आस्था
रेखा भाटिया
बढ़ती जाती है एक-एक सीढ़ी चढ़
क़दम करते हैं अनुक्रम साथ प्रयास
थकते हैं कुछ क्षण रुक फिर चलते
साँसें उखड़ आती हैं निज प्रयासरत
हृदय गति अति गतिवान शुभ आभास
आसपास हवा सुगन्धित हो उठती
पुष्पों के मिलेजुले प्रभाव से उत्साहित
धूपबत्ती का धुआँ दीपों की रोशनी में
अलौकिक उल्लास से भरता एहसास
भीतर उमड़ता और समर्पित हो जाता
उस ध्वनि को जो घंटियों से आती
कम्पन करती कानों से मस्तिष्क में
हृदय साक्षी साक्ष्य है महसूस होता
भीतर एक डरा-घबराया सच भी
निरंतर प्रयासरत खिंचाव पनपता
यह क्षण जब स्वयं को भूल जाना
फिर पाना स्वयं को चढ़ते सीढ़ियाँ
मंदिर की, आस्था जग जाती है तब
बढ़ती जाती है सीढ़ी दर सीढ़ी
पंछियों के कलरव लगते सुहाने
जीव-जंतुओं पर दया-करुणा
वृक्षों की ओट में ढलता सूरज
उगता सूरज साँझ और प्रातः का
विश्वास जगाता है अप्रतिम सुकून
तब कण-कण पर जाता है ध्यान
मगन मन प्रीत की बाँसुरी बजाता
तब रिश्ते-नाते प्रिय लगने लगते
सबके दुःख-सुख अपने लगते
दूर कहीं मेरा मैं स्वतः विलुप्त हो
अंत शीश झुक जाता पहुँचकर
उस परम सत्य के आगे झुककर
उस अवस्था को आस्था कहते हैं
आस्था जिसे हो समर्पित हृदय
बार-बार वही ग़लती दोहराता
भूल जाने की फिर याद करने की चेष्टा
क्या मैं इतना शक्तिशाली है भीतर
बार-बार विलुप्त हो फिर उग आता है!!
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