मधुशाला की बातें ऐसी,
मदिरालय की रीत यही है।
जो नाली तक साथ न छोड़े,
सच मे मानो मीत वो ही है।


दो चार जो पैग पिला दे,
वो भी आनन फानन में।
मदिरा का पर साथ न छूटे,
क्या आलय क्या कानन में।


सुरा सुंदरी कंचन काया,
बेशक होती स्वप्निल माया।
पर साथ जो रहे निरंतर,
वो ही साथी पक्का साया।


वो धूम्रपान के धुएँ में और,
गाली में भी साथ निभाये।
घर में जाते क़दम हिले तो,
ढाँढस वाँढस ख़ूब दिलाये।


पापा के आगे टिके रहे कि,
डर के आगे जीत वो ही है।
नाली तक जो साथ न छोड़े,
सच मे मानो मीत वो ही है।

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