पतझड़ की वेदना 

01-12-2020

पतझड़ की वेदना 

कृष्णा वर्मा

टीस के तिमिरताल में
शिशिरीय हवा संग डोलता
डूबता तिरता
अविचल आतुर मन
साँझ का एकाकीपन
सियराती शीतल हवाएँ 
और पसरता मौन  
खिड़की के पार सुदूर खड़े 
पतझड़ी वृक्षों की वेदना जान
सहसा कसमसा उठता है 
आहिस्ता से स्मृति झरोखे से
दाख़िल हो आता है
तरु का सावनी अस्तित्व 
शाख़ों का लहलहाना
पल्लवों का खनखनाना
हवा के गीतों संग थिरकना
अल्हड़ झोंकों संग झूम-झूम कर ताली बजाना  
कैसी यह नियति
ऋतु की एक करवट
हँसते-खेलते जीवन का
पलट कर रख देती है सर्वस्व
हरे से पीला पीले से लाल फिर भूरा होता जीवन 
आफ़ताब के रंगों में नहाता
विलय की ओर बढ़ाता क़दम
चरमराता तड़पड़ाता 
विलीन हो जाता है होनी की गोद में
गतिहीन शब्दहीन विस्मित निस्तब्ध सी मैं 
झरोखे के पार 
खुले आसमान से 
झाँकते हुए ध्रुव तारे को 
टकटकी लगाए निहारती हुई 
गुमसुम सोच रही हूँ
काश! तुमसा ही अटल होता सबका जीवन
तो कभी कोई यूँ न होता निराश उन्मन उदास।

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