बलम संग कलकत्ता न जाइयों, चाहे जान चली जाये

15-10-2023

बलम संग कलकत्ता न जाइयों, चाहे जान चली जाये

सन्दीप तोमर (अंक: 239, अक्टूबर द्वितीय, 2023 में प्रकाशित)

पुस्तक का नाम: बलम कलकत्ता 
लेखक: गीताश्री 
प्रकाशन वर्ष: 2021 
मूल्य: 201 रुपए 
प्रकाशक: प्रलेक प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड 
निबंधकार: संदीप तोमर

बिहार के मुजफ्फरपुर में जन्मी गीताश्री एक प्रतिष्ठित पत्रकार हैं, जिन्होंने सर्वश्रेष्ठ हिंदी पत्रकार (वर्ष 2008-2009) के लिए रामनाथ गोयनका पुरस्कार भी जीता है। अब तक उनके दस कहानी संग्रह, पाँच उपन्यास, स्त्री-विमर्श पर चार शोध पुस्तकें प्रकाशित हैं, चौदह किताबों का सम्पादन-संयोजन भी उनके नाम दर्ज है। वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘भूत-खेला’ एक चर्चित किताब रही है। अपनी इस पुस्तक के लिए उन्होंने बहुत सारे शोध किए। शिवना प्रकाशन से कथाकार गीताश्री के सम्पादन में रेखाचित्रों का एक महत्त्वपूर्ण संग्रह भी प्रकाशित हुआ था–‘रेखाएँ बोलती हैं’। शहरगोई (संस्मरण) भी इसी वर्ष प्रकाशित रचना है। 

गीताश्री के लेखन संसार पर बात करूँ तो कहना होगा कि गीताश्री औरत की आज़ादी और अस्मिता की पक्षधर लेखिका हैं। कॉलेज के दिनों में ही उन्होंने साहित्यिक लेखन की शुरूआत कर दी थी, उनका यह रचनात्मक सफ़र आज भी जारी है। उनकी चर्चित रचनाओं में कहानी-संग्रह ‘प्रार्थना के बाहर और अन्य कहानियाँ’, ‘नागपाश में स्त्री’, ‘कथा रंगपूर्वी’, ‘स्त्री को पुकारता है स्वप्न’, ‘23 लेखिकाएँ और राजेंद्र यादव’; कविता संग्रह ‘कविता जिनका हक'; स्त्री विमर्श ‘स्त्री आकांक्षा के मानचित्र’ और ‘औरत की बोली’; आदिवासी लड़कियों की तस्करी पर आधारित शोध ‘सपनों की मंडी’ और बैगा आदिवासियों की गोदना कला पर आधारित सचित्र शोध पुस्तक ‘देहराग’ शामिल है। उन्होंने बाल कहानी संग्रह ‘कल के क़लमकार’ और ‘हिंदी सिनेमा-दुनिया से अलग दुनिया’ जैसी पुस्तकों का संपादन भी किया है। ‘लेडिज सर्कल’, ‘लिट्टी चोखा’, ‘स्वप्न, साज़िश और स्त्री’, ‘भूत-खेला’, ‘हसीनाबाद’ जैसी कृतियों से हिंदी साहित्य में गीताश्री ने अपनी एक अलग ही पहचान बनाई। बंग राजा और मिथिला की राजनटी की प्रेम गाथा पर आधारित उनका हाल ही में प्रकाशित उपन्यास ‘राज-नटनी’ भी काफ़ी चर्चा में रहा, जिसका कारण उनका अनूठा लेखन ही है। कितनी ही दुश्वारियाँ नारी पात्रों के आगे मुँह बाये खड़ी होती हैं, उनका संघर्ष गीताश्री को आकर्षित भी करता है, झकझोरता भी है, उनके संघर्ष की गाथा को गीताश्री क़लम के माध्यम से आवाज़ देती हैं। 

गीताश्री द्वारा रचित कहानी संग्रह ‘बलम कलकत्ता’ का प्रकाशन प्रलेक प्रकाशन द्वारा किया किया गया। ‘बलम कलकत्ता’ में उनकी कुल जमा पंद्रह कहानियाँ शामिल हैं। इस संग्रह की लोकप्रियता का कारण इसमें शामिल विभिन्न रंगों की कहानियाँ हैं। 

इन सभी कहानी में सामान्य जीवन जीने वाले व्यक्तित्व को वे अपनी लेखनी के जादुई करिश्मे से उनके छोटे-छोटे कामों को बहुत अधिक बड़ा बनाकर पेश करती हैं। बक़ौल गीताश्री, “इनकी ओर हम अपनी भागती-दौड़ती ज़िंदगी में शायद ही ध्यान दे पाते हों; पर जैसे ही हमारी ज़िंदगी के कुछ पल इनके साथ जुड़ते हैं वे अपनी विशिष्ट जीवन दृष्टि से रचनाकारों को भी प्रभावित कर देते हैं। अक़्सर यह कह दिया जाता है कि मजबूरियाँ मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने देतीं, पर ये सामान्य जन अपनी आर्थिक-सामाजिक स्थिति में भले ही बहुत अधिक नीचे हों, पर मनुष्यता के पायदान पर ऊँचे खड़े दिखाई देते हैं। वे इस बात को रेखांकित करते हैं कि मनुष्यता का बीज असंवेदनशीलता, उपेक्षा और असमानता की बंजर चट्टानों को भी तोड़ कर उग आता है। इन सामान्य जनों में साहित्यकार हैं, बच्चे हैं, सड़क पर रेहड़ी लगाने वाले बुज़ुर्ग हैं, घरों में काम करने वाली स्त्रियाँ हैं, वाहन चालक हैं, शारीरिक रूप से विकलांग हैं, पर एक जज़्बा उन्हें विशिष्ट बनाता है, वह है हमेशा दूसरों के लिए कुछ न कुछ करते रहना। यह बात भी तय है कि ये सभी सामान्य जन शायद ही कभी किसी इतिहास की किताब में जगह पाएँ, पर वे शायद जीते ही इस तरह से हैं। साहित्य का काम यही तो है।” गीताश्री के उक्त कथन से उनके लेखन-संसार, उनकी लेखन-प्रक्रिया की झलक हमें मिलती है। 

गीताश्री की कहानियों में अलग-अलग परिवेश की सशक्त स्त्रियाँ हैं, जो स्वच्छंद जीवन जीती हैं। उनकी कहानियों में घरेलू काम करने वाली आम स्त्री है तो मल्टी-नेशनल कम्पनियों में रात की शिफ़्ट में बेहिचक नौकरी करने वाली स्त्री भी है, वह स्त्री जो पब में जाकर जाम का गिलास होंठों से सटा पुरुष सत्तात्मक समाज को चुनौती देती है कि आज की स्त्री तुमसे किसी काम में कम नहीं है, वह सिगरेट के कश लेते हुए ख़ुद को छुपाती नहीं बल्कि वह इसे स्टेट्स सिम्बल बनाती है। अगर यह विद्रोह है तो ये विद्रोह समय और समाज की माँग है, सामंतवाद के ख़िलाफ़ यह विद्रोह अनायास नहीं है, दरअसल, उन्होंने ख़ुद सामंती समाज की पाबंदियाँ झेली हैं, तभी उनकी कहानियों में यह विद्रोह बार-बार प्रस्फुटित होता है। लेकिन कहना न होगा कि ये विद्रोह उनके लेखन को काल्पनिकता से दूर कोरे यथार्थ की ओर उन्मुख करता है। गीताश्री कहती भी हैं, “मेरा विश्वास उस यथार्थ में है जो काल्पनिकता की गुंजाइश देकर ख़त्म हो जाए।” 

बलम कलकत्ता गीताश्री का ऐसा संग्रह है जो यह सवाल खड़ा करता है कि क्या समाज स्त्री-विमर्श को कभी स्त्री के नज़रिए से देखने, उसके भीतर झाँकने और उसे समझने का प्रयास करता है? क्या स्त्री-अस्मिता, उसके संघर्ष पर सवालिया निशान लगाने से पहले हम सभ्य समाज के नागरिक उसकी परिस्थितियों और मन:स्थितियों का जायज़ा लेने की ज़ुर्रत करते हैं? अधिकांश स्त्रियों का ऊपरी जीवन बहुत आनंददायी प्रतीत होता है परन्तु, उसका एक दूसरा पक्ष स्याह-काला भी है, जिस पर शायद ही कभी विचार किया गया हो? 

गीताश्री ने अपने कहानी संग्रह ‘बलम कलकत्ता’ में स्त्री-प्रेम, स्त्री-संघर्ष की ऐसी कहानियाँ लिखी हैं जिनमें, नारी जीवन के विविध पक्षों को बहुत सच्चाई के साथ प्रस्तुत किया गया है। पहली ही कहानी ‘बलम कलकत्ता पहुँच गए न’ एक ऐसी महिला की कहानी है जो शराबी पति से तंग आकर पति को छोड़ने का निर्णय ले बेटी और उसके प्रेमी के साथ रहना तय करती है। “नहीं हैं हम तुम्हारी पत्नी . . . सम्बन्ध ख़त्म . . . नहीं रहना तुम्हारे साथ . . . तुम आज़ाद, हम आज़ाद . . . हम जा रहे, बेटी के साथ।” (पृष्ठ-20), उसका यह निर्णय अनायास नहीं है, ज़िल्लत, तंगहाली, और पति के लालची स्वभाव के चलते उसके अंदर पकता हुआ लावा एक दिन स्वतः ही फूट पड़ता है, और वह जीवन को नए सिरे से प्रारम्भ करने का विचार कर बैठती है।” शान्ति ने बेख़ौफ़ होकर अपने आँचल से पहले बिंदी नोंच कर फेंक दिया, फिर लाला टुह-मुह सिंदूर की पूरी रेखा मिटाने लगी।” (पृष्ट-20) 

‘मन वसंत, तन जेठ’ औपन्यासिक शैली में लिखी गयी कहानी है, जिसमें आंचलिकता का भरपूर घालमेल है। ठेठ कथानक, ठेठ पात्र, ठेठ संवाद और पात्रों के नाम भी कहानी के अनुकूल, इस कहानी में लेखिका ने राजनीति, अंधविश्वास, ग्रामीण-समाज की सिनेमाई संस्कृति इत्यादि का भरपूर उपयोग करते हुए कहानी को उसके असल मुक़ाम तक पहुँचाने का काम किया है। कहानी में भारतीय राजनीति के एक कालखंड की नेत्री मायावती के शुरूआती समय की झकल भी मिलती है। ज़िले के एक नेता एक दिन गम्भीरता से, फुल्लो को राजनीति में आने के फ़ायदे समझने लगे। (पृष्ठ-27) ऐसा ही एक वाक़या काशीराम के साथ मायावती के पिता द्वारा उसकी मुलाक़ात का प्रचलित है। 

‘उनकी महफ़िल से हम उठ तो आए’ संग्रह की एक बेहतरीन और सशक्त कहानी है। एसिड अटैक विक्टिम से प्रेम, परिवार की वितृष्णा और उसके साथ माँ की एक धाविका के रूप में दमित इच्छाओं का संतुलित सामंजस्य इस कहानी की ताक़त है, स्त्री विमर्श पर जितना पढ़ा यह कहानी उन सब पर भारी पड़ती है। इस कहानी के संवाद पाठक के ज़ेहन में अंकित हो जाते हैं, “अजय, स्त्रियाँ, तब स्त्रियाँ कहाँ रह पाती हैं, जब वे किसी की माँ या बीवी, बहन होती हैं, वे उस वक़्त स्त्री होकर नहीं सोचती। अगर ऐसा करने लगे तो हमारी दुनिया ही बदल जाएगी। (पृष्ठ-48), “मेरा ये भी अनुभव है, हो सकता है, तुम्हें ऐन्टी-वीमेन लगे, अपने अनुभव से जाना कि औरतें, मर्दों की धाक मानती हैं, ज़िद छोड़ेंगी जब कोई मर्द मनाए। चाहे धौंस से चाहे मनुहार से। (पृष्ठ-48) 

गीताश्री ने माँ को इतना नज़दीक से विश्लेषित किया, अनुभव किया, वे जानती हैं कि माँ का हृदय गुनहगार बेटे को भी माफ़ कर देता है, और जब बेटा माँ को अपने पक्ष से, अपने सच से परिचित करा देता है तो वही माँ अपने जीवन में लाख बंधन सहकर भी अपनी औलाद के लिए सब बंधन तोड़ सकती है। “. . . उन्होंने आपको कुछ करने दिया। नौकरी करती थी आप, छुड़ा दिया . . . घर बैठा दिया . . . इन्हीं में अपने को ढूँढ़ो . . . इनके लिए मरो, जिओ . . . आप कहीं ग़ायब हो गयी हो माँ, वह लड़की ग़ायब . . . जो खेल के मैदानों में लंबी दौड़ की धावक थी . . .। (पृष्ठ-49) “अजय प्रसाद की माँ, बलदेव प्रसाद की पत्नी, कुमारी सरिता हवा हो गयी थी। दुपट्टा कमर में कस जो वो दौड़ी, अजय उनका मुक़ाबला न कर सका . . .।” (पृष्ठ-51) 

गीताश्री मानती हैं कि उम्र कोई मायने नहीं रखती, वे मिसेज दत्ता के माध्यम से कहती हैं, “एज, माई फुट” (पृष्ठ-49) उनका मानना है कि सोच स्थानीय होती है। स्थानीयता के हिसाब से सोचें बनती हैं। विचार बनते हैं। कुछ लोग जल्दी उम्र ओढ़कर सुकून महसूस करते हैं तो कुछ लोग उम्र ताक पर रखकर मस्त जीवन जीते हैं। 

गीताश्री दो संस्कृतियों के बीच नारी की स्थिति की महीनता से पड़ताल करती हैं, उनका नारीवाद देह के दायरे से बाहर स्त्री-स्मिता का नारीवाद है। वे स्त्री-मनोविज्ञान को जानती भी हैं और मानती भी हैं, “जवान बेटे की माँएँ ऐसे ही अकड़ती हैं। पति से ज़्यादा बेटे की बात सुनती हैं। (पृष्ठ-50) 

इस कहानी में स्त्री का एक और रूप गीताश्री ने प्रस्तुत किया है, “माँ को तकलीफ़ देकर हमें यह सम्बन्ध नहीं बनाना। मैं तुम्हें प्यार करती हुई जीवन काट सकती हूँ, एक माँ का अंतिम पुरुष, उसका बेटा ही होता है। उन्हें तुमसे अलग करने का पाप नहीं कर सकती। (पृष्ठ-51) एक स्त्री अपने प्यार का परित्याग इसलिए भी कर सकती है कि माँ रूपी स्त्री उस प्यार को स्वीकृति नहीं दे सकती। 

‘बाबूजी का बक्सा’ भी नारी-स्थिति को ही केंद्र में रखकर लिखी गयी कहानी है, “हमारे यहाँ बेटी ब्याह करते ही लड़की वाले लड़की को मुक्त कर देते हैं, दूसरे बाड़े की मवेशी हो जाती हैं। वहाँ के नियमों से हाँकी जाती हैं, मायके का हस्तक्षेप बंद। (पृष्ठ-58) इस कहानी का अंत एक बुज़ुर्ग व्यक्ति के जीवन के तमाम कष्टों के अंत के साथ हुआ है, मालिन की विधवा बेटी को आश्रय दिला लेखिका समाज के सामने एक विकल्प रखती है, जहाँ विधवा विवाह और बुज़ुर्गों के अपने परिवार से इतर निजी जीवन का समाधान है। 

‘सोलो ट्रैवलर’ में गीताश्री का स्त्रीवादी स्वरूप अधिक स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है, “मैंने मम्मी को बोल दिया है, वे जब चाहे मैं उनके साथ अलग रहने को तैयार हूँ। मैं कलह के उस माहौल में पढ़ाई पर एकाग्र नहीं रह सकती थी।” (पृष्ठ-114) 70 से 90 के दौर के जोड़ों की स्थिति ऐसी रही कि पिता के साथ माँ की वैचारिक पटरी न बैठने पर माँ के पास कोई विकल्प नहीं होते थे, स्त्री-शिक्षा और आर्थिक आत्म-निर्भरता से स्थिति में अवश्य ही कुछ बदलाव आया है। लेकिन लेखिका का स्पष्ट मानना है कि “बहुत सी स्त्रियों के पास विकल्प नहीं होते, ख़ास कर अधेड़वस्था में। कहाँ जाएँगी वे घर से निकल कर, उनके पास कुछ नहीं बचता है, ख़ाली हाथ, न उम्र न कोई सम्पत्ति। न माइका न रिश्तेदार। यही समय होता है जब बच्चे उसकी पूँजी होते हैं।” (पृष्ठ-115) इन सबका समाधान आर्थिक आत्मनिर्भरता में ही निहित है, जिस बारे में लेखकों, क़ानूनविदों, राजनीतिज्ञों, चिंतकों को सोचने की ज़रूरत है। 

‘ठोंकू गोसाईं नाच रहा था’ में एक कम उम्र लड़की का मोह एक यौन-विकलांग से दर्शाया गया है, कहानी में हालाँकि यौन-विकलांग विमर्श सीधे नहीं आया है लेकिन कहानी इस ओर बार-बार इशारा करती है। “हम औरत बनकर नाचते ज़रूर हैं, औरत थोड़े न हैं, लेकिन औरतन को समझते हैं। (पृष्ठ-81) 

गीताश्री के पास कहन का अपना तरीक़ा है, अपना अंदाज़ है। वह ख़ुद ज़्यादा रूल्स में विश्वास नहीं करती–“आई हेट दिस रूल्स एंड रेगुलेशन! कब समय आएगा, जब हमारे ऊपर फ्रेस्ट्रेटिड लोगों के कारण इतने फ़ालतू के रूल्स नहीं होंगे।” (पृष्ठ-105) “हम दोनों के भीतर तन्हाई की वजहें थीं। न वह बताती न मैं। मैं अपनी वाचालता से उसे ढँक देती थी और मधु अपनी ख़ामोशी से उसे छुपा देती थी। (पृष्ठ-87) 

कहीं-कहीं उनके लेखन पर कुछ अन्य लेखकों की छाप भी स्पष्ट दिखाई देती है। ‘एक तरफ़ उसका घर’ कहानी का कुछ हिस्सा मोपासां की कहानी ‘दी फादर’ से प्रभावित है, “ओह ठीक है, तुम्हारी माँ का असफल प्रेम विवाह हुआ तो क्या सबका होगा? बहुत डिप्रेसिंग है यह सब उनको समझाओ या मैं समझाऊँ।” (पृष्ठ-95) यह दृश्य गीताश्री अपने ज़माने की ट्रांसपोर्ट ‘मेट्रो’ में दिखाती हैं जबकि मोपासां अपने ज़माने की बस में। अक़्सर ऐसा होता है कि कुछ कहानियाँ हमारे ज़ेहन में अंदर तक पैठ जाती हैं, और जब कभी हम लिखते हैं तो अनुकूल पात्र के साथ वह सब जो हमारे अवचेतन का हिस्सा होता है, क़लम की ज़ुबान पर बैठ काग़ज़ पर उतरने लगता है। ऐसा ही इस कहानी के साथ हुआ प्रतीत होता है। यह कहानी हमें अधिक प्रगतिशील समाज की ओर भी ले जाती है, “. . . मेरी माँ आज भी एक अल्हड़ युवती है . . . उसे बहू की नहीं दोस्त की तलाश है जिसके साथ पंख लगा कर उड़ सके।” (पृष्ठ-97) 

‘मिस बोरिंग की रसीली दास्तान’ कहानी का आग़ाज़ एकदम अनोखे अंदाज़ में लेखिका ने किया है, यहाँ पिता का संवाद उनकी प्रगतिशीलता का वाहक बना है, “सबसे पहले तो वहाँ जाकर अपनी पढ़ाई का झण्डा गाड़ना चाहिए, फिर अपने व्यवहार से माहौल को अनुकूल बनाना चाहिए और फिर . . .।” इस ‘फिर’ में सारा ब्रह्मांड समाहित हो जाता है, जहाँ बच्चों के सामने अपने उदाहरण हैं, जीवन साथी चुनने की आज़ादी है। लेखिका के पास एक ग्रामीण समाज हैं जहाँ प्रेम-विवाह एक अजूबा है तो एक आधुनिक शहरी समाज है जहाँ माता-पिता ख़ुद सहयोगी हैं तो एक अति आधुनिक समाज भी है जहाँ, पब है, शराब है, सिगरेट है, लिव-इन का रोमांच है। 

गीताश्री के लेखन में एक महत्त्वपूर्ण बात ये है कि वे अपने लेखन में जो वक्तव्य प्रयोग करती हैं वे तमाम वक्तव्य एक उक्ति की तरह हो जाते हैं, “उनकी बेटी बहुत अंतर्मुखी है, लगभग असमाजिकता की हद तक।” (पृष्ठ-100), (हालाँकि यह वाक्य थोड़ा कांट्राडिक्ट्री लगता है) “मौन और एकांत दोनों महानगर में नहीं मिलते।” (पृष्ठ-101) “प्रेम विवाह की बलिवेदी है।” (पृष्ठ-114) “एक द्वीप दूसरे द्वीप की तलाश में कभी मिल नहीं पाते, बस तैरते रहते हैं।” (पृष्ठ-127) 

गीताश्री इस कहानी में एक साथ कई सवाल भी उठाती है, “अपने मौन और एकांत के साथ जीना क्या इतना बोरिंग होता है? क्या हम अपनी दुनिया नहीं चुन सकते, जहाँ किसी का हस्तक्षेप न हो।” (पृष्ठ-101) उनकी समस्या महानगर की ख़राब भाषा भी है, असल में दिल्ली महानगर में गीताश्री वह कल्चर खोज रही हैं जो यहाँ है ही नहीं, यहाँ भाषागत लिहाज़ ऊँट के मुँह में जीरा जितना ही है।” सबसे अधिक उसे दिक़्क़त होती, यहाँ के लोगों से बातचीत करने में। वह सबको आप बोलती, लोग उसे तू बोलते . . . अकेले बड़बड़ाती–‘तमीज़ नहीं है इनको।’ . . . बहुत तू तड़ाक करते हैं।” (पृष्ठ-101) 

क़स्बाई लड़कियाँ आधुनिक होकर भी अपने पुराने संस्कारों को नहीं छोड़ती, जबकि लड़के आधुनिकता में रमी लड़कियाँ ही पसंद करते हैं, “तुम्हारी सोच बड़ी पारंपरिक है यार . . . मुझे लगा तुम आधुनिक हो, रही तुम वही क़स्बाई लड़की . . .” (पृष्ठ 106) लेकिन लड़कियाँ आज भी प्रेमी को किसी से शेयर होते हुए नहीं देख सकती। वे आधुनिक तो हो जाती हैं लेकिन आम प्रेमिका का आवरण उन्हें प्रेमी के अन्य लड़कियों से बातचीत पर जलन से झुलसा देता है। जबकि लड़कों में वह वफ़ा नहीं दिखती, “अनुराग जैसा खिलंदड़ लड़का किस के साथ कब क्या कर जाये? उसका कोई भरोसा नहीं!” (पृष्ठ-108) “लड़कियाँ उसके लिए बस मज़े का साधन हैं, तभी तो अपने दिल को कबूतरखाना बना रखा है।” (पृष्ठ-108) कुल मिलकार यह एक अच्छी प्रेम कहानी है। 

‘सोलो ट्रेवलर’ का वे एक मनोवैज्ञानिक की तरह से लेखन करती हैं, “. . . एक तो मेट्रो में खड़े होने की जगह नहीं थी। किसी तरह बोगी नंबर चार में घुसी थी कि महिलाओं की बोगी में जगह मिले न मिले, कॉमन बोगी में महिला सीट लोग ख़ाली कर ही देते हैं . . .।” (पृष्ठ-111) गीताश्री को लगता है कि महानगर हँसी तक को अपने अंदर समेटकर रख लेते हैं, यहाँ हँसी को बचाकर रखना भी एक बड़ा काम है। “तन्वी ने अपनी हँसी दस सालों बाद भी बचाकर रखी है। वैसी ही निर्बाध हँसी। (पृष्ठ-112) लेकिन कहानी में कहीं उनसे मनोवैज्ञानिक चूक भी हुई हैं, “रोज़ की तरह उस दिन भी बस में बहुत भीड़ थी, तन्वी और नारायणी किसी तरह से मंडी हाउस से नोयडा सिटी सेंटर वाली चार्टर बस में घुसी और अपने गंतव्य पर उतरकर ही साँस ली . . .।” (पृष्ठ-112) मेट्रो के गेट पर कार्ड लगाते हुए तन्वी ने एकदम से नारायणी के कंधे पर हाथ मारा . . .।” (वही) इसी तरह से एक और प्रयोग देखा जा सकता है, “जयेश उसके कानों में फुसफुसाया था–हम 2000 में बिछड़े थे, ये 2019 है। इस बीच तुम्हारा कोई पता नहीं। कहाँ गुम हो गयी थी तन्वी?” (पृष्ठ-112) इस संवाद से स्पष्ट होता है कि तन्वी और जयेश का प्रेम 2000 या उससे पहले रहा, और 2000 उनके ब्रेकअप का साल था, लेखिका आगे लिखती हैं, “सुन कल तेरे एक्स ने मुझे प्रपोज़ किया . . .। किसने जयेश ने? . . . ओफकोर्स यार . . . मैंने उसकी बातों का स्क्रीन शॉट लेकर रखा है।” (पृष्ठ-113) तकनीकी की बात की जाये तो पहला स्मार्ट फोन 22 अक्तूबर 2008 को भारत में लॉन्च किया गया था यह एक एंड्रोइड फोन था। हालाँकि अमेरिका में आईबीएम ने 23 नवंबर 1992 को पहला स्मार्ट दे दिया था, कहानी का कथानक भारत की पृष्ठभूमि का होने के नाते ये संदेह हो जाता है कि लेखिका कहानी को लिखते हुए समय और तकनीकी के बारे में सचेत नहीं है। “दस साल बाद मिला है, पुराने अंदाज़ में बात कर रहा है, ज़रा भी नहीं बदला . . .।” (पृष्ठ-120) जबकि “2000 में बिछड़े थे हम” (पृष्ठ-112) यह सब आँकड़ा 19 साल से 10 साल कैसे हुआ ये पाठकों के समझ से बाहर की बात हुई। पुनः (पृष्ठ-122) “दस साल बाद इतने ज़ोर से ऐसा ठहाका लगाया है, जिसमें सारे विषाद झर जाते हैं।” 

‘उदास पानी में हँसी की परछाई’ में भी लेखिका मनोविज्ञान का भरपूर प्रयोग करती हैं, “तुम हँसना तो दूर . . . मुस्कुराती तक नहीं हो। एकदम ठस्स-सी लगती हो, तुम ऐसी क्यों हो? इतनी उदास . . . अपनी ज़िन्दगी से . . . अपनी उपस्थिति से . . . अपने होने से . . .।” ((पृष्ठ-123) 

उनकी चिंता जरवा समुदाय की जनजाति को लेकर भी है, वे कहती हैं, “इस सड़क ने जारवा आदिवासियों का बेड़ा गर्क़ कर दिया है। शिकारी आते हैं, अपने कपड़े छोड़ जाते हैं, इन्हें दे जाते हैं, जिन्हें ये पहन रहे हैं। कपड़े धोने की कला इन्हें नहीं आती है, बारिश, धूल मिट्टी से ये कपड़े उनके शरीर पर चिपक रहे हैं, गल रहे हैं, तरह-तरह की बीमारिययाँ हो रही हैं, ये मर रहे हैं ख़त्म हो जाएँगे एक दिन . . .” (पृष्ठ-123) यहाँ यह बात भी सामने आती है कि लेखिका ने इस कहानी को लिखने से पहले पूरा होमवर्क भी किया है। आदिवासी जीवन को बिना स्टडी किए निष्कर्षात्मक लिखना असम्भव ही है। 

लेखिका ने यहाँ जीवन के मनोविज्ञान को भी अपनाया है, वे सोनम के माध्यम से लिखती हैं, “मैं अपना दुःख किसी से शेयर नहीं करती। कोई दूर नहीं करता, दिल्ली जैसे शहर में तो किसी को फ़ुर्सत नहीं, लोग पूछते हैं, “हाऊ आर यू . . . जवाब में सिर्फ़ इतना सुनना चाहते हैं, फ़ाइन, फ़ाइन कोई नहीं होता।” (पृष्ठ-128), असल में किसी से हाल पूछना भी महज़ औपचारिकता ही है, शायद किसी को जवाब सुनना भी नहीं होता कि असल में इंसान कैसा है? बहुत दुःखी और परेशान व्यक्ति भी कहेगा–फ़ाइन। 

लेखिका की कितनी ही कहानियाँ दिल्लीवासियों को टार्गेट करती हैं, जहाँ दिल्ली की कल्चर, उनके रहन-सहन, उनकी आदतों इत्यादि पर कटाक्ष किया गया है, ऐसा प्रतीत होता है लेखिका ने दिल्ली वालों को काफ़ी गहराई तक स्टडी किया है, “मैं दिल्लीवाला नहीं हूँ। (पृष्ठ-128) सोचता हूँ क्या दिल्ली वाले वाक़ई इतने बुरे होते हैं, फिर वह मशहूर डायलॉग कैसे बना, “दिल्ली दिलवालों कि या फिर कंगालों की।” 

‘अदृश्य पंखों वाली लड़की’ भी एक बेहतरीन कहानी है, लेकिन इस कहानी में लेखिका कितनी ही बार लिखते हुए जजमेंटल हो जाती है। “संस्कारों की पोटली लड़कियाँ ही ढोती हैं।” (पृष्ठ-130) “लड़कियाँ वाइन ज़रा अदा से पीती हैं।” (पृष्ठ-134) “शादी के बाद तो लड़के यानी पति तो पत्नियों को स्पेस देने में यक़ीन नहीं रखते, उनकी सारी आज़ादी, सारे सपने हड़प लेते हैं।” (पृष्ठ-135) “दिल्ली में एक अकेली लड़की को घर नहीं मिलता।” (पृष्ठ-140) “दिल्ली तेज़ी से रंग देती है। अपने साथ बसने लायक़ बना देती है सबको।” (पृष्ठ-141) “आजकल तो शादीशुदा आदमियों की ही डिमांड है।” (पृष्ठ-153) हालाँकि इतनी बेबाकी भी गीताश्री के पास ही है कि वे बड़ी नज़ाकत के साथ घोर नारीवादी स्टेटमेंट दे सकती हैं। हालाँकि वे जल्दी ही इसके उलट स्टेटमेंट भी दे जाती हैं, वे पुरुषों की समस्या पर भी पुरज़ोर विचार करती हैं, “विवाह एक पुरुष के लिए दो विपरीत छोरों पर बँधी हुई रस्सी की तरह हो जाता है जिस पर चलते हुए पुरुष संतुलन बिठाता है, ज़रा सा चुके तो सीधे खाई में।” (पृष्ठ-136) 

इस कहानी की नायिका भी बंधनों से दूर अपने तरीक़े से ज़िन्दगी जीने में विश्वास करती है। वह विवाह के लिए तैयार नहीं है लेकिन उसका ट्रायल चाहती है। नायक के झिझकने पर वह कहती है, “जब मैं तैयार हूँ तो तुम्हें दिक़्क़त क्यों हैं।” (पृष्ठ-138) यहाँ गीताश्री एक प्रस्थापना स्थापित करती हैं, “बस यह प्रेम अलग होगा, प्रायोजित प्रेम, जब विवाह प्रायोजित हो सकता है, तो प्रेम क्यों नहीं। हम तो अपने सम्बन्धों की नींव प्रेम पर रख रहे। विवाह के नाम पर अपने अरमानों की क़ुर्बानी तो नहीं दे रहे।” (पृष्ठ-138) 

‘मन बँधा हुआ है पर जाल में नहीं हूँ’ में भी गीताश्री ने लिवइन की परिभाषाएँ गढ़ी हैं। साथ ही वे एक निर्णय तक नायक नायिका को पहुँचाती हैं, “हम अपने बीच कभी किसी तीसरे को पंचायत करने का मौक़ा नहीं देंगे।” (पृष्ठ-157) 

‘एक सर्द रात जो आग सी गरम थी’ कहानी की नायिका का प्रेमी छूटे चार-पाँच महीने हो गए हैं लेकिन गीताश्री पृष्ठ-159 पर कहती हैं, “उसके दफ़्तर में उसके सिंगल होने की ख़बर फैलते ही तरह-तरह की बातें होंगी।” यानी लेखिका को लगता है कि चार-पाँच महीने में ख़बर नहीं फैला करती उसके लिए अधिक वक़्त चाहिए। उनकी नायिका इतनी बोल्ड है कि वह सिंगल होने का स्टेट्स हटाना चाहती है, “पार्ट टाइम साथी तत्काल ढूँढ़ लेना चाहती थी। जिसके साथ कुछ वक़्त तो कटे।” (पृष्ठ-159) यह नायिका साथी को भी जॉब की तरह समझती है, एक छोड़ दूसरी लो, फ़ुल टाइम न मिलने तक पार्ट टाइम लो। यह नायिका अपने प्रेमी को बता देना चाहती है, “किसी के चले जाने से चमन ख़ाली नहीं होता।” (पृष्ठ-159) यह अलग तरह का नारीवाद है, जिसमें पुरुष अब उपभोक्ता नहीं बल्कि उपभोग की वस्तु भी है, यही उसकी परिणति भी है। वक़्त के बदलाव को गीताश्री कुछ इस तरह पेश करती हैं कि नारी पात्र अब शिकार नहीं बल्कि शिकारी भी है। 

गीताश्री के इस संग्रह की प्रत्येक कहानी स्त्री पात्र की सिर्फ़ वेदना और मजबूरी को नहीं दर्शाती वरन्‌ उसे एक निर्णायक स्त्री के रूप में पेश करती है। सभी परिस्थितियों और उनसे जूझने वाली महिलाओं के जीवन के स्याह पन्नों को लेखिका ने पाठकों, विशेष रूप से पुरुषों के सम्मुख उजागर करने का एक सफल प्रयास किया है। 

सभी कहानियों को पढ़ने और उसकी भाषा शैली पर विचार करने के उपरांत यह भी स्पष्ट होता है कि लेखिका के पास अपना एक कहन का अलग ही तरीक़ा है। लेखिका प्रत्येक कहानी में उसके पात्रों तथा उनके व्यक्तित्व के अनुसार ही भाषा का प्रयोग करती हैं। उनकी कहानियाँ विभिन्न स्थानों, वातावरण और पृष्ठभूमि के अनुसार विविध रूप धारण करती हुई दिखाई देतीं हैं। कहानी की आवश्यकता के अनुसार आम बोलचाल के शब्दों का भी प्रयोग किया गया है। 

अगर शिल्प की बात करें तो कहना होगा कि गीताश्री ने कहानी के लिए किसी विशेष शिल्प को नहीं अपनाया। उनकी कथा कहने की शैली इतनी सरल और सहज है कि उनके पात्र बड़े ही सहज-सरल शब्दों में संवाद करते हैं। लेखिका हर घटना का बड़ा सूक्ष्म विश्लेषण करती हैं, वाक्य विन्यास एकदम सहज है और संवाद कथा की माँग के हिसाब से ही प्रयुक्त किये गए हैं तथापि कुछ व्याकरणिक प्रयोग अवश्य ही चौंकाते हैं।” शान्ति ने बेख़ौफ़ होकर अपने आँचल से पहले बिंदी नोंच कर फेंक दिया।” (पृष्ठ-20) “औरतें, मर्दों की धाक मानती हैं, ज़िद छोड़ेंगी जबी कोई मर्द मनाए।” (पृष्ठ-48) “मैं अपनी वाचालता से उसे ढँक देती थी।” (पृष्ठ-87) “जल्द ही उनके वाइवा के बाद थीसिस सबमिट हो जानी थी।” (पृष्ठ-104) नियमतः थीसिस सबमिट होने के बाद वाइवा का प्रावधान है शायद, लेखिका ने प्री-सबमिसन (पीएचडी कोलोकियम) कहना चाहा हो।” . . . तू न सुन कर पागल हो जाओगी।” (पृष्ठ-113) “इतनी बातें तूने कभी बताया नहीं तन्वी।” (पृष्ठ-115) “यू विल हैव तो कम टू मी . . .।” (पृष्ठ-119) “तन्वी ग़ुस्से में लाइब्रेरी से बाहर निकल कर यूनिवर्सिटी में आ गयी।” (पृष्ठ-119) मुझे लगा था कि लाइब्रेरी ख़ुद यूनिवर्सिटी का हिस्सा होती है और वह यूनिवर्सिटी में ही होगी।” क्या वह सचमुच पति के जुटाए सुविधाओं की ग़ुलाम बन गयी है . . .।” (पृष्ठ-126) “वह औरत रगों में रोशनी दौड़ती है . . . जिसे प्यार और अपनेपन की दरकार है . . .।” (पृष्ठ-126) 

कुछ प्रयोग एकदम सही होते हुए भी चौंकाते हैं, “उसने भी हवाओं में सवाल उछाल दिया।” (पृष्ठ-102) “मैं इस समंदर के ठहरे पानियों-सी उदास पानी हूँ।” (पृष्ठ-128) “. . . पिछले कुछ वक़्तों से ख़ामोशी हावी हो गयी थी।” (पृष्ठ-128) “तुम्हें आदत डाल लेना चाहिए।” (पृष्ठ-145) आदत स्त्रीलिंग शब्द है ज्सिके साथ लेना की जगह लेनी शब्द अधिक उपयुक्त है।” दोनों सड़कें से समान खींचते हुए होस्टल की तरफ़ चलने लगे थे।” (पृष्ठ-147) “मल्टीनेशनल कंपनी जितना पैसा देते हैं, उससे ज़्यादा ख़ून पी जाते हैं।” (पृष्ठ-152) 

इधर अंग्रेज़ी शब्दों का हिन्दी बहुवचन भी ख़ुश चलन में आया है, गीताश्री भी इससे अछूती नहीं हैं, “. . . तो क्या आंटियों से करेंगे।” (पृष्ठ-143) 

गीताश्री स्त्रीवादी लेखन की एक बड़ी कथाकार हैं, उनका अन्य लेखकों-लेखिकाओं से टकराव सोशल मीडिया पर जितना देखा सुना जाता है, वैसा ही कुछ टकराव उनकी कहानी पढ़ते हुए पाठक अपने भीतर भी महसूस करने लगता है। तमाम तरह की सत्‍ताओं से टकराने वाली लेखिका की ख़ूबी है कि वह पितृसत्‍ता की कंडीशनिंग से साफ़ बच गयी हैं। यह कंडीशनिंग उन्हें छू नहीं पाती। 

इस समय हिंदी साहित्‍य में ही स्‍त्री रचनाकारों की एक साथ तीन पीढि़यां रचनारत हैं। एक के अनुभव में पेंटी-ब्रा का वर्णन मुखरता से दर्ज होता है, जिन्हें ब्रा पहनना। न पहनना साहित्य का अनिवार्य अंग लगता है। दूसरी पीढ़ी वह है जो पित्रसत्ता के साथ साथ चलने में अपना साहित्यिक हित खोजती है। तीसरी पीढ़ी वह है जो नारिवाद को अलग पहचान देने में प्रयासरत है और सफल भी। यह तीसरी पीढ़ी संभवतः इस धारणा को मानती है कि यह किसी भी स्‍त्री के निजी कम्‍फर्ट लेवल पर निर्भर करता है कि वह ब्रा पहने या न पहने। गीताश्री के लेखन के आधार पर उन्हें इस तीसरी पीढ़ी में शामिल करना अधिक न्यायोचित होगा। यही बात उनका कहानी संग्रह “बलम कलकत्ता” को पढ़कर भी सही साबित होती है। 
 

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