नियति

स्नेहा सिंह (अंक: 294, अप्रैल प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

अहमदाबाद रेलवे स्टेशन से दिल्ली जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस धीरे-धीरे गति पकड़ रही थी। खिड़की के पास बैठी नियति प्लैटफ़ॉर्म को दूर जाते हुए देख रही थी। डिब्बे में सभी यात्री अपनी-अपनी बर्थ पर जा चुके थे। नियति के ठीक सामने वाली लोअर बर्थ ख़ाली थी। साबरमती स्टेशन से लगभग पचास साल की उम्र के, क़रीब छह फ़ुट लंबे जनक दवे डिब्बे में चढ़े। व्यवसाय की एक महत्त्वपूर्ण बैठक के लिए गवे कई सालों बाद उस दिन सुबह ही दिल्ली से अहमदाबाद आए थे और अब वापस दिल्ली लौट रहे थे।

जनक ने हाथ में पकड़ी अटैची सीट के नीचे रखी, सीट नंबर देखा और नियति के ठीक सामने बैठ गए। अचानक उनकी नज़र सामने बैठी एक युवा लड़की पर पड़ी, जो खिड़की के बाहर अँधेरे में भी दूर तक देख रही थी। जनक को उसकी बड़ी-बड़ी आँखें और देखने का अंदाज़ कुछ जाना-पहचाना लगा। दोनों की नज़रें मिलीं तो लड़की ने हल्की-सी मुस्कान दी। जनक को उसकी मुस्कान भी बेहद परिचित लगी।

आज वह लड़की उन्हें पहली बार दिख रही थी, फिर भी क्यों लग रहा था कि उसे कहीं पहले देखा है?

पूरे दिन की भागदौड़ से बेहद थके होने के बावजूद जनक को नींद नहीं आ रही थी। उनकी आँखों में नींद की जगह अतीत ने ले ली थी।

इसी अहमदाबाद में सालों पहले वह बारात लेकर क्षमा से विवाह करने आए थे। अरे, अचानक क्षमा क्यों याद आ गई? इतने सालों बाद?

अहमदाबाद का माहौल तो इसका कारण नहीं हो सकता।

आख़िर जनक के व्यथित मन ने कारण पकड़ ही लिया। सामने वाली सीट पर बैठी वह युवती बिलकुल क्षमा जैसी दिख रही थी। उसका नम्र चेहरा, बड़ी-बड़ी आँखें और देखने का अंदाज़, सब कुछ क्षमा की याद दिला रहा था।

जीवन में कुछ रिश्ते आकाश से टूटते हुए तारे की तरह अचानक टूट जाते हैं। क्षमा को घर छोड़े भी लगभग पच्चीस वर्ष हो चुके थे। इतने वर्षों में जनक ने कभी क्षमा को याद नहीं किया था। क्षमा जनक की पत्नी थी। नाम के अनुसार ही वह गुणवान थी और सभी को क्षमा कर देने में विश्वास रखती थी। पति-पत्नी अलग हुए तब भी उसने केवल इतना ही कहा था, “जनक, भगवान आपको सुखी रखें।”

लेकिन उस समय जनक को उसकी बात सुनने में बिलकुल रुचि नहीं थी। वह मोहित हो चुका था अपनी पर्सनल सेक्रेटरी मोनिका के मोहजाल में।

हमेशा छोटे और आधुनिक कपड़े पहनकर ऑफ़िस आने वाली मोनिका जनक के जीवन में जैसे मेनका बनकर आई थी। मोनिका की अदाओं के सामने जनक को अपनी पत्नी क्षमा गाँव की सीधी-सादी स्त्री लगने लगी थी।


एक विवाहित पुरुष का किसी दूसरी स्त्री से सम्बन्ध प्रेम नहीं, बल्कि एक अफ़ेयर ही कहलाता है। जनक और मोनिका के इस सम्बन्ध का गवाह दिल्ली का दिल्ली गेट और कनाट प्लेस था। उनका आकर्षण दिल्ली की सड़कों की तरह उफन रहा था।

बॉस और पर्सनल सेक्रेटरी के रिश्ते सारी सीमाएँ पार कर चुके थे।

इस बात का पता क्षमा को बहुत देर से चला। तब वह गर्भावस्था के पाँचवें महीने में थी। फिर भी वह हमेशा के लिए मायके लौट गई। झगड़ा करना उसके स्वभाव में ही नहीं था। गर्भवती बेटी को हमेशा के लिए घर लौटी देख पिता बलवंतराय व्याकुल हो उठे थे। कोई भी पिता अपनी बेटी का दुख नहीं देख सकता।

लेकिन क्षमा की बात सुनकर वे गहरे विचार में डूब गए थे। उसने पिता से कहा था, “पापा, जिस आदमी को अपनी पत्नी से ज़्यादा किसी दूसरी स्त्री में दिलचस्पी हो, उसे ज़बरदस्ती पकड़कर रखने का क्या मतलब? शायद नियति ने हमारा साथ यहीं तक लिखा था।”

“लेकिन बेटा, समाज . . .?” माँ ने धीमे से कहा।

“मैं जनक की निशानी को जन्म दूँगी और उसे बड़ा करूँगी। बेटा हो या बेटी, मैं उसी को केंद्र में रखकर जी लूँगी। पापा, मैं वादा करती हूँ, मैं जल्द ही अपने पैरों पर खड़ी होकर दिखाऊँगी।”

बलवंतराय ने मन-ही-मन अपनी बेटी के साहस को सलाम किया।

नियति के जन्म के कुछ समय बाद ही क्षमा ने पिता के घर की ऊपरी मंज़िल पर ख़ाली कमरे में बेबी-सिटिंग शुरू कर दी। उसका जीवन फिर से सक्रिय हो गया।

नियति जितनी तेज़ी से बड़ी हो रही थी, उससे कहीं ज़्यादा तेज़ी से उसकी समझ विकसित हो रही थी। उसने कभी अपनी माँ से पिता के बारे में पूछकर उन्हें दुखी नहीं किया।

समय का चक्र घूमता गया। नियति ने फ़ैशन डिज़ाइनिंग के मास्टर कोर्स में गोल्ड मैडल प्राप्त किया। दिल्ली की एक प्रसिद्ध कंपनी ने उसे बहुत अच्छे वेतन पर नौकरी की पेशकश की, जिसे उसने तुरंत स्वीकार कर लिया।

नौकरी ज्वाइन किए तीन महीने हो चुके थे। उसने माँ से दिल्ली आने का बहुत आग्रह किया, लेकिन जिस शहर में उसके विवाह के सारे सपने टूटे थे, वहाँ वापस रहने जाना क्षमा को स्वीकार नहीं था।

आख़िरकार नियति दिल्ली में पेइंगगेस्ट के रूप में रहने लगी।

ट्रेन तेज़ रफ़्तार से दौड़ रही थी और डिब्बा हल्का-सा हिल रहा था। ठीक उसी तरह जनक के विचार भी डगमगा रहे थे।

क्या यह लड़की सच में क्षमा की बेटी हो सकती है? क्षमा के जाने के बाद उन्होंने कभी उससे संपर्क ही नहीं किया था। बस एक बार किसी रिश्तेदार से सुनने में आया था कि क्षमा ने बेटी को जन्म दिया है। लेकिन तब तक जनक मोनिका के साथ रहने लगे थे। मोनिका के साथ रहते हुए जनक को एक दिन बड़ा झटका लगा था, जब मोनिका ने बिना पूछे ही गर्भपात करा लिया।

उन्हें वह बातचीत याद आ गई। उसने कहा था, “जनक, बच्चा पैदा करके मैं अपना सुंदर फ़िगर ख़राब नहीं करना चाहती।”

“मोनिका, मातृत्व तो ईश्वर का दिया हुआ अनमोल वरदान है।”

“जनक, मुझे वरदान नहीं, सिर्फ़ वर चाहिए,” इतना कहकर मोनिका उनसे लिपट गई थी। उसके आकर्षण से निकलना जनक के लिए असंभव हो गया था।

उसने अपने सौंदर्य के जाल से जनक को इस तरह बाँध लिया था कि जनक ने अपना फ़्लैट ही नहीं, सारी सम्पत्ति भी उसके नाम कर दी थी।

समय बीतता गया। मोनिका मालिकिन बन गई और जनक केवल उसका नाममात्र का पति रह गया।

युवावस्था का उन्माद अक्सर मनुष्य से सबसे बड़े अन्याय करवा देता है।

जनक ने भी क्षमा के साथ वही किया था।

उम्र बढ़ने के साथ-साथ जनक के बाल सफ़ेद होते गए। उसी तरह अहमदाबाद में क्षमा के बाल भी सफ़ेद हो गए होंगे। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि जनक क्षमा को भूलकर जीते रहे, जबकि क्षमा जनक के साथ बिताई कुछ यादों के सहारे जीवन जीती रही।

उसका सरल और शांत जीवन किसी तपस्या से कम नहीं था। उसने अपनी नियति स्वीकार कर ली थी। शायद इसलिए उसने अपनी बेटी का नाम भी नियति रखा था।

अचानक ट्रेन झटका खाकर रुकी। ओखला स्टेशन आ गया था। अधिकतर यात्री उतर गए थे। अब डिब्बे में केवल जनक और नियति ही रह गए थे। जनक अनायास ही उसे देख रहे थे। कभी-कभी नियति भी उनकी ओर देख लेती थी और हल्की मुस्कान दे देती थी।

जनक के चेहरे पर पूरी रात के विचारों की थकान थी। इतने सालों बाद पहली बार उन्हें अपराधबोध हो रहा था।

कुछ ग़लत फ़ैसले जीवन भर मनुष्य को थका देते हैं। जनक जानते थे कि जीवन की बाज़ी में कभी किसी को तीन इक्के नहीं मिलते, लेकिन जो पत्ते मिलते हैं उनमें कौन-सा सँभालना है और कौन-सा छोड़ना है। अगर इसमें भूल हो जाए तो आदमी हार जाता है।

जनक भी हारे हुए जुआरी की तरह महसूस कर रहे थे। आख़िरकार दिल्ली आ गया। डिब्बे से उतरते समय जनक ने आख़िरी बार नियति की ओर देखा। नियति ने भी साहस के साथ उनकी आँखों में देखा।

जनक की आँखें भर आईं। उनके मुँह से अनायास निकल पड़ा, “सॉरी बेटा, मेरी भी एक बेटी है। हम कभी मिले नहीं। शायद वह भी तुम्हारी ही तरह दिखती होगी, इसलिए मैं तुमसे नज़र नहीं हटा पा रहा था।”

नियति ने शांत स्वर में कहा, “आप बेकार दुखी हो रहे हैं। जीवन भी इस ट्रेन जैसा ही है। कौन-सा यात्री किस स्टेशन पर उतरकर अलग हो जाएगा, यह नियति पहले ही तय कर देती है। मैंने भी अपने पापा को कभी नहीं देखा। बस अपनी माँ की आँखों में देखा है। बिलकुल आपके जैसे ही दिखते हैं। गुडबाय, मिस्टर जनकराय दवे।”

इतना कहकर नियति तेज़ी से दिल्ली की भीड़ में खो गई।

जनक चौंक गए। उनके दिमाग़ में बिजली-सी कौंधी। वह दौड़कर डिब्बे के पास गए और आरक्षण चार्ट देखा। अपनी सीट के सामने वाली लड़की का नाम पढ़ा, “नियति जनक दवे।”

नाम पढ़ते ही कुछ पल के लिए जनक की आँखों के आगे अँधेरा छा गया। अब उनकी समझ में आ गया कि नियति अहमदाबाद स्टेशन से चढ़ते समय ही चार्ट में यह पढ़ चुकी थी कि सामने की सीट पर कौन आने वाला है। शायद इसीलिए वह पूरे आत्मविश्वास के साथ मुस्कुरा रही थी। और नियति ने क़िस्मत द्वारा बनाई गई इस अनोखी परिस्थिति का सामना भी मुस्कुराते हुए ही किया था।

आख़िर वह क्षमा की बेटी थी।

दिल्ली की भीड़ और शोर के बीच जनक एक भयानक अकेलेपन में डूब गए। 

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