यह चाहत 

15-06-2026

यह चाहत 

रेखा भाटिया (अंक: 299, जून द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

उस नन्ही चाहत का नाम है बचपन 
ग़ुस्सा बैठा रहता नाक पर 
उसका अपनी सही-ग़लत माँगें 
मनवाने का तरीक़ा अनूठा है 
न हो मन की तब 
मचा देता है कोहराम 
जो आए हाथ में फेंक देता 
धरती पर हो जाता लोटपोट 
 
राम-राम कर सब मानते उसकी बात 
तब मुस्कुरा कर अगले ही पल 
ठुमकता-मचलता, नाचता 
कुलाँचें भरता आँगन-आँगन 
 
न समझ पाता कोई उसे 
अभी दो ही बसंत पार किए हैं 
कहाँ से पाया है ऐसा स्वभाव 
 
गणना होती पीढ़ियों की 
परिवार का इतिहास खंगाला जाता 
दूसरा कोई मेल न खाता 
आज हँसी की बात है 
मस्ती की बात है, ठहाके लगाते सभी 
 
कल यही स्वभाव बन जाए यदि आदत 
मुसीबत बनेगी भविष्य में . . . 
 
बच्चों का स्वभाव स्वीकार्य है 
वयस्क जब अपनाते यह आदत 
अपनी सही-ग़लत माँगें मनवाने के लिए 
कभी तोड़-फोड़ से, हिंसा से, विरोध से, 
आतंकवाद से दबाव बनाते देश पर, समाज पर, 
प्रशासन पर . . . 
 
कोई झाँक कर देखे, 
खंगाले इतिहास पीढ़ियों का 
यह चाहत बन जाती है 
अभिशाप तब मानवता के लिए।

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
कहानी
पुस्तक समीक्षा
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में