—
मैं
और मेरे विपरीत इलाक़े का भाई—
इस अपनावे से
न जाने क्यों
उससे—
भीर जाते थे,
लड़ पड़ते थे।
सब देखकर
अंधा बनता मैं,
सब सुनकर
बहरा बनता मैं,
सब जानकर भी
चुप होता—
मन में हथियार रखता हूँ,
जब-जब हक़ जताने की बारी आती,
अपनों पे ही
वार करता हूँ।