युद्ध और शान्ति
सन्दीप तोमर
युद्ध समाप्ति के बाद
राष्ट्राध्यक्ष मिलेंगे गले,
कैमरों के सामने मुस्कुराएँगे,
विश्व शान्ति की दी जाएगी दुहाई।
नहीं जानना चाहता मैं
कौन थे वे जिन्होंने युद्ध थोपा,
मैं नहीं जानना चाहता
किन्होंने युद्ध रोका।
मैं ये भी नहीं जानना चाहता
युद्ध का उद्देश्य क्या था—
कितने किलोमीटर ज़मीन,
कितनी इंच सरहद,
कितनी रणनीति, कितनी विजय।
लेकिन मैं जानना चाहता हूँ
उन आँखों की लालिमा
जिन्होंने पति की मौत पर आँसू बहाए,
जो हर रात तकिये में मुँह छिपाकर
अब भी सिसकती हैं।
मैं जानना चाहता हूँ
उस माँ का दर्द
जिसने अपने आँचल का लाल खोया,
जिसके लिए राष्ट्रगान की धुन
अब शोकगीत-सी लगती है।
मैं जानना चाहता हूँ
उस बच्चे का सवाल
जो राष्ट्रीय झंडे में लिपटी देह को देख
पूछता है—
“वालिद कब उठेंगे?”
मैं देखना चाहता हूँ
उन खेतों की वीरानी
जहाँ हल की जगह बारूद बोई गई,
उन घरों की दीवारें
जो गोलियों के निशानों से
इतिहास लिखने को मजबूर है।
मेरी नज़र झुक जाना चाहती है उनके आगे
जो ज़रा नहीं लजा पाए
अपनी मातृभूमि का
सौदा करने में—
जो नक़्शों पर रेखाएँ खींचते रहे
और उन रेखाओं के नीचे
लाल रंग भरता रहा।
मैं पूछना चाहता हूँ—
क्या शान्ति केवल समझौते का शब्द है?
या उन क़ब्रों के बीच उगती
घास का साहस?
युद्ध के बाद
जब भाषण समाप्त होंगे
और झंडे फिर से आधे नहीं, पूरे फहराए जाएँगे,
तब कौन गिनेगा
उन अधूरी चिट्ठियों को
जो मोर्चे से लौटकर कभी नहीं आईं?
कौन सुनेगा
उन स्त्रियों की चुप्पी
जो सुहाग के साथ
अपना भविष्य भी दफ़ना आईं?
इतिहास विजेताओं का लिखा जाएगा—
यह मैं जानता हूँ।
पर स्मृतियाँ पराजितों की होंगी,
यह भी सच है।
मैं किसी राष्ट्र का पक्ष नहीं लेता,
मैं बस मनुष्य के पक्ष में खड़ा हूँ।
क्योंकि हर युद्ध में
मरती सीमाएँ नहीं—
मरता विश्वास है।
और शान्ति तब तक अधूरी है
जब तक किसी माँ की आँख
अपने बेटे की राह देखना
बंद नहीं करती।
1 टिप्पणियाँ
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8 Mar, 2026 07:23 PM
बेहद सार्थक सृजन! विचारणीय रचना!