लाइफ़ की क़ीमत जैकेट से भी कम है

15-05-2026

लाइफ़ की क़ीमत जैकेट से भी कम है

सुदर्शन कुमार सोनी (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

बरगी डैम की लहरों ने इस बार पानी से ज़्यादा सच उछाला है। 11 सैलानी डूबे—कहानी वही पुरानी, पटकथा वही सरकारी। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना कि इस बार लाइफ़ जैकेटें थीं . . . मगर सिस्टम के पास। यात्रियों के लिए नहीं, फ़ाइलों के लिए—सीलबंद, सुरक्षित, नियमों की आलमारी में टँगी हुई। हमारे यहाँ सुरक्षा “पहनने” की चीज़ नहीं, “दिखाने” की चीज़ है—इसलिए जैकेट भी फोटो में ठीक लगती है, पानी में नहीं। 

मौसम विभाग ने पहले ही चेतावनी दी थी—लहरें उठेंगी, हवा बदलेगी। पर हमारे यहाँ चेतावनी को सलाह समझा जाता है और सलाह को विकल्प। विकल्प भी ऐसा, जिसे चुनने की जल्दी सिर्फ़ उस वक़्त होती है जब टिकट काउंटर पर भीड़ लगी हो। नतीजा—क्रूज़ लहरों के हवाले, और यात्री क़िस्मत के। मौसम चेतावनी देता है, सिस्टम सलाह देता है—और हादसा फ़ैसला करता है। 

जाँच होगी। ज़रूर होगी। हमारे यहाँ जाँच समिति एम्बुलेंस नहीं, एलबम है—हर दुर्घटना की फोटो सहेजने के लिए। पहले प्रेस नोट, फिर जाँच समिति, फिर अंतरिम रिपोर्ट, फिर अंतिम रिपोर्ट . . . और अंत में रिपोर्ट का भी श्राद्ध। बीच में किसी जनरल मैनेजर का “मुख्यालय अटैचमेंट”—जैसे तूफ़ान में काग़ज़ का लंगर। एक-दो निलंबन—ताकि जनता को लगे कि न्याय की नाव भी चल रही है, भले ही बिना चप्पू के। यहाँ हर हादसे के बाद ज़िम्मेदारी “ट्रांसफ़र” हो जाती है, जवाबदेही नहीं। 

सबसे दिलचस्प बात—लाइफ़ जैकेट। बताया गया कि थीं, पर यात्रियों को पहनाई नहीं गईं। यानी सुरक्षा मौजूद थी, बस इस्तेमाल नहीं हुई। ठीक वैसे ही जैसे नियम मौजूद हैं, बस लागू नहीं होते; ज़िम्मेदार मौजूद हैं, बस जवाबदेह नहीं होते। एसओपी किताब में तैरती है, लोग पानी में डूबते हैं। और निलंबन अस्थायी होता है, लापरवाही स्थायी। और हमारे यहाँ के लोग भी अधिकारों की माँग नहीं करते भले ही मौत का अंदेशा हो। 

क्रूज़ के केबिन में सीलबंद जैकेटें थीं—जैसे सिस्टम ने सुरक्षा को तिजोरी में रख छोड़ा हो, ताकि कहीं ख़राब न हो जाए। बाहर लहरें थीं—बेख़ौफ़, बेलगाम। अंदर काग़ज़ थे—बेहिसाब, बेअसर। और बीच में इंसान—बिना जैकेट, बिना जवाब। सिस्टम की लाइफ़ जैकेट इतनी मज़बूत है कि उसमें सच भी डूब जाता है। 

जाँच कडा़ई से की जाएगी दोषियों को चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो बख़्शा नहीं जाएगा। अब आयेंगे सुझाव—“भविष्य में ऐसी घटनाएँ न हों।” यह वाक्य हमारे प्रशासन का राष्ट्रीय गान है। हर दुर्घटना के बाद इसे पूरे सुर-ताल में गाया जाता है। एक जाँच कमेटी बनेगी या नहीं तो एक आयोग बनेगा—कुछ सेवानिवृत्त फिर से सेवा के वृत्त में आ जाएँगे। रिपोर्ट में लिखा जाएगा—“सख़्त कार्रवाई होनी चाहिए”, “मानक संचालन प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ”, “जवाबदेही तय की जाए।” और फिर फ़ाइल बंद—जैसे लहरें थम गई हों। गंगाधर तो चाहता है कि हादसा हो ही न पर दुर्भाग्य से नया हादसा होने के बाद इस जाँच रिपार्ट पर सदैव की तरह धूल की गहरी परत चढ़ जाएगी। हम हादसों से नहीं सीखते, हम उनके लिए नए फॉर्मेट बना लेते हैं। ये हमारा ओल्ड व न्यू नॉर्मल दोनों है। 

असल समस्या यह नहीं कि लाइफ़ जैकेट नहीं थी। समस्या यह है कि हमारे सिस्टम में ‘लाइफ़’ की क़ीमत ‘जैकेट’ से भी कम है। सुरक्षा एक चेकलिस्ट है—टिक लगाने के लिए, न कि जान बचाने के लिए। और जब हादसा होता है, तो सिस्टम ख़ुद लाइफ़ जैकेट पहन लेता है—जाँच, निलंबन, अटैचमेंट की—ताकि वह डूबे नहीं। 

बरगी की लहरें शांत हो जाएँगी। ख़बरें भी। पर सवाल वही रहेगा—क्या अगली बार लाइफ़ जैकेट अलमारी से बाहर आएगी, या फिर किसी नई रिपोर्ट की जिल्द में सजी मिलेगी? 

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