यह चाहत
रेखा भाटिया
उस नन्ही चाहत का नाम है बचपन
ग़ुस्सा बैठा रहता नाक पर
उसका अपनी सही-ग़लत माँगें
मनवाने का तरीक़ा अनूठा है
न हो मन की तब
मचा देता है कोहराम
जो आए हाथ में फेंक देता
धरती पर हो जाता लोटपोट
राम-राम कर सब मानते उसकी बात
तब मुस्कुरा कर अगले ही पल
ठुमकता-मचलता, नाचता
कुलाँचें भरता आँगन-आँगन
न समझ पाता कोई उसे
अभी दो ही बसंत पार किए हैं
कहाँ से पाया है ऐसा स्वभाव
गणना होती पीढ़ियों की
परिवार का इतिहास खंगाला जाता
दूसरा कोई मेल न खाता
आज हँसी की बात है
मस्ती की बात है, ठहाके लगाते सभी
कल यही स्वभाव बन जाए यदि आदत
मुसीबत बनेगी भविष्य में . . .
बच्चों का स्वभाव स्वीकार्य है
वयस्क जब अपनाते यह आदत
अपनी सही-ग़लत माँगें मनवाने के लिए
कभी तोड़-फोड़ से, हिंसा से, विरोध से,
आतंकवाद से दबाव बनाते देश पर, समाज पर,
प्रशासन पर . . .
कोई झाँक कर देखे,
खंगाले इतिहास पीढ़ियों का
यह चाहत बन जाती है
अभिशाप तब मानवता के लिए।
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