करतूत राम की

01-10-2019

यह देखो करतूत राम की
यह देखो करतूत।

 

किया कबाड़ा सारा बिस्तर,
ही गीला कर डाला।
चड्डी पूरी हो गई गीली,
गीला हुआ दुशाला।
तकिया भी न रही काम की।

 

हमें उठालो चड्डी बदलो,
माँ को किए इशारे।
लगी ज़ोर से, मजबूरी थी,
कर दी सुबह सकारे।
हुई ज़रूरत, अब हमाम की।

 

माँ ने तकिए चादर बिस्तर,
दर्जन भर बनवाए।
मजबूरी के पल आयें तो,
कमी नहीं पड़ जाए।
चड्डी हैं "सौ" राम नाम की।

 

यह देखो करतूत राम की,
यह देखो करतूत।

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

किशोर साहित्य कहानी
बाल साहित्य कविता
किशोर साहित्य कविता
बाल साहित्य नाटक
बाल साहित्य कहानी
कविता
लघुकथा
आप-बीती
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में