डायरी का पन्ना – 006: पुलिस कॉन्स्टेबल

01-08-2021

डायरी का पन्ना – 006: पुलिस कॉन्स्टेबल

विजय विक्रान्त

एक मशहूर कहावत है कि “दूसरे की थाली में परोसा हुआ बैंगन भी लड्डू लगता है”। अपना जीवन तो हम सब जीते ही हैं लेकिन दूसरे की ज़िन्दगी में झाँक कर और उसे जी कर ही असलियत का पता चलता है। इस कड़ी में अलग अलग पेशों के लोगों के जीवन पर आधारित जीने का प्रयास किया है।

पिछले चार महीनों से मैं दिन की ड्यूटी पर तैनात था। इस सोमवार को मैंने जैसे ही थाने में पैर रक्खा तो कोतवाली के मुंशी से पता चला कि हैड ऑफ़िस से एक नोटिस आया है। उस में लिखा था कि रोज़ दिन ढले शहर में जेबें काटने की और महिलाओं के गले की चेन और पर्स खींचने की वारदातें बहुत बढ़ गई हैं। इन सब के पीछे केवल आदमी ही नहीं बल्कि औरतों का भी बहुत बड़ा हाथ है। जनता इन घटनाओं से बहुत परेशान है और पुलिस की मदद माँग रही है। नोटिस में आगे ये भी लिखा था कि हैड ऑफ़िस ने इन गुनाहगारों को पकड़ने के लिये एक टीम बनाई है। ये टीम रोज़ रात को गश्त लगायेगी और इन लोगों को रँगे हाथों पकड़ने की पूरी कोशिश करेगी। मुझे इस टीम का हैड कॉन्स्टेबल बनाकर मेरे साथ काम करने के लिये पाँच कॉन्स्टेबलों का चुनाव भी किया है। इस में तीन मर्द और दो औरतें होंगी।

कोई दस बजे के आसपास हमारे एस.एच.ओ. ने हम सब को बुलाया और कहा कि शहर के उस इलाक़े में, जहाँ दिन ढलने के बाद ही बाज़ार लगता है, कुछ लोगों ने पैदल या फिर बिना बत्ती की साइकल पर सवार हो कर लोगों की जेबें काटना और महिलाओं के पर्स और गले की चेन खींच कर ऊधम मचा रक्खा है। इससे पहले कि लोग चोर के पीछे भागें, वो भीड़ में छुपकर या साइकल पर सवार हो कर अन्धेरे में गुम हो जाता है। क़ानूनन रात को बिना बत्ती के साइकल चलाना गुनाह है। फ़ौरन चालान हो सकता है लेकिन पुलिस इस मामले में थोड़ी नर्मी बरतती है। एस.एच.ओ. ने हमें ऐसे लोगों पर भी ख़ास निगाह रखने को कहा और बिना बत्ती वाले साइकल सवार का तुरन्त चालान करने का आदेश दिया।

क्योंकि मैं और मेरी टीम शहर के चप्पे-चप्पे से वाकिफ़ थे इसलिये हम ने सब से पहले रसिक बाज़ार के इलाक़े में जाने का फ़ैसला किया। ये वो इलाक़ा था जहाँ पर दुकानें केवल शाम को ही खुलती थीं। क्योंकि यहाँ पर हर प्रकार का सामान मिलता था इसलिये शाम को ही लोग रोज़मर्रा की शॉपिंग के लिये आते थे।

हमने अभी अपनी गश्त शुरू ही की थी कि बड़ी ज़ोर से चोर-चोर की आवाज़ सुनाई दी। हम तो हर तरह से तैयार होकर आये थे। जैसे ही आवाज़ सुनी तो देखा कि एक आदमी साइकल पर चढ़ कर भाग रहा है। उसे देख कॉन्स्टेबल राम सिंह फ़ौरन अपनी मोटर साइकल पर कूद कर बैठा और चोर के पीछे लग गया। जब चोर को पता चला कि उसका पीछा हो रहा है तो वो साइकल छोड़ पैदल भाग कर छुपने की कोशिश करने लगा। ये देख राम सिंह ने भी अपनी मोटर बाईक छोड़ पैदल ही उसका पीछा करना शुरू कर दिया। अब भला राम सिंह जैसे एथलीट के आगे चोर कहाँ टिक सकता था। थोड़ी ही देर में जा दबोचा, दो झापड़ लगाये और हथकड़ियाँ पहना कर मेरे पास ले आया। मेरे भी दो और झापड़ पड़ते ही उसने सब कुछ उगल दिया और महिला की चेन ही नहीं बल्कि और भी सामान मेरे आगे रख दिया। छूटने के लिये चोर बहुत गिड़गिड़ाया। मेरे कहने पर राम सिंह ने उसे पुलिस वैन में बन्द कर दिया। पहली रात कुल मिला कर छ्ह आदमियों को हिरासत में ले लिया।

दूसरी रात तो कॉन्स्टेबल सुनैना ने कमाल ही कर दिया। दो ही घण्टे में तीन औरतों को जेब काटते हुये रँगे हाथों पकड़ लिया। उन तीनों के पास से भी काफ़ी सामान निकला। शॉपिंग करती हुई एक महिला का जब एक औरत पर्स खींच कर भागने लगी तो कॉन्स्टेबल शान्ति थोड़ी दूर पर ही खड़ी थी। उस ने महिला को भागते हुये देख लिया और उसके पीछे भागी। बाज़ार में भीड़ बहुत थी और भागती हुई चोर के गुम जाने की बहुत संभावना थी फिर भी वो शान्ति की गिद्ध जैसी निगाहों से नहीं बच पाई। थोड़ी देर बाद ही वो शान्ति की हिरासत में थी। उसे भी पुलिस वैन में बन्द कर दिया।

वक़्त के साथ-साथ धीरे-धीरे लोगों को और गुनाहगारों को पुलिस की मौजूदगी का एहसास होने लगा। अब शॉपिंग पर आये लोग भी अपने सामान पर ख़ास ध्यान देने लगे। वारदातें तो होती थीं लेकिन उन में भी काफ़ी कमी नज़र आने लगीं। अभी तक चोरों के पकड़ने के चक्कर में हम ने बिना बत्ती वाली साइकलों के चालान पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया था।

कोई एक हफ़्ते बाद मैंने अपनी टीम को बुलाकर कहा कि चोरों के साथ-साथ अब एक नज़र बिना बत्ती के साइकल चालकों पर भी रखी जाये। अगले दिन रात को जब मैं गश्त कर रहा था तो एक साईकल वाला बिना बत्ती के साइकल चला रहा था। मैंने सीटी बजाई और ज़ोर से आवाज़ देकर उसे रुकने को कहा।

मेरी चेतावनी को सुनी अनसुनी करके रुकने की बजाये तो उस भाई ने तो गाना शुरू कर दिया।

"मुझ को इस रात की तन्हाई में आवाज़ न दो, आवाज़ ना दो, आवाज़ ना दो।"

ये सुनकर मुझे बड़ा अजीब सा लगा और मैंने चिल्ला कर कहा, "अबे रात के वक़्त बिना बत्ती के साइकल चलाते हो और कहते हो कि आवाज़ ना दो।" मेरा ख़्याल था कि मेरी आवाज़ सुनकर वो मेरे पास आयेगा, लेकिन वो तो किसी और ही मूड में था और चालू रहा।

"रौशनी हो ना सकी दिल भी जलाया मैंने।"

अब मुझे भी कुछ मज़ा सा आने लगा था। मस्ती लेने के लिये और बात को आगे बढ़ाते हुये मैंने फिर चिल्ला कर कहा, “अबे इधर आता है कि नहीं। जल्दी आ वरना हवालात में बन्द कर दूँगा। वैसे आज तो तेरा चालान मुझे करना ही है।”

कहाँ तो मैं सोच रहा था कि वो मेरे पास आकर मुझ से माफ़ी माँगेगा, मेरे आगे गिड़गिड़ायेगा लेकिन उस पर तो कुछ और ही रंग चढ़ा हुआ था। अपने गाने को जारी रखते हुये बोला, "मैं परेशाँ हूँ मुझे और परेशाँ ना करो, आवाज़ ना दो, आवाज़ ना दो।"

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