वेकेशन का सदुपयोग
स्नेहा सिंह
ढोलू और भोलू दोनों मित्र देवपुर में रहते थे। उनकी परीक्षा समाप्त हो चुकी थी और छुट्टियाँ पड़ गई थीं। इसलिए वे टीवी देखने में मज़ा लेने लगे। जब टीवी से ऊब जाते तो मोबाइल पर गेम खेलने लगते। पूरा दिन तरह-तरह के नाश्ते करते रहते और आलसी की तरह पड़े रहते।
उनका यह व्यवहार देखकर ढोलू के दादाजी चिंतित हो गए कि इनका पूरा वेकेशन आलस में ही बीत जाएगा और ये आलसी बन जाएँगे। उन्होंने सोचा कि इन्हें किसी न किसी गतिविधि में लगाना ही पड़ेगा।
उन्होंने दोनों को पास बुलाकर कहा, “बेटा, यह वेकेशन कुछ नया सीखने और प्रकृति से दोस्ती करने का समय है। अगर तुम इसका सही उपयोग करोगे, तो यह छुट्टियाँ तुम्हें ज़िन्दगी भर याद रहेंगी।”
ढोलू बोला, “दादाजी, हम क्या करें?”
दादाजी ने कहा, “हमारे घर के पीछे थोड़ी-सी ख़ाली जगह है। उसमें तुम एक बग़ीचा बनाओ। दोपहर में चित्र बनाओ, कहानी की किताबें पढ़ो और काग़ज़ से नए-नए खिलौने बनाना सीखो।”
अगले दिन से ढोलू और भोलू टीवी देखने नहीं बैठे। उन्होंने आँगन में मिट्टी समतल की और दोपहर में चित्रकला की। भोलू छोटी-छोटी कहानी की किताबें लेकर आया और पढ़ने लगा। उन्हें पढ़ते देख उनके दोस्त कल्लू, मीना और चंची भी किताबें पढ़ने लगे। ढोलू काग़ज़ से खिलौने बना रहा था। तभी राजू आकर बोला, “अभी बहुत गर्मी पड़ रही है। चलो, हम पक्षियों के लिए पानी के बरतन बनाते हैं।”
“लेकिन बरतन कहाँ से लाएँगे?” चंची ने पूछा।
राजू बोला, “हम डिब्बे और लकड़ी के टुकड़े इकट्ठे करें, उन्हें रंगकर सुंदर पक्षी-घर बनाएँ और फिर कुम्हार बंसी के यहाँ से मिट्टी के बरतन ले आएँ।”
“तुम सही कह रहे हो, राजू। पहले पक्षी-घर बनाते हैं और फिर बरतन लाते हैं,” ढोलू बोला।
सभी बच्चों ने मिलकर पक्षी-घर तैयार किए और फिर मिट्टी के बरतन भी ले आए। तब तक शाम हो गई, इसलिए वे मैदान में खेलने चले गए। उन्होंने लंगड़ी, खो-खो और पकड़म-पकड़ाई जैसे खेल खेले। ढोलू और भोलू को मोबाइल गेम्स से ज़्यादा इन खेलों में मज़ा आया।
अगले दिन बच्चों ने पेड़ों पर पक्षी-घर और पानी के बरतन टाँग दिए। उनमें थोड़ा-सा दाना भी रखा। कुछ ही समय बाद चिड़िया, कबूतर और अन्य पक्षी चहचहाने लगे।
बच्चों ने तय किया कि वे रात में घर-घर जाकर बचा हुआ खाना इकट्ठा करेंगे और उसे साफ़ जगह पर रखेंगे, ताकि जानवरों को भी भोजन मिल सके।
इस तरह बच्चों को वेकेशन में बहुत अच्छी गतिविधियाँ मिल गईं। सुबह बग़ीचे में काम करते, फिर पक्षियों के लिए पानी और दाना रखते। दोपहर में चित्र बनाते, कहानियाँ पढ़ते और खिलौने बनाते। शाम को मैदान में खेलते और रात में बचा हुआ खाना इकट्ठा करके एक जगह रखते। फिर रात में बातें करते-करते सो जाते।
एक रविवार को दादाजी की मदद से ढोलू, भोलू और उनके दोस्तों ने अपने पुराने लेकिन पहनने योग्य कपड़े, कहानी की किताबें और खिलौने इकट्ठा किए। वे पास की एक बस्ती में गए, जहाँ ग़रीब बच्चे रहते थे। वहाँ जाकर उन्होंने ये चीज़ें बाँट दीं। कपड़े, खिलौने और किताबें देखकर ग़रीब बच्चे इतने ख़ुश हुए कि सभी दोस्तों का दिल भर आया।
इस तरह ढोलू और भोलू के साथ उनके दोस्तों ने भी वेकेशन का सही उपयोग किया। कुछ ही हफ़्तों में बग़ीचे में फूल खिल उठे। यह देखकर दादाजी बोले, “देखो, तुम सबकी मेहनत कैसे खिल उठी है! इसकी ख़ुशबू और भी बच्चों के लिए प्रेरणा बनेगी।”
यह सुनकर ढोलू, भोलू और उनके सभी दोस्त बहुत ख़ुश हो गए।
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