इंसानियत ज़िन्दा है
सन्दीप तोमर
आईटीओ से लौटते हुए रात कुछ थकी हुई थी, पर शहर अब भी जाग रहा था। मिंटो रोड पर उसने स्कूटर रोका—बस डिक्की से एक थैला निकालना था, जिसमें शाम की मिली शील्ड सुरक्षित रखी जा सके। वह जैसे ही दोबारा बैठा, एक बाइक उसके पास आकर रुकी।
“सर, कोई दिक़्क़त है? स्कूटर स्टार्ट नहीं हो रहा क्या?”
उसने मुस्कराकर कहा—“नहीं, सब ठीक है . . . बस थैला निकाल रहा था।”
लड़का थोड़ा संकोच से हँसा—“सर, आपकी शक्ल . . . कपिल शर्मा शो के एक एक्टर से मिलती है।”
वह हँसा, धन्यवाद कहा। लड़का चला गया, जैसे कोई छोटी-सी ज़िम्मेदारी निभाकर हल्का हो गया हो।
स्कूटर आगे बढ़ा, पर मन वहीं ठहर गया।
उसे याद आया—एक दिन पेट्रोल ख़त्म हो गया था। सड़क सूनी थी, और दूरी लंबी। तभी एक अनजान व्यक्ति ने अपनी बाइक से पैर लगाकर उसे धक्का दिया था—पूरे रास्ते, उस पेट्रोल पंप तक, जो उसके रास्ते में भी नहीं था।
और उसे अपनी आदत भी याद आई—स्कूटर में रखी छोटी-सी पेट्रोल की बोतल। जब भी कोई फँसा मिलता, वह दे देता। पैसे की बात होती तो वह मुस्कराकर कहता—
“किसी और की मदद कर देना . . . वही क़ीमत है।”
स्कूटर अब घर के क़रीब था, पर उसके भीतर एक और सफ़र चल रहा था—यादों का, एहसासों का।
लोग कहते हैं—इस शहर में संवेदनाएँ नहीं बचीं।
वह हर बार सोचता है—शायद वे लोग जल्दी में होते हैं, इसलिए देख नहीं पाते।
क्योंकि उसे तो अक्सर ऐसे लोग मिल जाते हैं—जो बिना वजह रुकते हैं, बिना मतलब मदद करते हैं, और बिना नाम बताए आगे बढ़ जाते हैं।
उसने घर के बाहर स्कूटर रोका, शील्ड को थैले में सँभाला, और आसमान की ओर देखा—जैसे किसी अनदेखे चेहरे को धन्यवाद कह रहा हो।
धीरे से उसके होंठ हिले—
“मेरा मक़सद प्यार बाँटना है . . .
मेरा पैग़ाम मोहब्बत है, जहाँ तक जाए . . . ”
और उस रात, दिल्ली थोड़ी कम भीड़भाड़ वाली लगी—क्योंकि उसमें इंसानियत थोड़ी और बढ़ गई थी।