डायरी का पन्ना – 008 : मैडिकल डॉक्टर

15-09-2021

डायरी का पन्ना – 008 : मैडिकल डॉक्टर

विजय विक्रान्त

एक मशहूर कहावत है कि “दूसरे की थाली में परोसा हुआ बैंगन भी लड्डू लगता है”। अपना जीवन तो हम सब जीते ही हैं लेकिन दूसरे की ज़िन्दगी में झाँक कर और उसे जी कर ही असलियत का पता चलता है। इस कड़ी में अलग अलग पेशों के लोगों के जीवन पर आधारित जीने का प्रयास किया है।

 

पिछली रात पार्टी से वापस आते-आते बहुत देर हो गई थी। नींद पूरी न होने के कारण अभी बिस्तर पर लेटा हुआ ही था और यह सोच रहा था कि काम पर देर से जाऊँगा कि तभी नर्स किट्टी का फोन आ गया। कहने लगी कि आज का दिन एक दम सॉलिड बुक है। अच्छा होगा अगर मैं साढ़े नौ बजे से कुछ पहले ही पहुँच जाऊँ। ख़ैर, ना चाहते हुये भी मैं नौ बजे अपने क्लिनिक पहुँच गया। साढ़े नौ बजे पहला मरीज़ आया। इस मरीज़ को मैं पहली बार मिल रहा था। शक्ल से तो यह शख़्स भला आदमी लगता था। “क्या तकलीफ़ है तुम्हें?” मेरे पूछने पर उसने बताया कि उसे पेट में बहुत दर्द है। बात को जारी रखते हुये उस ने बताया कि कल दुपहर को उसकी बीवी झगड़ा कर के बच्चों को साथ लेकर अपनी माँ के पास दूसरे शहर में चली गई थी। अपने ग़म को ग़लत करने के लिये वो रात देर तक शराब पीता रहा। गहरे नशे में जब वो घर पहुँचा तो बहुत भूख लग रही थी। फ़्रिज में खाने को कुछ नहीं था। सामने ब्रैड के चार स्लाईस नज़र आये। फटाफट दो स्लाईस टोस्टर में डाले और टोस्टर ऑन कर दिया। थोड़ी देर में देखा तो टोस्ट कोयला हो गये थे। उन्हें निकाल कर एक तरफ़ रख कर आख़री दो स्लाईस डाले। नशे में इतना धुत्त था कि वो दोनों भी जल गये। ख़ैर उन जले हुए चार टोस्टों के खाते ही पेट का दर्द शुरू हो गया। उस मरीज़ को दवा लिखकर भेज तो दिया लेकिन मन में ये विचार एक बार तो आया कि इसे तो आँख कें दवाई डालनी चहिये थी ताकि खाते हुए ये तो देख सके कि क्या खा रहा है।

इस मरीज़ को निबटाकर मैंने किट्टी से अगले पेशेंट, मिसेज़ डिसूज़ा, को बुलाने को कहा। बाहर जाकर किट्टी ने देखा कि मिसेज़ डिसूज़ा तो थी नहीं लेकिन सैम्युल नाम का, मेरे एक पुराने पेशेंट का बेटा, अन्दर आने को तैयार हो गया। मेरे कहने पर कि “अपोइंटमेंट तो मिसेज़ डिसूज़ा की है, तुम्हारी नहीं” वो कहने लगा कि “मिसेज़ डिसूज़ा मेरी सास है और वो अभी दस मिनट तक आ जायेगी। उसके आने से पहले क्या मैं आप से कुछ ज़रूरी बात कर सकता हूँ”। सम्युल की इस हरकत पर मुझे ग़ुस्सा तो बहुत आया लेकिन कुछ सोच कर उसे अन्दर आने दिया। कुर्सी पर बैठते ही वो बताने लगा कि मिसेज़ डिसूज़ा उसकी सास है, उनके पति का देहांत हो गया है और वो उन्हीं के साथ, कोई एक साल से रहती है। आदत से मजबूर हमेशा यह चाहती हैं कि बस सारी अटेंशन इन्हीं को मिले। बच्चों को लेकर हमारे और  ख़ास तौर पर मेरे काम में मीनमेख निकालना इनकी एक आदत बन चुकी है। समझाने के तौर पर कुछ कहो तो रोना-धोना शुरू कर देती हैं। हम दोनों इन से बहुत परेशान हैं लेकिन हालात को देखते हुये कुछ कह या फ़िर कुछ कर भी नहीं सकते। माहौल बदलने के लिये हम फ़्लोरिडा जाने की बात कर ही रहे थे कि बिना पूछे इन्होंने अपना साथ चलने का सामान भी बाँध लिया। छाती के दर्द के लिये वो आप से मिलने आ रही हैं। ये सब बातें मैं आपको इसलिये बता रहा हूँ कि क्या आप मिसेज़ डिसूज़ा को हस्पताल में भरती होने का इंतज़ाम करा सकते हैं ताकि कुछ दिन के लिये हम सब सकून से अपनी वकेशन मना सकें। सैम्युल की बातें सुनकर मैं हक्का-बक्का और परेशान हो गया। यह जानते हुये भी कि सैम्युल मेरे पुराने दोस्त का बेटा है और मैं इनका बीस साल से फ़ैमिली डॉक्टर हूँ, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि सैम को क्या जवाब दूँ। इसी बीच सैम की पत्नी रीता के साथ मिसेज़ डिसूज़ा ने प्रवेश किया। चैस्ट पेन के कारण ब्लड प्रैशर और ईसीजी लेने के बाद मैंने उन्हें पूरा आराम करने की और अधिक हाईपर न होने की सलाह दी। इसी बीच मेरे अन्दर सैम की बातों को और अपने मैडिकल ऐथिक्स को लेकर एक द्वंद्व चल रहा था। मैं नुस्ख़ा (प्रिस्क्रिप्शन) लिख ही रहा था कि मिसेज़ डिसूज़ा बोली कि “डॉक्टर साहब, मेरे इस दर्द की और अधिक जाँच करने के लिये, क्या आप मुझे अस्पताल में भर्ती करने का इंतज़ाम कर सकते हैं? बच्चे फ़्लोरिडा जा रहे हैं। हालाँकि बिना इनके कहे मैंने अपना सूटकेस तैयार तो कर लिया है, लेकिन मैं नहीं चाहती कि मेरे काराण इनकी छुट्टियों का मज़ा ख़राब हो”।

कुछ और मरीज़ देखने के बाद लंच टाइम हो गया था। जल्दी-जल्दी से एक सैण्डविच खाकर अपनी सीट पर आ गया और अगले मरीज़ को बुलाया। आज भीड़ कुछ ज़्यादा ही थी और मरीज़ों का वेटिंग टाइम भी कुछ अधिक ही था। समय का पता ही नहीं चला और पाँच बज गये। अब केवल दो मरीज़ रह गये थे। सोचा इन दोनों को निबटाकर घर जाकर फ़ैमिली के साथ मिलकर एक मूवी देखेंगे। यही सोचकर बाहर आकर अगले मरीज़ बॉबी को अन्दर आने को कहा।

मैं अभी बॉबी की जाँच ही कर रहा था कि घबरायी हुई किट्टी अन्दर आयी और कहने लगी कि बाहर मिस्टर मेहरा आये हैं और वो हार्ट बर्न की वज़ह से बहुत परेशान हैं। मिस्टर मेहरा मेरे पुराने पेशेंट के साथ-साथ मेरे दोस्त भी थे। मेरे कहने पर कि ’उन्हें बैठने को कहो और मैं इस पेशेंट को देखने के बाद उन्हें देखूँगा’, किट्टी घबराकर कहने लगी कि ’यहाँ आने से पहले मैंने भी उन्हें यही कहा था, लेकिन वो दर्द की वज़ह से बहुत परेशान हैं और आप से फ़ौरन मिलना चाहते हैं’। मेरे पास सिवाये मेहरा को फ़ौरन देखने के और कोई चारा भी तो नहीं था। बॉबी को वेट करने को कहकर मैं बाहर आकर मेहरा को मिला और अपने दूसरे एग्ज़ामिनेशन रूम में ले गया। पूछने पर मेहरा ने बताया कि पिछली रात वो एक पार्टी में थे। वहाँ पर ड्रिंक के साथ-साथ कुछ नमकीन और समोसे ही खाये थे। पार्टी के बाद घर आकर वो सोये भी ठीक थे और सुबह उठने में भी कोई परेशानी नहीं थी। कोई चार बजे के क़रीब वो अपने क्लायण्ट को मिलने जा रहे थे कि छाती में एकदम दर्द शुरू हो गया। चांस की बात है कि आपका दफ़्तर पास ही था सो मैने सोचा कि क्यों न आपको दिखा दूँ। बस यही सोचकर आप से मिलने आ गया। बातों के दौरान में मैं यह देख रहा था कि मेहरा वाक़ई दर्द से परेशान है। मेहरा की हिस्ट्री देख कर पता चला कि इसका ब्लड प्रेशर थोड़ा हाई ज़रूर है और वो इसकी दवाई भी ले रहे हैं। अपने डायग्नोसिस के हिसाब से मैंने हार्ट अटैक को रूल आऊट कर दिया और किट्टी को मेहरा को दो ’टम्ज़’ की गोलियाँ देने को कहा। यह कहकर  कि इस से तुम्हें रिलीफ़ मिलेगा मैं वापस बॉबी को देखने चला गया। बॉबी के साथ मुझे पाँच मिनटनट भी नहीं हुये थे कि किट्टी की बहुत ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ आई और वो मुझे बुला रही थी। हड़बड़ा कर बाहर आया तो देखा कि मेहरा कुर्सी से गिर कर नीचे फ़र्श पर औंधे मुँह पड़े हैं। मेहरा को इस हालत में देखकर मुझे लग रहा था कि इसे हार्ट अटैक हुआ है। मैंने किट्टी को फ़ौरन 911 डायल कर ऐम्बुलेंस बुलाने को कहा। पाँच मिनट में ऐम्बुलेंस आगई। पैरामैडिक्स ने मेहरा को देखा और बिजली का शॉक देकर होश में लाने की कोशिश की। थोड़ा साँस आने के बाद वो उसे अपने साथ ऐम्बुलेंस में हस्पताल ले गये। कोई पन्द्रह मिनट बाद हस्पताल से फोन आया कि मेहरा को मेरे क्लिनिक में ही बहुत ज़ोर का हार्ट अटैक हुआ था और पैरामैडिक्स के बहुत कोशिश करने के बावजूद भी उसने ऐम्बुलेंस में ही अपने प्राण छोड़ दिये थे। यह सुनकर मुझे बहुत ज़बर्दस्त धक्का लगा। एक बार तो मैंने सोचा कि मेहरा के दर्द को मैंने सीरियस क्यों नहीं लिया और उसे टम्ज़ देने की बजाय एकदम हस्पताल भेजने का इन्तज़ाम क्यों नहीं किया? इस दुर्घटना के बाद श्रीमती मेहरा को फोन करने की ज़िम्मेवारी भी मुझ पर आन पड़ी और यह मेरे लिये सब से बड़ी चुनौती थी।

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