जय सोमनाथ: तलवार की धार, इतिहास का आकार, अस्मिता का चीत्कार
स्नेहा सिंह
कहा जाता है कि दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं का विवाह अत्यंत सुंदर और तेजस्वी सोम यानी चंद्र से हुआ था। लेकिन चंद्र को अपनी 27 पत्नियों में से केवल रोहिणी ही प्रिय थी और वह उसी के साथ अधिक रहता था। (याद रहे कि भारतीय खगोलविदों ने आकाश को चंद्र की कलाओं के आधार पर 27 नक्षत्रों में विभाजित किया है) बाक़ी बेटियों की शिकायत पर दक्ष ने चंद्र को श्राप दिया कि उसका तेज क्रमशः क्षीण होता जाएगा। इस श्राप से दुखी चंद्र ने समुद्र तट पर शिव की उपासना की। शिव प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि चंद्र का तेज 15 दिन घटेगा (कृष्ण पक्ष) और 15 दिन बढ़ेगा (शुक्ल पक्ष)। इस प्रकार पूर्णिमा और अमावस्या का जन्म हुआ और चंद्र को शिव के मस्तक पर स्थान मिला, अपूर्णता के सम्मानस्वरूप। जिस स्थान पर चंद्र ने शिव की आराधना की, वहीं स्वर्णमय शिव मंदिर बना-सोमनाथ।
आकाश और प्रकृति की रहस्यमय घटनाओं को समझाने के लिए ऐसी कथाएँ विश्व की सभी प्राचीन सभ्यताओं में मिलती हैं। ऐसी ही किसी कथा से सौराष्ट्र में स्थित ज्योतिर्लिंग सोमनाथ का ऐतिहासिक महत्त्व जुड़ा। मान्यता है कि सोमनाथ का शिवलिंग स्वयंभू था। सतयुग में इसे भैरवेश्वर, त्रेतायुग में श्रवणिकेश्वर, द्वापर में गलवेश्वर और कलियुग में सोमनाथ कहा गया। सौराष्ट्र नदी, नारी, अश्व, सोमनाथ और द्वारका, इन पाँच बातों के लिए प्रसिद्ध था। यहीं प्रभास पाटन में श्रीकृष्ण ने देहत्याग किया, जिससे इसका महत्त्व और बढ़ जाता है।
20°53’ उत्तरी अक्षांश और 70°24’ पूर्वी देशांतर पर, कभी अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह रहे वेरावल से मात्र 8 किलोमीटर दूर, अरब सागर के तट पर स्थित यह तीर्थ है। कहा जाता है कि यहाँ से दक्षिण की ओर अंटार्कटिका तक बीच में किसी अन्य देश की भूमि नहीं आती। सरस्वती, हिरण और कपिला नदियों का त्रिवेणी संगम भी यहीं होता है।
आज के स्थान पर मूल मंदिर पहली शताब्दी ईसवी में बना माना जाता है। 649 ईसवी में इसका पुनर्निर्माण हुआ और 800 ईसवी में लाल पत्थरों से फिर बनाया गया। कहा जाता है कि यहाँ लाखों तीर्थयात्री आते थे, हज़ारों ब्राह्मण सेवा में लगे रहते थे, सैकड़ों नर्तक-गायक मंदिर द्वार पर कला प्रस्तुत करते थे। गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग रत्नों और झूमरों से दमकता रहता था।
एक सहस्राब्दी पहले भारतीय मसालों और हस्तशिल्प का विश्वभर में बोलबाला था। ज़ांज़ीबार और चीन से व्यापार करने वाले तीन प्रमुख भारतीय बंदरगाहों में वेरावल भी एक था। धार्मिक प्रवृत्ति के कारण समाज से अधिक धार्मिक स्थलों को समृद्ध करने की हमारी आदत ने सोमनाथ को अपार धन का केंद्र बना दिया। अरब व्यापारी घोड़े लेकर यहाँ आते थे, कई यहीं बस गए और विवाह भी किए। भारत अनेक छोटी रियासतों में बँटा था, कोई एकछत्र शासन नहीं था।
लगभग एक हज़ार वर्ष पहले मोहम्मद ग़ज़नवी नामक एक धर्मांध लुटेरे ने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी। सोमनाथ का नाम लेते ही उसका विध्वंस याद आता है।
अफ़ग़ानिस्तान के ग़जनी का रहने वाला मोहम्मद, सुबुक्तगीन का पुत्र था। सिक्कों पर वह स्वयं को केवल ‘अमीर मोहम्मद’ लिखवाता था। मूर्तिभंजन और अपार सम्पत्ति की लूट, दोनों उसकी लालसा थीं। 1001 ईसवी में उसने वैहिंद (पेशावर) में जयपाल को हराया। घुड़सवार सेना और कुशल रणनीति उसकी शक्ति थी। 1015 में लाहौर पर क़ब्ज़ा किया, मुल्तान जीता, गंगा के मैदानों में तीन अभियान चलाए। ईरान तक साम्राज्य फैलाया और बगदाद के ख़लीफ़ा से मान्यता पाई।
18 अक्टूबर, 1025 को वह 17वीं बार भारत पर चढ़ आया। 30,000 घुड़सवार और 30,000 ऊँटों के साथ वह सोमनाथ पहुँचा। दुर्भाग्य यह कि अनेक राज्यों से गुज़रते हुए भी कोई संगठित प्रतिरोध नहीं हुआ। भीमदेव जैसे वीर भी युद्धकौशल में पीछे रह गए।
कथाएँ हैं कि सोमनाथ में लोहे की एक विशाल मूर्ति थी, जो चुम्बक से हवा में लटकी रहती थी, अन्य इतिहासकार विशाल शिवलिंग की बात कहते हैं। जो भी था, ग़ज़नी ने उसे तोड़ा और अकूत धन लूट लिया। 20 मन रत्न, 200 मन सोने की ज़ंजीरें, चंदन के द्वार, सब ले गया।
फारूख सिस्तानी नामक कवि ने सोमनाथ को ‘सु-मनात’ बताकर उसे अरब देवी ‘मनात’ से जोड़ा, ताकि ग़ज़नी को महान इस्लामी योद्धा बताया जा सके। कुछ वामपंथी इतिहासकारों ने भी इसे दोहराया। लेकिन सच यह है कि ग़ज़नी ने कहीं भी बड़े पैमाने पर धर्मांतरण नहीं कराया। उसका उद्देश्य केवल लूट था।
उसने थानेश्वर, मथुरा, कन्नौज, ग्वालियर, कालिंजर, सब जगह यही किया। प्रश्न यह है कि इतनी वीर परंपरा वाला भारत एक लुटेरे को रोक क्यों न सका?
ग़ज़नी कुशल सेनापति था। हाथियों के मुक़ाबले उसके अरब घोड़े अधिक फ़ुर्तीले थे। जयपाल पराजय से इतना टूट गया कि उसने आत्मदाह कर लिया। आनंदपाल और त्रिलोचनपाल भी कुछ न सीख सके। भारत सांस्कृतिक रूप से एक था, राजनीतिक रूप से नहीं, यही हमारी कमज़ोरी थी।
सोमनाथ के बाद भी मंदिर कई बार टूटा और बना। कुमारपाल, हेमचंद्राचार्य, महिपाल, खेगाड़, सबने पुनर्निर्माण किया। अलाउद्दीन खिलजी, महमूद बेगड़ा, औरंगज़ेब, सबने विध्वंस किया। अहिल्याबाई होलकर ने 1783 में फिर मंदिर बनवाया।
अकबर ने पूजा की अनुमति दी, लेकिन औरंगज़ेब ने मना कर दिया। अँग्रेज़ों ने इसे हिंदुओं पर इस्लामी अत्याचार का प्रतीक बनाया। 1842 में सोमनाथ के द्वार लाने की घोषणा हुई, जो अंततः आगरा में सड़ गए।
1947 में सरदार पटेल ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण की घोषणा की। 1951 में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर राष्ट्र को समर्पित किया। सरदार उस क्षण के साक्षी न बन सके, पर उनकी प्रतिमा आज भी मंदिर प्रांगण में खड़ी है, भारत की आस्था और अस्मिता पर पड़े तलवार के घाव पर मरहम की तरह।
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