दस सेकंड का फ़ैसला

01-03-2026

दस सेकंड का फ़ैसला

डॉ. मुकेश गर्ग ‘असीमित’ (अंक: 293, मार्च प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

ट्रेन अभी चली नहीं है।

भीड़भाड़ वाली ट्रेन, प्लेटफ़ॉर्म पर भागते लोग, और चाय वाले की आवाज़, “चाय . . . गरम चाय . . . ”

“कितने की है चाय?” अमित ने खिड़की से झुककर पूछा।

“दस रुपये की साहब, गरमा-गरम, कड़क अदरक वाली चाय!”

“अच्छा, एक दे दो . . . खुले पैसे हैं तुम्हारे पास?”

“कितने का है साहब?”

“सौ का।

“पहले चाय दो . . .” अमित ने थोड़ा सशंकित होकर कहा। गाड़ी चलने वाली थी। अमित जोखिम नहीं ले सकता था—अभी सौ का नोट लेकर चपत हो चला चायवाला तो?

अमित ने दस रुपये की चाय ली। सौ का नोट पकड़ा दिया।

वेंडर ने जल्दी में अपनी बरसाती जेब टटोली, खुले नोट निकाले और अमित को पकड़ा दिए, “गिन लीजिए साहब।”

अमित नोट गिनने लगा। तभी उसे पता लगा कि उसने दस-दस के तीन नोट और एक उसी का सौ का नोट वापस कर दिया था। शायद हड़बड़ी में पचास का नोट नहीं निकाल पाया और सौ का ही पकड़ा दिया।

“साहब, दस रुपये और नहीं हैं . . . आप एक चाय और ले लीजिए साहब। अभी ट्रेन चलने वाली है, नहीं तो मैं बाहर से ही खुल्ले कराकर ले आता . . .”

वह थोड़ा मायूस-सा दिख रहा था, उसे डर था कि कहीं ग्राहक चाय वापस न लौटा दे।

“अरे, तुमने मुझे . . . ” अमित ने बाक़ी के शब्द किसी तरह मुँह में ही दबा लिए।

“नहीं, कुछ नहीं . . . मुझे चाय नहीं चाहिए। तुम रख लो दस रुपये अपने पास।

“चलो कोई नहीं, ट्रेन चलने वाली है . . . ”


ट्रेन सीटी दे चुकी थी। वेंडर वहीं खड़ा अमित को दुआएँ-सी दे रहा था। अमित को लगा जैसे वह आज कितना छोटा हो गया है उस वेंडर के सामने।

ट्रेन चल पड़ी। उसने खिड़की से झाँका। वेंडर भीड़ में कहीं गुम—धुँधली-सी शक्ल उसकी आँखों से ओझल हो गई। 
अमित ने जेब टटोली। अतिरिक्त पचास की गरमी महसूस हुई। और भीतर एक हल्की-सी ठंडक उतर आई।

इतने में ट्रेन थोड़ी दूर जाकर झटके से रुक गई। अमित का दिल धक से रह गया। उसे लगा जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो। शायद वेंडर ने ट्रेन रुकवा दी हो कहीं तो? क्या कोई पुलिस वाला लेकर आएगा उसे?

सामने वाली सीट पर बैठे बुज़ुर्ग यात्री ने सहज स्वर में कहा, “बेटा, ये पैसेंजर ट्रेन है, रोज़ की खींच-तान चलती रहती है।”

इतने में टीटी आ चुका था।

“चिंता न करें साहब,” उसने हँसते हुए कहा, “अभी एक दूसरी फ़ास्ट गाड़ी को पास कराना है, इसलिए रुकी है।”

जब तक ट्रेन रुकी रही, अमित डरा-सहमा-सा, सिकुड़ा हुआ-सा, अपराधी की तरह बैठा रहा।

थोड़ी देर में ट्रेन चल दी। रफ़्तार पकड़ चुकी थी। अमित की जेब में पचास रुपये सुरक्षित थे।

वह चाय की चुस्की लेने लगा। पर चाय की गर्माहट के साथ-साथ मन में एक कसैला-सा स्वाद रह गया था, जिसे अदरक भी नहीं काट पाया। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें