मन को सुख से भरता देश

01-08-2021

मन को सुख से भरता देश

त्रिलोक सिंह ठकुरेला

मन  को सुख से भरता देश।
 
कहीं सघन वन- उपवन-बाग़,
कहीं नदी, सर, ताल, तड़ाग, 
हिमगिरि कहीं, कहीं पर रेत,
कहीं मनोहर धानी खेत ,
कितना मनभावन परिवेश।
मन को सुख से भरता देश॥ 
 
कहीं मधुर कलरव का शोर,
कहीं नाचते सुन्दर मोर,
तोता-मैना कहीं बटेर,
कहीं दहाड़ लगाते शेर, 
सुन्दर खग, मृग बड़े विशेष।
मन को सुख से भरता देश॥ 
 
प्रकृति बदलती रहती रूप,
बादल कहीं, कहीं पर धूप, 
सर्दी, गर्मी, रिमझिम मेह, 
सब सहती धरती की देह,
मिलता दृढ़ता का संदेश।
मन को सुख से भरता देश॥
 
सबके अपने अपने ठाठ,
सबके अपने पूजा-पाठ,
फिर भी रहते सब मिल साथ,
बढ़ते सदा मदद को हाथ,
भले अलग हों सबके भेष।
मन को सुख से भरता देश॥ 

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