रिश्तों की दरारें और सोशल मीडिया का अदृश्य हाथ

01-01-2026

रिश्तों की दरारें और सोशल मीडिया का अदृश्य हाथ

स्नेहा सिंह (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

क्या एल्गोरिद्म हमारी नज़दीकियाँ खा रहे हैं? हम अक्सर दिल के उन अनकहे कोनों में झाँकते हैं, जहाँ जीवन अपने असली रंगों में दिखाई देता है। यह विषय भी कुछ ऐसा ही है, नर्म, नाज़ुक, पर बेहद ज़रूरी। क्योंकि यह हमारे समय की सबसे चुपचाप बदलती हुई सच्चाई है सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म और रिश्तों के बीच घुसपैठ। 

क्या सचमुच मशीनों की यह अदृश्य चाल हमारी थोड़ी सी हँसी, कुछ पल की नाराज़गी और जीवन की बड़ी-बड़ी असलियतों को प्रभावित कर रही है? आइए धीरे-धीरे इस परत को खोलते हैं। 

डिजिटल चमक और दिल के अँधेरे कोने

अभी कुछ दिन पहले एक पाठक ने लिखा था कि “हम एक कमरे में रहते हैं, पर लगता है जैसे दो अलग-अलग ग्रहों पर हों।”  क्या यह सिर्फ़ एक घर की कहानी है या आज के बहुत से घरों की? सोशल मीडिया की चमकती स्क्रीनें हमें ऐसा भ्रम देती हैं कि जितनी रोशनी उनमें है, उतनी ही हमारे भीतर भी होगी। लेकिन यह रोशनी कई बार इतनी तेज होती है कि आसपास की असलियतें धुँधली पड़ने लगती हैं। 

एल्गोरिद्म बड़ी चालाकी से वही दिखाते हैं, जो हम देखना चाहते हैं और धीरे-धीरे हमें इस तरह अपने घेरे में ले लेते हैं कि हम वास्तविक दुनिया से अधिक समय वर्चुअल दुनिया में बिताने लगते हैं। और यही वह बिंदु है जहाँ रिश्तों की पेंच ढीली होने लगती है। 

एल्गोरिद्म का मनोविज्ञान—हमें वही दिखाना, जिसे हम बारबार देखें

सोचिए जब कोई चीज़ आपको बहुत पसंद आती है, किसी का ख़ूबसूरत घर, किसी का छुट्टियों का वीडियो, किसी का रोमांटिक जोड़ा तो एल्गोरिद्म इसे एक संकेत की तरह लेता है। वह कहता है कि अरे, इन्हें यह पसंद है, इन्हें यह और दिखाओ। 

और फिर शुरू हो जाती है एक निरंतर बरसात फोटो की, वीडियो की, चमकदार जीवनशैली की, तुलना की और अंततः बेचैनी की। 

तुलना, रिश्तों का अदृश्य ज़हर

दूसरों की ख़ुशियाँ हमें अच्छी लगती हैं। लेकिन जब वह तुलना में बदल जाए तो वही तस्वीरें मन में सवाल पैदा करने लगती हैं कि हमारा रिश्ता ऐसा क्यों नहीं? हम इतने ख़ुश क्यों नहीं दिखते? लोगों को हम कम क्यों दिखते हैं? धीरे-धीरे मन में एक छोटा सा क्रोध, थोड़ा सा अविश्वास और एक लंबी सी ख़ामोशी जन्म लेने लगती है और रिश्ते खिसकने लगते हैं। 

फोन की रोशनी और घर की बुझती बातचीत

कभी-कभी यह रोशनी कुछ ज़्यादा ही तेज़ हो जाती है। ड्राइंगरूम में बैठी दो पीढ़ियाँ, एक टीवी देख रही है दूसरी फोन। पत्नी खाना परोस रही है, पति नोटिफ़िकेशन देख रहा है। 

बच्चा पास में है, पर पूरे मन से दूर। 

रिश्ते ढहते नहीं, वे बस धीरे-धीरे कम होते चले जाते हैं। 

“सुन रहे हो . . .?” एक समय था जब यह सवाल बातचीत की शुरूआत होता था। आज यह प्रश्न इंटरनेट कनेक्शन से जुड़ा लगता है, “नेट चल रहा है?” घर में मौजूद सबसे महत्त्वपूर्ण कनेक्शन आपसी रिश्ते सबसे कम इस्तेमाल होने वाला कनेक्शन बन जाते हैं। 

जब ऑनलाइन दुनिया, ऑफ़लाइन धैर्य को चुरा लेती है

मानव मस्तिष्क डोपामिन का आदी जल्दी बन जाता है। नोटिफिकेशन की हल्की-सी आवाज़, किसी का लाईक, किसी की प्रतिक्रिया, ये सब क्षणिक आनंद देते हैं। परन्तु यह आनंद असली नहीं होता। यह सिर्फ़ हमें बारबार वहाँ लौटने के लिए खींचता है। और इसी खिंचाव में धैर्य घटता है, चिड़चिड़ापन बढ़ता है, इंसान जल्दी नाराज़ होता है और रिश्तों की मिठास में अनजाने में कड़वाहट घुलने लगती है। 

उन छोटी बातों के बड़े झगड़े

सोशल मीडिया सिर्फ़ समय नहीं, कई बार ग़लतफ़हमियाँ भी चबा जाता है। 

किसी का पुराना दोस्त एक पोस्ट पर हँसते हुए इमोजी डाल दे, किसी की तस्वीर पर तारीफ़ आ जाए, किसी चैट को साथी देख ले, एल्गोरिद्म तो सिर्फ़ इंगेजमेंट बढ़ाना जानते हैं। वह यह नहीं समझते कि इस बढ़े हुए इंगेजमेंट से दो इंसानों के बीच की समझ कम हो सकती है। रिश्ते ईंट से नहीं बनते वे भरोसे से बनते हैं। और भरोसा हिलने में सेकंड भी नहीं लगता। 

डिजिटल दुनिया की परफ़ेक्शन और असली ज़िन्दगी की ख़ामियाँ 

हर दिन हम ऐसी तस्वीरें देखते हैं, जिन्हें कई बार दर्जनों कोशिशों के बाद पोस्ट किया जाता है। हर मुस्कुराहट असल मुस्कुराहट नहीं होती, हर केक काटना उत्सव नहीं होता, हर कपल फोटो में दिख रही प्यार की बात ज़रूरी नहीं कि जीवन में भी उतनी ही हो। पर हम अनजाने में इन सबको सच मान लेते हैं। 

सब अच्छा चल रहा है, यह सिर्फ़ फोटो की कहानी होती है

जीवन हमेशा ऐसा नहीं होता। 

और न ही होना चाहिए। रिश्तों में ख़ामियाँ होती हैं, कभी नाराज़गी, कभी बहस, कभी दूरी, कभी व्यस्तता। यही उन्हें असली बनाती हैं। पर सोशल मीडिया की दुनिया हमें ऐसे दिखाती है, जैसे रिश्ते भी परफ़ेक्ट पैकेज में मिलने चाहिए। 

और जब हमारी ज़िन्दगी उस पैकेज जैसी नहीं दिखती, हम असंतुष्ट हो जाते हैं। 

तो क्या करें? दिल को अपने पास और स्क्रीन को उसकी सीमा में रखें

यह दुनिया ख़राब नहीं, अतिशय ख़राब बनाती है। संतुलन रहा तो यही सोशल मीडिया रिश्तों को जोड़ भी सकता है। कुछ सादे से उपाय हैं, जो रिश्तों को बचाने की अद्भुत ताक़त रखते हैं। 

दिन का नो मोबाइल ज़ोन बनाइए: रात का खाना, सुबह की चाय या साथ की कोई गतिविधि, कुछ समय ऐसा रखें, जहाँ फोन सिर्फ़ मेहमान की तरह हो, मालिक की तरह नहीं। 

तुलना की आदत से दूरी बनाइए: दूसरों की तस्वीरें सिर्फ़ तस्वीरें हैं; ना कि वास्तविकता का पूरा सच। हर रिश्ता अपनी गति से चलता है। 

एक-दूसरे को ‘डिजिटल ध्यान’ से मुक्त करिए: बताइए कि आपको क्या अच्छा लगता है और क्या नहीं। बात करना ही रिश्तों का ऑक्सीजन है। 

अपने भीतर की कशमकश को पहचानिए: अगर आपको लगता है कि ज़्यादा स्क्रीन टाइम आपको बेचैन कर रहा है तो यह आपकी भावनाओं का पहला संकेत है, उसे अनदेखा मत कीजिए। 

असली पलों को प्राथमिकता दीजिए: कभी-कभी फोन को थोड़ा दूर रखकर बस बैठिए। दो मिनट की चाय कई बार सौ लाईक्स से ज़्यादा राहत देती है। 

रिश्तों की गहराई, स्क्रीन की चमक से बड़ी है

तकनीक जीवन आसान बनाती है, पर रिश्तों को सहज बनाना हमारी कला है। एल्गोरिद्म हमें रास्ते दिखा सकते हैं, पर यह नहीं तय कर सकते कि हमारा दिल किस दिशा में जाए। 

रिश्ते न तो डाउनलोड होते हैं, न अपलोड। वे बस महसूस किए जाते हैं, निभाए जाते हैं और समय दिया जाता है। हर स्क्रीन के पीछे एक इंसान है और हर इंसान के भीतर एक दुनिया। उसे नज़रअंदाज़ मत होने दीजिए। 

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